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जिम्बाब्वे संकट: ये पांच चीजें आपको पता होनी चाहिए
बीबीसी, हिंदी
Updated Fri, 17 Nov 2017 02:27 PM IST
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जिम्बाब्वे संकट
- फोटो : File Photo
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जिम्बाब्वे की सत्ता पर सेना के नियंत्रण के बाद अब क्या होगा? सेना का अगला रुख क्या होगा? इसका इंतजार दुनिया के कई देश कर रहे हैं। सेना ने राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे को नजरबंद कर रखा है। हम आपको यहां पांच अहम बातें बता रहे हैं जिससे आप समझ सकते हैं कि जिम्बाब्वे की वर्तमान स्थिति क्या है और क्यों है।
संकट में अर्थव्यवस्था
जिम्बाब्वे पिछले एक दशक से आर्थिक संकट से जूझ रहा है। देश में बेरोजगारी के अनुमान अलग-अलग हैं। लेकिन देश के सबसे बड़े ट्रेड यूनियन का कहना है कि इस साल की शुरुआत में बेरोजगारी की दर 90 फीसदी तक थी।
2008 में जिम्बाब्वे में मंहगाई चरम पर थी। जिम्बॉब्वे को अपनी मुद्रा छोड़कर विदेशी मुद्रा अपनाने पर मजबूर होना पड़ा था। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि जिम्बाब्वे नकदी की समस्या से जूझ रहा था। सरकार ने अपना डॉलर जारी किया था जिसे बॉन्ड नोट कहा गया। लेकिन ये बड़ी तेजी से बेकार साबित होते गए।
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जिन लोगों ने बैंकों में पैसे जमा किए थे वो निकाल नहीं सकते थे। पैसे निकालने की सीमा तय कर दी गई थी। ऐसे में ऑनलाइन लेन-देन की लोकप्रियता बढ़ी। जब बुधवार को सेना ने सत्ता पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया तो बिट क्वाइन की कीमत राजधानी हरारे में बढ़ गई। बिट क्वाइन एक डिजिटल पेमेंट सिस्टम है।
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संकट में अर्थव्यवस्था
जिम्बाब्वे पिछले एक दशक से आर्थिक संकट से जूझ रहा है। देश में बेरोजगारी के अनुमान अलग-अलग हैं। लेकिन देश के सबसे बड़े ट्रेड यूनियन का कहना है कि इस साल की शुरुआत में बेरोजगारी की दर 90 फीसदी तक थी।
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2008 में जिम्बाब्वे में मंहगाई चरम पर थी। जिम्बॉब्वे को अपनी मुद्रा छोड़कर विदेशी मुद्रा अपनाने पर मजबूर होना पड़ा था। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि जिम्बाब्वे नकदी की समस्या से जूझ रहा था। सरकार ने अपना डॉलर जारी किया था जिसे बॉन्ड नोट कहा गया। लेकिन ये बड़ी तेजी से बेकार साबित होते गए।
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जिन लोगों ने बैंकों में पैसे जमा किए थे वो निकाल नहीं सकते थे। पैसे निकालने की सीमा तय कर दी गई थी। ऐसे में ऑनलाइन लेन-देन की लोकप्रियता बढ़ी। जब बुधवार को सेना ने सत्ता पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया तो बिट क्वाइन की कीमत राजधानी हरारे में बढ़ गई। बिट क्वाइन एक डिजिटल पेमेंट सिस्टम है।
मुगाबे और विवाद
राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे
- फोटो : File Photo
93 साल की उम्र में सत्ता पर काबिज रहने के लिए मुगाबे की तीखी आलोचना होती है। जिम्बाब्वे में उन्हें एक क्रांतिकारी हीरो के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने देश में गोरों के शासन की खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।
लेकिन मुगाबे और उनके समर्थक सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए हिंसा का सहारा लेते रहे हैं। सरकार की मशीनरी का इस्तेमाल सत्ता को बचाने के किया जाता था।
मुगाबे की पार्टी का कहना है कि यह पूंजीवाद और उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई है। लेकिन सच यह है कि देश की आर्थिक समस्याओं को निपटाने में मुगाबे नाकाम रहे हैं।
ये भी पढ़ेंः सरकारी खजाने में सिर्फ दो सौ डॉलर?
मुगाबे अक्सर कहते रहे हैं कि वो राष्ट्रपति की कुर्सी तभी छोड़ेंगे जब क्रांति पूरी हो जाएगी, लेकिन दूसरी तरफ वो एक उत्तराधिकारी भी चाहते हैं।देश के वर्तमान संकट का संबंध इसी से है कि मुगाबे जीवन के आखिरी दौर में हैं और उन्हें एक उत्तराधिकारी की तलाश है।
देश में एक विपक्ष है
1980 में ब्रिटेन की निगरानी में जब पहली बार चुनाव हुआ और रॉबर्ट मुगाबे प्रधानमंत्री बने तो एक विपक्ष भी था। 1987 में मुगाबे ने संविधान को बदल दिया और खुद को राष्ट्रपति बना लिया।
1999 में मूवमेंट फॉर डेमोक्रेटिक चेंज नाम से एक विपक्षी समूह अस्तित्व में आया। इसके बाद से सरकार की नीतियों और आर्थिक संकट को लेकर विरोध प्रदर्शन और हड़ताल आम बात हो गई।
मुगाबे ने सरकारी हिंसा के अलावा सत्ता पर नियंत्रण रखने के लिए अपने राजनीतिक विरोधियों को खत्म करना शुरू किया।इसके साथ ही उन्होंने पार्टी में से ताकतवर लोगों को निकाल बाहर किया। हाल ही में मुगाबे ने उपराष्ट्रपति एमर्सन को बर्खास्त कर दिया था। मुगाबे अपनी पत्नी ग्रेस मुगाबे को सत्ता सौंपना चाहते थे, लेकिन सेना ने ऐसा नहीं होने दिया।
लेकिन मुगाबे और उनके समर्थक सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए हिंसा का सहारा लेते रहे हैं। सरकार की मशीनरी का इस्तेमाल सत्ता को बचाने के किया जाता था।
मुगाबे की पार्टी का कहना है कि यह पूंजीवाद और उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई है। लेकिन सच यह है कि देश की आर्थिक समस्याओं को निपटाने में मुगाबे नाकाम रहे हैं।
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मुगाबे अक्सर कहते रहे हैं कि वो राष्ट्रपति की कुर्सी तभी छोड़ेंगे जब क्रांति पूरी हो जाएगी, लेकिन दूसरी तरफ वो एक उत्तराधिकारी भी चाहते हैं।देश के वर्तमान संकट का संबंध इसी से है कि मुगाबे जीवन के आखिरी दौर में हैं और उन्हें एक उत्तराधिकारी की तलाश है।
देश में एक विपक्ष है
1980 में ब्रिटेन की निगरानी में जब पहली बार चुनाव हुआ और रॉबर्ट मुगाबे प्रधानमंत्री बने तो एक विपक्ष भी था। 1987 में मुगाबे ने संविधान को बदल दिया और खुद को राष्ट्रपति बना लिया।
1999 में मूवमेंट फॉर डेमोक्रेटिक चेंज नाम से एक विपक्षी समूह अस्तित्व में आया। इसके बाद से सरकार की नीतियों और आर्थिक संकट को लेकर विरोध प्रदर्शन और हड़ताल आम बात हो गई।
मुगाबे ने सरकारी हिंसा के अलावा सत्ता पर नियंत्रण रखने के लिए अपने राजनीतिक विरोधियों को खत्म करना शुरू किया।इसके साथ ही उन्होंने पार्टी में से ताकतवर लोगों को निकाल बाहर किया। हाल ही में मुगाबे ने उपराष्ट्रपति एमर्सन को बर्खास्त कर दिया था। मुगाबे अपनी पत्नी ग्रेस मुगाबे को सत्ता सौंपना चाहते थे, लेकिन सेना ने ऐसा नहीं होने दिया।
मोर्गन मनंगावा
- फोटो : File Photo
कोई नया नेता बड़ा बदलाव नहीं ला सकता
अगर बर्खास्त उपराष्ट्रपति एमर्सन को सत्ता सौंपी जाती है तो उनकी राह आसान नहीं होगी। उनकी विश्वसनीयता मुगाबे की तरह नहीं है। एमर्सन भी जिम्बाब्वे की आजादी की लड़ाई के अहम चेहरा रहे हैं।
इनके बारे में कहा जाता है कि वो सेना, खुफिया एजेंसियों और सत्ताधारी पार्टी के बीच कड़ी जोड़ने काम करते हैं। इन पर जिम्बाब्वे में गृहयुद्ध के दौरान दमन और विपक्ष पर हमले करने के भी आरोप हैं। पिछले चार दशकों से देश में यथास्थिति को बनाए रखने में वहां की सरकार और सेना दोनों के हाथ रहे हैं।
ये भी पढ़ेंः जिम्बाब्बे के राष्ट्रपति की पत्नी पर मॉडल को मारने का आरोप
संभव है कि मुगाबे राष्ट्रपति बने रहें
लोगों को लगता है कि मुगाबे के जाने से देश में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आएगा। सेना ने टीवी पर दिए बयान में कहा है कि सत्ता पर उसका नियंत्रण अस्थायी रूप से है।
सेना का कहना है कि ऐसा अपराधियों को खत्म करने के लिए किया गया है न कि मुगाबे को निशाना बनाने के लिए।
ये संभव है कि मुगाबे यह गतिरोध खत्म होने के बाद सत्ता छोड़ दें। बर्खास्त उपराष्ट्रपति एमर्सन को फिर से उपराष्ट्रपति बनाया जा सकता है और फिर उत्तराधिकार की योजना बनेगी।
अगर बर्खास्त उपराष्ट्रपति एमर्सन को सत्ता सौंपी जाती है तो उनकी राह आसान नहीं होगी। उनकी विश्वसनीयता मुगाबे की तरह नहीं है। एमर्सन भी जिम्बाब्वे की आजादी की लड़ाई के अहम चेहरा रहे हैं।
इनके बारे में कहा जाता है कि वो सेना, खुफिया एजेंसियों और सत्ताधारी पार्टी के बीच कड़ी जोड़ने काम करते हैं। इन पर जिम्बाब्वे में गृहयुद्ध के दौरान दमन और विपक्ष पर हमले करने के भी आरोप हैं। पिछले चार दशकों से देश में यथास्थिति को बनाए रखने में वहां की सरकार और सेना दोनों के हाथ रहे हैं।
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संभव है कि मुगाबे राष्ट्रपति बने रहें
लोगों को लगता है कि मुगाबे के जाने से देश में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आएगा। सेना ने टीवी पर दिए बयान में कहा है कि सत्ता पर उसका नियंत्रण अस्थायी रूप से है।
सेना का कहना है कि ऐसा अपराधियों को खत्म करने के लिए किया गया है न कि मुगाबे को निशाना बनाने के लिए।
ये संभव है कि मुगाबे यह गतिरोध खत्म होने के बाद सत्ता छोड़ दें। बर्खास्त उपराष्ट्रपति एमर्सन को फिर से उपराष्ट्रपति बनाया जा सकता है और फिर उत्तराधिकार की योजना बनेगी।