Russia-Ukraine crisis: जंग टलने के आसार दुनिया के लिए राहत क्यों? जानें इस संकट के असर के बारे में सबकुछ
रूस और यूक्रेन में बीच संघर्ष बढ़ने से मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में यूरोपीय हितों को गंभीर परिणाम उठाने पड़ते। यह ऊर्जा आपूर्ति बाधित कर सकता था और खाद्य असुरक्षा को भी बढ़ा सकता था।
विस्तार
रूस और यूक्रेन के बीच महाजंग का खतरा टलता दिख रहा है, क्योंकि रूस ने क्रीमिया में अपने सैन्य अभ्यास की समाप्ति की घोषणा कर दी है। इसके बाद सैनिक भी वहां से वापस लौट रहे हैं। इसको लेकर रूस के रक्षा मंत्रालय ने एक वीडियो भी जारी किया गया है, जिसमें सेना की वापसी को दिखाया गया है।
रूस ने एक दिन पहले भी यूक्रेन की सीमा से अपने सैनिकों की वापसी की घोषणा की थी, लेकिन अमेरिका समेत कई देशों को रूस की इस घोषणा पर भरोसा नहीं हुआ था। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने रूस से इस बात के सबूत मांगे थे। माना जा रहा है कि रूसी रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी वीडियो इसी संदर्भ में जारी किया गया है।
बहरहाल, रूस की सैनिकों की वतन वापसी से रूस और यूक्रेन के बीच संभावित जंग की समाप्ति की तरफ सबकी निगाहें लगी हुई हैं। यूक्रेन संकट एक बड़ी जंग में बदल सकता है, यह सोचकर ही सिहरन पैदा हो रही थी, लेकिन रूसी सैनिकों के लौटने से दुनिया को बड़ी राहत मिल रही है। हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि यूक्रेन में तनाव बढ़ने के बावजूद व्हाइट हाउस सावधानी बरत रहा है।
समझिए, यदि रूस और यूक्रेन के बीच जंग छिड़ जाता तो क्या-क्या बदल जाता?
1. मानवीय त्रासदी झेलने को मजबूत होते लोग
दुनिया भर के विशेषज्ञों का यह आकलन था कि यूक्रेन में रूस की संभावित घुसपैठ के भयानक नतीजे होते। हजारों लोग मारे जाते और भारी आर्थिक नुकसान होता। लोग मानवीय त्रासदी झेलने को मजबूर हो जाते। यूक्रेन के वर्तमान संकट को देखते हुए यूक्रेन की सीमा पर रूसी सैनिकों की तैनाती के जवाब में नार्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (नाटो) ने भी अपने सैनिक तैनात कर दिए थे। यह अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी सहित 30 देशों का एक समूह है। यानी युद्ध होता तो इन सभी देशों के सैनिक इसमें शामिल होते।
2. लोग विस्थापित होते
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल ही में पश्चिम के एक वरिष्ठ खुफिया अधिकारी ने चेतावनी दी थी कि यदि रूस यूक्रेन पर आक्रमण करता है तो लोग बड़े पैमाने पर विस्थापित हो सकते हैं। 2014 में पूर्वी यूक्रेन में हुई लड़ाई में पहले ही 14,000 लोग मारे गए थे और करीब 14 लाख विस्थापित हुए थे।
3. पश्चिम देशों के साथ खराब होते रूस के रिश्ते
यह युद्ध यूरोप के भू-राजनीतिक मानचित्र को नया रूप दे सकता था और आने वाले वर्षों में मॉस्को और पश्चिम देशों के बीच रिश्ते बेहद खराब हो जाते। इस संघर्ष के नतीजे वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों को प्रभावित करते। यूक्रेन में युद्ध संभवतः इस क्षेत्र में यूरोप के लिए नई समस्याएं पैदा करता। कीव को रूस के हमले का डर था, क्योंकि रूस ने पहले ही क्रीमिया को यूक्रेन से अलग कर लिया है। अमेरिका स्थित एक थिंक टैंक ब्रुकिंग्स के मुताबिक ‘मास्को का क्रीमिया पर कब्जा’ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप में सबसे बड़ा भूमि-हथियाना था।
यह मध्य पूर्व और एशिया की ओर अपना ध्यान केंद्रित करने के लिए जो बाइडेन प्रशासन के प्रयासों के लिए यह एक झटका साबित हो सकता था। यदि रूस यूक्रेन में प्रवेश करता तो अमेरिका-रूस के संबंधों के और अधिक बिगड़ने का खतरा था जिसका असर दुनिया के कई देशों पर पड़ता।
4. कच्चे तेल की कीमतों में आग लग जाती
- यह युद्ध होता तो कारोबार, तेल, ऊर्जा और कोरोना वैक्सीन सप्लाई से लेकर तमाम तरह से दुनिया प्रभावित होती। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध होने की आशंका को लेकर ही वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने लगी थीं। पहले गैस और अब तेल की कीमतों को भी आग लग गई थी।
- यूक्रेन को लेकर रूस के मंसूबों को देखते हुए पश्चिमी देशों ने यूरोप के ऊर्जा संकट के लिए रूस को सीधे जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के प्रमुख फातिह बिरोल ने कुछ दिनों पहले अपने एक बयान में कहा था कि यूरोप को रूस की ओर से गैस सप्लाई में कटौती और यूक्रेन को मिल रही धमकियों के बीच का कनेक्शन दिखाई दे रहा है।
- रूस से होने वाली गैस आपूर्ति को लेकर यूरोपीय संघ के देशों में चिंता थी, खासतौर पर ऐसे समय में जब यूरोपीय देशों में सर्दियों के मौसम के दौरान पहले ही गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं।
5. महंगाई बढ़ने का डर था
यदि युद्ध होता तो दुनिया भर में तेल की कीमतें आसमान छूतीं। दरअसल यूरोप लगभग एक तिहाई गैस के लिए रूस पर निर्भर रहता है। यूरोप को चिंता थी कि अगर रूस गैस और तेल की आपूर्ति बंद कर देगा, तो इससे ऊर्जा की कीमतें बढ़ेंगी। माना जा रहा था कि रूस और यूक्रेन के बीच यदि जंग की नौबत आई तो पश्चिम देश रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए सकते हैं और रूस यूरोप में गैस की आपूर्ति में कटौती कर सकता है, जिसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ सकता था।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ सी राजामोहन ने हाल ही में एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा अगर रूस रूस-यूक्रेन की जंग से तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी और महंगाई अपने चरम पर पहुंच जाएगी। भारत जैसे देश जिसकी अर्थव्यवस्था पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी आधारित होती है, वहां महंगाई चरम पर पहुंच जाती। गेहूं की कीमतों में भी तेज वृद्धि का संकेत मिलने लगे थे।
6. रूस के साथ भारत की मिसाइल डील पर संकट मंडराता
- अगर रूस के खिलाफ गंभीर प्रतिबंध लगते और अमेरिका, भारत को मिली छूट को रोक देता तो इससे भारत-रूस के बीच S-400 मिसाइल सिस्टम के डील पर प्रभाव पड़ता। कुछ जानकार यह भी मानते हैं कि यदि यूक्रेन संकट के बीच अगर रूस चीन के करीब जाता है तो चीन रूस पर यह दबाव बना सकता है कि वो भारत को की जाने वाली सैन्य सप्लाई रोके।
- स्वीडिश थिंक टैंक स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की करीब 60 फीसदी सैन्य आपूर्ति रूस से होती है और जिसे नजरअंदाज करना भारत के लिए मुश्किल है। यूक्रेन में भारत समेत कई देशों के बच्चे मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए गए हुए हैं। माता-पिता को चिंता थी कि वे कैसे अपने बच्चों को यूक्रेन से बुलाएं। लोग सरकारों से अपने बच्चों की वापस बुलाने की गुहार लगा रहे थे।