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2060 तक नेट जीरो का एलान: जलवायु परिवर्तन पर कैसे हो गया पुतिन का हृदय परिवर्तन?
Fri, 05 Nov 2021 07:25 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मास्को
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मास्को
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Fri, 05 Nov 2021 07:25 PM IST
सार
रूस दुनिया में कार्बन डाई-ऑक्साइड गैस का चौथा सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है। आलोचकों के मुताबिक जिस पैमाने पर रूस में कार्बन उत्सर्जन होता है, उसे अगर घटाना है, तो बहुत ठोस और महत्त्वाकांक्षी कदम उठाने होंगे। फिलहाल, रूस सरकार ने जो कार्यक्रम घोषित किया है, उसके मुताबिक 2030 तक देश में कार्बन उत्सर्जन की मात्रा बढ़ती रहेगी...
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व्लादिमीर पुतिन
- फोटो : पीटीआई (फाइल)
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विस्तार
जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर पिछले कुछ वर्षों से रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन का एक नया रूप देखने को मिल रहा है। पिछले महीने उनकी सरकार ने एलान किया था कि साल 2060 तक रूस खुद को नेट जीरो बना लेगा। यानी वहां कार्बन उत्सर्जन की मात्रा घटा कर शून्य कर दी जाएगी। आलोचकों का कहना है कि रूस में असल में इस घोषणा के मुताबिक कोई कदम नहीं उठाए गए हैं।
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रूस दुनिया में कार्बन डाई-ऑक्साइड गैस का चौथा सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है। आलोचकों के मुताबिक जिस पैमाने पर रूस में कार्बन उत्सर्जन होता है, उसे अगर घटाना है, तो बहुत ठोस और महत्त्वाकांक्षी कदम उठाने होंगे। फिलहाल, रूस सरकार ने जो कार्यक्रम घोषित किया है, उसके मुताबिक 2030 तक देश में कार्बन उत्सर्जन की मात्रा बढ़ती रहेगी। उसके बाद उसमें कटौती शुरू होगी। 2050 तक इसके मौजूदा स्तर में 79 फीसदी गिरावट आएगी। अगले एक दशक में उसे शून्य कर दिया जाएगा।
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ब्रिटिश शहर ग्लासगो में इस समय जलवायु परिवर्तन रोकने के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र का सम्मेलन चल रहा है। इस सम्मेलन में पुतिन नहीं गए। लेकिन उनकी ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन से फोन पर बातचीत हुई। जॉनसन ने पुतिन से आग्रह किया कि वे नेट जीरो की समयसीमा और घटा दें। लेकिन उस पर पुतिन ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया।
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रूस उन देशों में है, जिन्होंने मिथेन गैस के उत्सर्जन को शून्य करने के लिए मकसद से ग्लासोगो में हुए समझौते पर दस्तखत नहीं किया है। इन देशों में भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया भी हैं। इस समझौते के मुताबिक सभी देशों अपेक्षा की गई है कि वे 2030 तक अपने मिथेन उत्सर्जन में 30 फीसदी की कटौती कर दें। लेकिन कई विशेषज्ञों ने इस बात पर राहत जताई है कि पुतिन अब कम-से-कम जलवायु परिवर्तन की बात मान रहे हैं। साथ ही वे इसे रोकने के उपाय करने की घोषणाएं कर रहे हैं।
पुतिन उन नेताओं में रहे हैं, जो पहले जलवायु परिवर्तन की बात को नहीं मानते थे। इसीलिए उन्होंने 2003 में क्योतो प्रोटोकॉल का अनुमोदन करने से इनकार कर दिया था। क्योतो प्रोटॉकॉल जलवायु परिवर्तन रोकने की संधि का हिस्सा है, जिस पर 1997 में दस्तखत हुए थे। 2003 में पुतिन ने कहा था कि अति ठंड झेलने वाले रूस के लिए ग्लोबल वॉर्मिंग कोई बुरी बात नहीं होगी।
इसीलिए 2015 में जब पेरिस में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की बैठक हुई, तब पुतिन के बयान ने दुनिया को चौंका दिया। वहां पुतिन ने कहा- ‘जलवायु परिवर्तन मानवता के सामने उपस्थित सबसे गंभीर चुनौतियों में एक है।’ रूस की वेबसाइट रशिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक रूस में गुजरे वर्षों में आई प्राकृतिक आपदाओं के कारण पुतिन की सोच में यह बदलाव आया। इन आपदाओं से रूस में भारी नुकसान हुआ है।
रशिया टुडे के विश्लेषक जॉनी टिकले ने कहा है कि बीते छह वर्षों में पुतिन ग्लोबल वॉर्मिंग रोकने की मुखर आवाज बन कर उभरे हैं। उन्होंने अपनी सरकार की नीतियों में भी अब पर्यावरण संरक्षण को ऊंची प्राथमिकता दी है। पुतिन ने 2019 में एक सम्मेलन में कहा था कि जलवायु परिवर्तन के लिए मानव जाति जिम्मेदार है, जिसके बहुत गंभीर परिणाम होंगे। अब उनकी सरकार इसी समझ के साथ आगे बढ़ रही है।