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एक बेबस और बदहाल शहर की कहानी
Updated Sat, 24 Nov 2012 11:29 PM IST
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जैसे ही आप गज़ा को छोड़ते हैं और सीमा की दूसरी तरफ आ जाते हैं तो अचानक आपको महसूस होता है कि जैसे रिहा हुए हों, जेल से बाहर आ गए हों।
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जब भी मैं गज़ा छोड़ता हूं तो मुझे ऐसा ही लगता है। मेरे शहर में इजरायल की बमबामी शुरु होने से तीन हफ्ते पहले मुझे एक कोर्स के लिए लंदन जाना पड़ा। मैं अपने परिवार और दोस्तों को वहां छोड़ कर आया हूं।
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जिस जगह को आप जानते हैं उसे टीवी पर देखना और वो भी वहां से धुआं उठता हुआ देखना बहुत ही अजीब अहसास होता है।
जब इजरायली रॉकेटों ने गजा के मध्य में उस इमारत को निशाना बनाया जिसमें कई टीवी कंपनियों के दफ्तर हैं, तो मुझे बहुत ही अजीब लगा। ये वही इमारत है जहां से मैंने 2009 के गज़ा युद्ध की बीबीसी के लिए रिपोर्टिंग की थी।
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छह स्थानीय पत्रकार घायल हो गए। मेरे एक दोस्त को अपनी टांग गंवानी पड़ी। मैं सोचता हूं कि मैं भी वहां हो सकता था।
मुश्किल जिंदगी
गज़ा एक छोटी सी जगह है। लगभग 41 किलोमीटर लंबी और छह से 14 किलोमीटर तक चौड़ी। वहां लगभग 15 लाख लोग रहते हैं। 2005 से पहले गज़ा के 40 प्रतिशत क्षेत्रफल में इजरायली बस्तियां थीं।
उनमें सिर्फ 5000-6000 इजरायली रहते थे थे जबकि बाकी आधे हिस्से में पंद्रह लाख फलस्तीनी लोग बसे थे।
अब गज़ा तीन तरफ से सील किया हुआ है। इजरायल, और यहां तक कि मिस्र ने भी उसके जमीन, समुद्र और आकाश पर बंदिश लगा रखी है। आप न कहीं जा सकते हैं और न ही कुछ कर सकते हैं।
अगर आप भाग्यशाली हैं तो आपके पास नौकरी होगी और नौकरी भी होगी तो मेहनताना बहुत कम होगा। किसी तरह की सुरक्षा नहीं होगी।
जिस इलाके में बमबारी हुई, वहां बड़ी आबादी रहती है। गज़ा की आधी आबादी बच्चे हैं जो सड़कों पर खेलते रहते हैं। उनके पास खेलने की कोई जगह नहीं है। बस गर्मियों में समुद्र के किनारे जा सकते हैं।
वहां भी कोई सुरक्षा नहीं है। वहां गंदा पानी जाता है, सो आप तैर नहीं सकते हैं। अगर मुझे समंदर में डुबकी लगानी है तो इसके लिए दक्षिण में मिस्र की सीमा या फिर उत्तर में इजरायल की सीमा के करीब जाना होगा।
लेकिन वहां से इजरायली तटरक्षकों की नौकाएं ज्यादा दूर नहीं रह जाती हैं। वो तट से दूर तक मछली पकड़ने वाली नौकाओं पर गोलियां चलाती हैं जिनका निशाना लोग भी बनते हैं।
बमबारी के साए में जिंदगी
गज़ा में एक फलस्तीनी घर का मतलब है कॉन्क्रीट की दीवारें और उन पर लोहे की चादर वाली छत। गर्मियों में ये घर तप जाते हैं और किसी तरह की एयरकंडीशन नहीं होता है और हो भी, तो उसे चलाने के लिए बिजली नहीं होती।
सर्दियों में दीवारें जम जाती हैं और गज़ा के घरों में उन्हें गर्म करने वाला कोई हीटिंग सिस्टम नहीं होता। जहां तक बात इलेक्ट्रिक हीटरों की है, उनके लिए फिर बिजली की किल्लत सामने आती है।
अब मैं गज़ा को देखता हूं तो मुझे 2009 के ऑपरेशन “कास्ट लीड” की याद आ जाती है। गज़ा में किसी सायरन की जरूरत नहीं होती। कर्फ्यू का एलान भी नहीं होता, बस वो लागू हो जाता है। लोग जानते हैं कि कोई भी चलती फिरती चीज इजरायली लड़ाकू विमानों का निशाना बन जाती है।
2009 के युद्ध से पहले गज़ा में थोड़ी बहुत खेती होती थी और कुछ उद्योग होते थे, जो सब्जियां, स्ट्रॉबैरी, फूल उगाते और फर्नीचर बनाते और उन्हें निर्यात करते थे। लेकिन युद्ध के बाद 95 प्रतिशत निजी उद्योगों को बंद कर दिया गया।
आज गज़ा अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इजरायल पर निर्भर है। वो भी सिर्फ इकलौती खुली चौकी किर्म शालोम से होती है। बाकी आपूर्ति मिस्र से सुरंगों के जरिए होती है।
गुस्सा और नफरत
घेराबंदी, रोक, हमले, गोलाबारी और जेल जैसे हालात में रहने की भावना से लोगों में गुस्सा और नफरत बढ़ती है और इससे कट्टरपंथ हो हवा मिलती है। इसी से युवा पीढ़ी की सोच को आकार मिलता है।
मैं नहीं समझता कि ये पीढ़ी राजनीतिक बनेगी- गज़ा के सभी लोग अब राजनीतिक नहीं है और उनमें से बहुत से लोग न तो हमास का समर्थन करते हैं और न फतह का, भले वे ऐसा खुल कर नहीं कह पाते हों।
लेकिन मैं जिन युवाओं को जानता हूं वो अपने आसपास खून को छीटों को देख देख कर बड़े हुए हैं। वे नहीं जानते हैं कि सामान्य जिंदगी क्या होती है- ये हाल आधी आबादी का है।
मेरे शहर का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिखता है।