भारत और सऊदी अरब के रिश्तों के पीछे क्या है?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आम नजरों से परे इस्लामी दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में से एक सऊदी अरब और भारत के रिश्ते मजबूत होते जा रहे हैं। चंद रोज पहले भारत में एक सऊदी राजनयिक पर लगे आरोपों के मामले पर शुरुआती हंगामे के बाद जिस तरह से ,सरकार ने इस मामले पर तनाव घटाने की कोशिश की, उससे अंदाज मिलता है कि भारत के लिए ये संबंध कितने अहम हैं।
दरअसल दोनों देशों को एक दूसरे की बेहद जरूरत है। पहले बात करते हैं सऊदी अरब के नजरिए से। सऊदी अरब लंबे समय तक पाकिस्तान का सबसे बडा मददगार रहा है। पर हालात तेजी से बदल रहे हैं। पाकिस्तान से बिगडते हुए रिश्तों के कारण भी सऊदी सरकार का रूझान भारत की ओर बढा है।
सऊदी शासक, ओसामा बिन लादेन की अमरीकी सैनिको द्वारा हत्या के बाद से, पाकिस्तान पर विश्वास नहीं करते। उनका मानना है कि पाकिस्तान उन 'आतंकवादियों' को अपने देश में शरण देता है जो सऊदी अरब के विरोधी हैं और वो अपने स्वार्थपूर्ती के लिए आतंकवादी संगठनों को अफगानिस्तान में इस्तेमाल करता है।
पाक ने किया इंकार
पाकिस्तान को सऊदी अरब ने पिछले 35 सालों में कई अरब डॉलर की आर्थिक तथा सैन्य सहायता दी थी। समझा जाता है कि उसने परमाणु हथियार बनाने के लिए गुप्त रूप से अरबों डॉलर दिए थे। लेकिन जब सऊदी अरब को यमन में युद्ध के लिए सैनिकों की जरूरत पडी, तब पाकिस्तान ने इंकार कर दिया।
सऊदी अरब-पाकिस्तान रिश्तों में जो दूरी आई है वह निकट समय में खत्म होती नजर नहीं आती। अब सऊदी अरब के लिए यह संभव नहीं होगा कि वह अधिक समय तक पाकिस्तान की भारत विरोधी नीतियों को समर्थन देता रहे। सऊदी अरब के शासक भारत-ईरान के बढते हुए संबंधों से भी काफी चिंतित हैं और वे नहीं चाहते कि भारत पूरी तरह से ईरान की नीतियों का समर्थन पश्चिम और मध्य एशिया में करे।
भारत का मानना है कि सऊदी अरब, अरब और इस्लामिक जगत का एक महत्वपूर्ण देश है और उसका प्रभाव दक्षिण एशिया के सुन्नी मुसलमानों पर लगातार बढ रहा है। भारत सऊदी अरब के साथ व्यापारिक संबंधों के साथ सैन्य संबंध भी बना रहा है जो उसको आने वाले समय में बढते हुए चरमपंथ को रोकने में मदद करेगा।
कच्चे तेल का निर्यातक
जब से भारत ने रक्षा क्षेत्र में उत्पादन के लिए 49 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी है, सऊदी अरब भी भारत के सुरक्षा क्षेत्र में निवेश करना चाहता है। इसके अतिरिक्त दोनों देश सैन्य सहयोग भी बढाने के इच्छुक हैं। भारत फारस की खाडी शांति में चाहता है। यहां से भारत का 70 प्रतिशत से भी अधिक कच्चा तेल आयात होता है।
इस क्षेत्र में 70 लाख से भी अधिक भारतीय काम करते हैं जो हर साल 25 से 30 अरब डॉलर भारत भेजते हैं। तेजी से बदलती क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भारत और सऊदी अरब के संबंधों को घनिष्ठ बनाने में मदद कर रही हैं। इराक में सद्दाम हुसैन के शासन की समाप्ति के बाद सऊदी शासकों को इराक से आने वाले संकट से निजात भी मिल गई और वे सुन्नी मुस्लिम देशों के नेता के रूप में उभरकर सामने आए।
दूसरी ओर सऊदी अरब भारत के लिए कच्चे तेल का एक बडा निर्यातक बन गया। भारत लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल सऊदी अरब से प्राप्त करता है, जिसकी सालाना कीमत 28.2 अरब डॉलर है और इन दोनों देशों का व्यापार 2013-14 में 39.4 अरब डॉलर था। इसके अतिरिक्त सऊदी अरब में लगभग 27 लाख 30 हजार भारतीय काम करते हैं, जिनसे देश को करोडों डॉलर प्राप्त होता है।
ढांचागत सुधार
उम्मीद है कि सऊदी अरब आने वाले समय में वो भारत के ढांचागत क्षेत्र में भी अपना निवेश बढाएगा। सऊदी अरब भारत का चौथा बडा व्यापारिक साझेदार उस समय बना जब भारत के पश्चिमी देशों से संबंधों में सुधार हुआ और उसका आर्थिक विकास बढकर 6 से 8 प्रतिशत हुआ।
वही समय था जब अमेरिका में शेल ऑयल के निकलने से सऊदी अरब से निकलने वाले तेल पर उसकी निर्भरता समाप्त हो रही थी। इस कारण सऊदी अरब को नए बाजार की तलाश थी। जिसमें भारत एक प्रमुख भरोसेमंद देश था। इसी समय बाजार में प्रतिबंध के कारण गृहयुद्ध के चलते इराकी तेल में कमी भी हो गई।
इस कारण तेल के दाम बढकर 150 डॉलर पहुंच गए। तेल की कीमत में बढोतरी के कारण सऊदी अरब को अपनी अतिरिक्त पूंजी (सरप्लस मनी) भारत, चीन तथा दूसरे देशों में लगाने पर मजबूर होना पडा। यहां सबको अच्छा लाभ मिलने की संभावना थी। अब तेल के दामों में कमी के कारण उन्हें वैकल्पिक साधनों की तलाश है।