दहशत में हैं अफगानिस्तान के हिंदू और सिख
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अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की ओर से सुरक्षा को लेकर दिए जा रहे तमाम आश्वासनों के बाद भी अफ़ग़ानिस्तान के सिख और हिंदू समुदाय को भेदभाव और अन्याय का सामना करना पड़ रहा है।
ग़नी ने अभी हाल में ही कहा था कि हिंदू और सिखों ने हमेशा अफ़ग़ानिस्तान की एकता को बढ़ावा दिया है। व्यापार में उनका योगदान प्रमुख है। राष्ट्रपति ने इन दोनों अल्पसंख्यक समुदायों की ज़मीन और संपत्ति विवाद को सुलझाने का वादा किया था।
उन्होंने हिदुओं और सिखों के अंतिम संस्कार के लिए ज़मीन उपलब्ध कराने का वादा भी किया था। लेकिन तमान आश्वासनों के बाद भी अल्पसंख्यक समुदाय के मन से डर की भावना मिट नहीं पाई है।
पढ़े-लिखे लोग भी अफ़ग़ानिस्तान में उन्हें बाहरी बताते
अफ़ग़ानिस्तान की सिख सांसद अनारकली कौर होनरी कहती हैं कि उनके समुदाय को अभी भी ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़े की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। वह कहती हैं कि पढ़े-लिखे लोग भी अफ़ग़ानिस्तान में उन्हें बाहरी बताते हैं।
काबुल, जलालाबाद और क़ंधार जैसे शहरों में रहने वाले अल्पसंख्यकों ने अभी हाल ही में अफ़ग़ानिस्तान में बढ़ती असहिष्णुता, अन्याय और भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी।
कुछ लोगों की शिकायत है कि अल्पसंख्यक परिवारों पर अक्सर इस्लाम क़बूल करने का दबाव बनाया जाता है। इसे देखते हुए कई हिंदू और सिख परिवार सुरक्षित स्थान की तलाश में दूसरे देशों में जाकर बस गए हैं।
होनरी ने कहा, ''अफ़ग़ानिस्तान में पिछले काफ़ी सालों से युद्ध चल रहा है। पूरे अफ़ग़ानिस्तान में हमें शांति नहीं है। पिछले 30 सालों में हमारे कई अफ़ग़ान हिंदू और सिख कई दूसरे देशों में जाकर बस गए हैं। भारत में हमारे बहुत से शरणार्थी हैं। इनमें से बहुतों को शरण नहीं मिली है, अब वह यूरोप के देशों में जा रहे हैं।''
तालिबान पर आरोप
बहुत से लोग तालिबान पर अल्पसंख्यक परिवारों को प्रताड़ित करने और उनके मंदिरों व ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने का आरोप लगाते हैं। एक अफ़ग़ान हिंदू ने बताया, ''मैं 40 दिन तक तालिबान का बंधक था। उन्होंने मुझे बुरी तरह प्रताड़ित किया। मुझे 24 घंटे में एक बार खाना दिया जाता था। मुझे नृशंस तरीक़े से यातना दी गई। मैं यहां छह महीने के लिए वैध भारतीय वीज़ा पर आया हूं।''
अफ़ग़ानिस्तान के अधिकांश हिंदू और सिख परिवार पड़ोसी भारत का दरवाज़ा खटखटाते हैं। लेकिन सबको वहां की नागरिकता या शरणार्थी दर्जा हासिल करने में सफलता नहीं मिलती।
अफ़ग़ानिस्तान में हिंदू और सिख समुदाय का इतिहास 18वीं शदी से शुरू होता है। उस समय के व्यापार में उनका प्रमुख योगदान था, जो मध्य और दक्षिण एशिया से जुड़ता था। वह अभी भी अफ़ग़ानिस्तान में जड़ी-बूटी की दुकानों के लिए मशहूर हैं।
हिंदुओं और सिखों की जनसंख्या में लगातार गिरावट आई
राष्ट्रपति ग़नी ने अभी हाल ही में इन दोनों अल्पसंख्यक समुदायों से कहा था, ''अफ़ग़ानिस्तान के हिंदुओं और सिखों ने हमेशा अफ़ग़ानिस्तान के निर्माण, विकास और सुरक्षा में भाग लिया है। मैं आप सभी का धन्यवाद करता हूं। आप पिछले एक हज़ार साल से व्यापार से जुड़े हुए हैं। आपके व्यापार ने अफ़ग़ानिस्तान को सिल्क रोड का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया।''
हालांकि पिछले एक दशक में अफ़ग़ानिस्तान में हिंदुओं और सिखों की जनसंख्या में लगातार गिरावट आई है। आंकड़ों से पता चलता है कि 1990 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान में एक लाख हिंदू और सिख रहते थे। यह संख्या अब घटकर क़रीब आठ हज़ार रह गई है। ये मुख्यत: काबुल, हेलमंद, ग़ज़नी और नानगरहार प्रांत में रहते हैं।
अनारकली कौर होनरी कहती हैं, ''हमारे अधिकांश पढ़े-लिखे लोगों को यह नहीं पता है कि हम अफ़ग़ान हैं। वह हमसे पूछते हैं कि आप अफ़ग़ानिस्तान की नागरिकता लेने यहां कब आए? हिंदू और सिख देश के सच्चे नागरिक हैं। वे भारत या किसी और देश से नहीं आए हैं। लेकिन युद्ध और बढ़ती समस्याओं ने उनमें से अधिकांश को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया है।''
मंदिरों और अन्य पूजा घरों की सुरक्षा करने का वादा किया
भारतीय अख़बार 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' में दो अक्तूबर को प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़ हेलमंद प्रांत के लक्षागृह के क़रीब 30 परिवारों ने दिल्ली सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी से इस युद्ध प्रभावित देश से निकलने में मदद मांगी है।
राष्ट्रपति ग़नी ने अभी हाल ही में हिंदुओं और सिखों के मंदिरों और अन्य पूजा घरों की सुरक्षा करने का वादा किया। लेकिन अल्पसंख्यक नेता कहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान से हिंदुओं और सिखों का पलायन रोकने के लिए राष्ट्रपति के शब्दों को कार्रवाई में बदलने की ज़रूरत है।