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फिल्मों ने मुझे आवाज दी, पहचान दी: हायफा
Updated Fri, 19 Jul 2013 08:02 AM IST
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सऊदी अरब में महिलाएं न तो मतदान कर सकती हैं, न गाड़ी चला सकती हैं और न ही उन्हें इस बात की इजाज़त है कि वो पुरुषों के साथ काम करें।
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ऐसे में जब हायफ़ा अल-मंसूर अपनी पढ़ाई पूरी कर सऊदी अरब लौटीं तो उन्हें लगा कि जैसा उनका कोई वजूद ही नहीं रह गया है।
सऊदी अरब एक पुरुष प्रधान समाज है। ऐसे में न तो हायफ़ा की आवाज़ को सुनने वाला कोई था और न ही उनकी शख़्शियत को महत्व देने वाला। इस बात से बेहद निराश हायफ़ा ने ठाना कि वो कुछ ऐसा कर दिखाएंगी जिससे उनकी बात, उनकी आवाज़ लोगों तक पहुंचे। उनकी इसी सोच ने उन्हें साऊदी अरब की पहली महिला फ़िल्मकार बना दिया।
हायफ़ा की फ़िल्म ‘वाजिदा’ को दुनिया भर में सराहा जा रहा है। हाल ही में जब वो बीबीसी के लंदन स्टूडियो आईं तो उन्होंने बताया कि निर्देशन की ओर कैसे बढ़े उनके क़दम।
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वो कहती हैं, ''मेरे ही देश में न तो मेरी आवाज़ सुनी जा रही थी और मेरे होने या न होने से किसी को कोई फर्क पड़ रहा था। ये बात मुझे बहुत खल रही थी, परेशान कर रही थी।''
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हायफ़ा कहती हैं, ''फ़िल्म बनाना तो मैंने एक रूचि के तौर पर लिया। एक शॉर्ट फ़िल्म बना कर मैंने उसे आबू-धाबी में होने वाली एक प्रतियोगिता में भेजा। उन्होंने मेरी फ़िल्म को प्रतियोगिता के लिए चुन लिया। मुझे वहां बुलाया गया। जब मैं वहां पहुंची तो उन्होंने मुझसे कहा कि मैं सऊदी अरब की पहली महिला फ़िल्मकार हूं। इस बात को सुनकर मुझे कितनी ख़ुशी हुई मैं आपको बता भी नहीं सकती।''
हालंकि हायफ़ा कहती हैं कि उन्हें इस बात का गर्व है कि वो सऊदी अरब की पहली महिला फ़िल्म निर्देशक हैं। लेकिन उन्होंने फ़िल्में बनाना सिर्फ़ इस टैग के लिए नहीं शुरु किया। वो फ़िल्मकार इसलिए बनी ताकि उनकी एक पहचान बने।
अब तो बतौर फ़िल्मकार हायफ़ा अपनी पहचान बना चुकी हैं लेकिन फ़िल्मों के प्रति उनका ये जो लगाव है उसकी शुरुआत हुई कैसे?
इस सवाल का जवाब देते हुए हायफ़ा कहती हैं, ''मैं सऊदी के छोटे से शहर से हूं। हम 12 भाई बहन हैं। हमारे घर में ख़ूब शोर रहता था। हमें शांत रखने के लिए मेरे पिता हमारे लिए फ़िल्में लाया करते थे। ये फ़िल्म या तो जैकी शीन की होती थी या फिर ब्रूस ली की। तो बस बचपन से ही मुझे फ़िल्मों से प्यार हो गया।''
हायफ़ा की फ़िल्म 'वाजिद' एक ऐसी छोटी लड़की की कहानी है जो एक हरे रंग की साइकल ख़रीदना चाहती है। लेकिन लड़की होने के कारण उसे साइकल ख़रीदने के लिए न तो इजाज़त मिलती है और न ही पैसे। फ़िल्म में दिखाया गया है कि कैसे ये लड़की साइकल ख़रीदने के लिए पैसे जमा करती हैं।
हायफ़ा कहती हैं कि अपनी इस फ़िल्म के ज़रिए वो ये दिखाना चाहती थी कि कैसे उनका देश नए और पुराने के बीच ताल-मेल बिठा रहा है। वो कहती हैं, ''सऊदी अरब एक आधुनिक देश है, यहां बड़ी इमारतों से लेकर आधुनिक तकनीक सब मौजूद है। लेकिन अभी भी लोगों की मानसिकता बहुत पारंपरिक है। ये मेरी फ़िल्म की कहानी के लिए एक बेहतरीन पृष्ठभूमि थी।''
साथ ही हायफ़ा ये भी साफ़ कर देना चाहती हैं कि वो अपनी इस फ़िल्म के ज़रिए सिर्फ ये नहीं बताने कि कोशिश कर रहीं कि सऊदी अरब पुरुष प्रधान है बल्कि वो ये दिखाने की कोशिश भी कर रहीं हैं कि कैसे ये लड़की मुश्किलों का सामना कर अपनी मंज़िल को पाने की कोशिश करती है।
अरबी भाषा में 'वाजिद' का मतलब होता है किसी चीज़ को पाने की चाह। सऊदी अरब में ये फ़िल्म सार्वजनिक तौर पर नहीं दिखाई जा सकती तो जहां तक हायफ़ा की चाहत का सवाल है तो वो बस यही चाहती हैं कि उनकी ये फ़िल्म सऊदी अरब के घर घर में देखी जाए।