क्या सच में रोहिंग्याओं ने ही म्यांमार में हिंदुओं को मारा?
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'म्यांमार के रखाइन प्रांत में रविवार को 28 हिंदुओं के शव बरामद किए गए।' म्यांमार की सेना के इस दावे को भारत ही नहीं दुनिया भर के मीडिया के बड़े तबके में जगह दी गई। बर्मा की सरकार के हवाले से अपुष्ट दावे किए गए कि रोहिंग्या चरमपंथियों ने पिछले महीने कथित रूप से इन हिंदुओं की हत्या कर दी थी। हालांकि स्वतंत्र सूत्रों से पुष्टि नहीं हो सकी।
वहीं अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (एआरएसए) ने इन दावों का खंडन करते हुए कहा है कि उसने नागरिकों पर हमले नहीं किए हैं। इससे पहले पांच सितंबर को म्यांमार सेना के प्रमुख ने फेसबुक पर पोस्ट किया था, 'एआरएसए के बंगाली चरमपंथी विदेशी सरकार की मदद से म्यांमार के प्रमुख शहरों में हमला करने की योजना बना रहे हैं।'
सेना का दावा
ना कोई सबूत, न प्रेस विज्ञप्ति, न ही पत्रकारों के लिए सवाल पूछने का कोई मौका। सिर्फ फेसबुक पोस्ट! म्यांमार सेना के पुरातनपंथी लोग, नई तकनीक के प्रेमी 21वीं सदी के युवा बन गए हैं। म्यांमार सेना के दावे इसलिए भी रोचक हैं क्योंकि सेना ने चरमपंथ को विदेश से मिल रहे समर्थन की बात संयोगवश उसी दिन की, जिस दिन मिज्जिमा ने भारत और बांग्लादेश के अज्ञात सूत्रों के हवाले से प्रकाशित खबर में ये दावा किया कि पाकिस्तान और इस्लामिक स्टेट ने अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी की 25 अगस्त को तड़के पुलिस चौकियों पर हमला करने में मदद की थी।
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इन्हीं हमलों के बाद रखाइन प्रांत में हिंसा और वहां मौजूदा मानवीय संकट शुरू हुआ। मिज्जिमा की रिपोर्ट में ये दावा भी किया गया कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने बांग्लादेश में चिटगांव की पहाड़ियों पर एआरएसए के लड़ाकों को प्रशिक्षण देने में मदद की है।
खबर का भारतीय कनेक्शन
रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि इस्लामिक स्टेट के इराक़ में भर्ती करने वाले लड़ाके ने म्यांमार में सेना, बौद्धों और हिंदु कट्टरपंथियों के खिलाफ जिहादी अभियान के लिए एआरएसए को मुबारकबाद भी दी।
ये भारतीय खुफिया एजेंसियों की तरफ के रिकॉर्ड की गई एक कॉल के हवाले से कथित तौर पर बताया गया।
ये कड़ा प्रहार था। ये म्यांमार में इस्लामिक स्टेट के पहुंचने का एलान था। ये बिल्कुल ऐसा था जैसे 'घर-घर कम्युनिस्ट पहुंच गए हैं! चिटगांव की पहाड़ियां बांग्लादेश में सबसे ज्यादा सैन्य मौजूदगी वाला इलाक़ा है। बांग्लादेश की खुफिया सेवा सैन्यबल खुफिया निदेशालय (डीजीबीएफआई) कोई अनाड़ी एजेंसी नहीं है।
जब शेख हसीना की सरकार चरमपंथियों के साथ बड़े संघर्ष में उलझी हो, ऐसे में ये कहना भोलापन ही होगा कि बांग्लादेश की सेना, बांग्लादेश राइफल्स, डीजीबीएफआई और रैपिड एक्शन बटालियन- सबने अपने सर रेत में घुसा रखे हैं।
म्यांमार की न्यूज वेबसाइट
ये भी नहीं भूलना चाहिए कि मिज्जिमा को भारत में निर्वासित रहे म्यांमारवासी ने ही स्थापित किया था। उन पर लगे हाइजैकिंग के आरोपों को आपसी बातचीत से निबटा दिया गया था। निर्वासन के दौरान उन्हें भारत सरकार ने उन्हें दुनियाभर में आने-जाने के लिए भारतीय पासपोर्ट भी दिया था।
लुइस कैरोल के शब्दों में कहा जाए तो यह और रोचक होता जा रहा है। दिल्ली से संचालित एक वेब पोर्टल के संचालक जो खुद भारतीय खुफिया एजेंसियों के साथ संबंध को स्वीकार करता हो, वो एक ऐसी अपुष्ट खबर को प्रकाशित करे जिसमें दावा किया गया हो कि एएसआरए के लड़ाके बौद्धों और हिंदुओं की हत्याएं कर रहे हैं।
ये कहानी रंगून से चलने वाले एक वेबसाइट पर भी छपी। हालांकि रंगून से चलने वाली इस वेबसाइट की शुरुआत पहले थाईलैंड में हुई थी। इसी खबर के आधार पर बर्मा के सेना प्रमुख ने अपना फेसबुक पोस्ट लिखा। और फिर सब लोग एक पहेली में उलझ कर रह गए।
म्यांमार का सच
म्यांमार ने अभी तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संधि के तहत एक भी जांच प्रक्रिया को स्वीकार नहीं किया है। न ही म्यांमार ने राजनीतिक और नागरिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय समझौते को स्वीकार किया है।
इसके अलावा उसने न तो उत्पीड़न के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र समझौते को माना है और ना ही किसी भी तरह के नस्लीय भेदभाव को खत्म करने के लिए या जबरदस्ती ग़ायब किए जाने के खिलाफ सुरक्षा देने वाले अंतरराष्ट्रीय समझौते को स्वीकार किया है।
19 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में बोलते हुए म्यांमार पर स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय फैक्ट फाइंडिंग मिशन के प्रमुख मारजूकी दारुसमान ने कहा था कि वो अभी तक म्यांमार नहीं जा पाए हैं।
जांच से हीलाहवाली
म्यांमार में मानवाधिकारों की जांच करने के लिए 30 मई को गठित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की तीन सदस्यीय टीम को रखाइन जाने की अनुमति नहीं दी गई। पूर्व संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान की अध्यक्षता वाली इस समिति को मानवाधिकार उल्लंघन के व्यक्तिगत मामलों की जांच के अधिकार भी नहीं दिए गए हैं।
म्यांमार सरकार की रखाइन प्रांत के मोंगडॉ में मानवाधिकारों की जांच के लिए गठित जांच आयोग ने 8 अगस्त 2017 को अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश की। हैरत की बात नहीं है कि ये जांच आयोग कई आरोपों की पुष्टि नहीं कर सका और आगे जांच की जरूरत बताई। जांच आयोग ने मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोपों को खारिज कर दिया।
अंतरराष्ट्रीय जांच
अगर म्यांमार की सेना को इस बात पर पक्का यकीन है कि एआरएसए के सदस्यों ने ही हिंदू लोगों की हत्याएं की हैं तो उन्हें तुरंत सामूहिक कब्रों पर पीड़ितों की पहचान के लिए बने अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग को तुरंत आमंत्रित करना चाहिए।
इस अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग के मुताबिक सामूहिक कब्रों की दो कारणों से उच्च स्तरीय फोरेंसिक जांच जरूरी है। पहला ये कि सबूतों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अभियोजनों में इस्तेमाल किया जा सके। दूसरा, परिवार को ये हक़ है कि उन्हें पता चल सके कि उनके प्रियजनों के साथ क्या हुआ था और वो अपने प्रियजनों की पहचान के बाद विधिवत अंतिम संस्कार भी कर सकें।
म्यांमार की सेना
संघर्ष के दौरान ग़लत जानकारियां देने का एक बड़ा खेल है। आपको हाल के दशकों के दौरान इराक़ के महाविनाश के हथियार या कुवैत में मरते हुए बच्चों से इन्क्यूबेटर्स छीन लिए जाने की रिपोर्टों तो याद ही होंगी। दूसरे विश्व युद्ध से पहले की राइखस्टॉग अग्निकांड या पहले विश्व युद्ध का जिम्मरमैन टेलीग्राम याद है?
ये खुफिया ब्रिगेड अच्छी तो है लेकिन अपने पैरों के निशान छुपाना भूल गईं। रोहिंग्या मामले में सभी कहानी का स्रोत म्यांमार की सेना के प्रमुख का फेसबुक पेज ही है। मीडिया के लिए इस कहानी के क्या सबक हैं? वो ये कि तथ्य पवित्र हैं, टिप्पणी तो कोई भी कर सकता है।