'बच्चा पैदा होने के दिन तक करती रहूंगी काम'
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नेपाल में खेती-बाड़ी से जुड़े कामों का बड़ा हिस्सा महिलाएं संभालती हैं। यह काम वो तब भी करती हैं, जब वो गर्भवती होती हैं। जबकि इसका उनके स्वास्थ्य और होने वाले बच्चे पर असर पड़ सकता है।
हिमालयी देश नेपाल के एक गांव पावाटी की निवासी जानुका रासालेई अपने खेत में सब्जियों के पौधे लगा रही हैं। एक घंटे बाद वो लकड़ियां काटने के लिए घर लौटती हैं। इसके पहले वो पहाड़ी पर कड़ी धूप में बकरियों को इकट्ठा करती हैं।
वो कहती हैं, ''सुबह छह बजे जब मैं जागती हूँ तबसे लेकर रात दस बजे तक रात में जब मैं सोने जाती हूँ मैं पूरे समय काम करती रहती हूं। मैं खेतों में सात-आठ घंटे काम करती हूँ।'' जानुका सात महीने से गर्भवती हैं। वो कहती हैं कि पेट बढ़ने के बाद भी यहां की महिलाओं के लिए खेत में कठिन कमरतोड़ मेहनत करना आम बात है। वो कहती हैं, ''बच्चा पैदा होने के दिन तक मैं पूरे समय काम करती रहूँगी।''
गर्भावस्था के अंतिम दिनों तक काम
हाल के सालों में नेपाल ने गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य सुधारने के लिए काफी कुछ किया है। सरकार ने बच्चों की पैदाइश के लिए नए केंद्र बनाए हैं। इससे क्लीनिकों में बच्चे पैदा होने पर आने वाला ख़र्च कम हुआ है। यहाँ अत्यधिक रक्तस्राव की दवा दी जाती है। अत्यधिक रक्तस्राव काफी घातक हो सकता है।
ये प्रयास काम भी कर रहे हैं। इससे बच्चों की पैदाइश के समय होने वाली महिलाओं की मौत के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है। महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए काम करने वाले सांसद अरजू राणा देउबा कहती हैं, ''चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। क्या भविष्य में इसे हम और कम कर सकते हैं।''
वो कहती हैं कि बड़ी समस्या अभी भी वैसी ही हैं कि बहुत से औरतें अपनी गर्भावस्था के अंतिम दिनों में भी काफी कठिन काम करती हैं।
कमरतोड़ मेहनत संस्कृति का हिस्सा
अमेरिका जैसे देशों में जहाँ महिलाओं की नियमित रूप से प्रसव पूर्व देखभाल की जाती है, वहाँ के डॉक्टर गर्भावस्था के दौरान व्यायाम की सलाह देते हैं। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसे इलाक़े जहाँ गर्भवती महिलाओं के लिए कोई चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है और उन्हें पर्याप्त खाना भी नहीं मिलता है, वहाँ यह बेहतर होगा कि वो कठोर काम से बचें। नहीं तो उन्हें गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं।
देउबा कहती हैं कि गर्भवती महिलाएं अपने परिवार की मदद के लिए कमरतोड़ मेहनत करती हैं और यह संस्कृति का हिस्सा है।
देउबा कहती हैं, ''इस तरह के विचारों को नेपाल में सामाजिक मान्यता मिली हुई है। आपको अपनी मौजदूगी का एहसास कराना होता है, आप जो मेहनत करते हैं, वही आपकी की कीमत है।'' वो कहती हैं, ''महिलाएं सोचती हैं कि ये काम उनकी स्वयं की जिम्मेदारी हैं। परिवार के अंदर उनका दर्जा सबसे नीचे है। इसलिए उन्हें कठिन से कठिन परिश्रम करना होता है।''
खेतों से धुएंदार रसोई तक
जानुका जब खेतों में काम नहीं कर रही होती हैं तो वो अपने धुंएदार रसोई में दुबकी रहती हैं, जहाँ वो लकड़ी की अंगीठी में हवा कर आग सुलगाती रहती हैं। वो कहती हैं कि वह कम से कम एक बार इस कठिन काम से छुट्टी लेना चाहती हैं।
जानुका कहती हैं, ''मेरी पीठ दुख रही है। मेरा पेट दुख रहा है। एक महीना पहले मक्के और धान के पौधे लगाते समय मेरे पैरों में सूजन आ गई थी। मेरे शरीर में लगातार दर्द बना हुआ है।''
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जानुका जैसी महिलाओं को काम से छुट्टी लेनी चाहिए। उनका कहना है कि गर्भावस्था के अंतिम दिनों में कठोर परिश्रम की वजह से गर्भाशय अपनी सामान्य स्थिति से सरक सकता है। इस अवस्था को गर्भाशय भ्रंश कहा जाता है। इसकी वजह से कोई महिला बांझ हो सकती है।
पुरुषों के देश छोड़ने की वजह से समस्या
कई घंटों को तक कठोर परिश्रम करने की वजह से पेट में पल रहा बच्चा खाने से वंचित रह सकता है। इसकी वजह से पैदाइश के समय बच्चे का वजन कम हो सकता है और भ्रूण का विकास रुक सकता है, ख़ासकर तब जब माँ का आहार अच्छा न हो। अधिक परिश्रम से गर्भाशय को होने वाली ख़ून की आपूर्ति रुक सकती है, इस वजह से बच्चा समय से पहले पैदा हो जाएगा।
यह समस्याएं उन विकासशील देशों में भी होती हैं, जहाँ महिलाओं से खेती-बाड़ी के काम करने की उम्मीद की जाती है। नेपाल में यह समस्या इसलिए भी बढ़ गई है कि यहाँ के बहुत से पुरुष विदेश में काम करने के लिए देश छोड़ चुके हैं और खेतों की देखभाल के लिए वो महिलाओं को छोड़ गए हैं।
अंतरराष्ट्रीय सहायता संगठन सेव दी चिल्ड्रन की अध्यक्ष कैरोलिन माइल्स कहती हैं, ''माँ के स्वास्थ्य का सीधा प्रभाव बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ता है, इसे बढ़ावा देने के लिए आपके पास क्या है।''
सासें कर रहीं बहू की मदद
माइल्स कहती हैं कि अगर माँ के स्वास्थ्य को लेकर पति और सास चिंतित नहीं हैं, वो अक्सर होने वाले बच्चे के स्वास्थ्य को लेकर बहुत अधिक चिंतित रहते हैं। इसे देखते हुए सेव दी चिल्ड्रन जैसे संगठन परिवारों से मिलकर बच्चे की भलाई के लिए गर्भवती महिलाओं को अधिक से अधिक आराम देने के लिए कह रहा है।
वो कहती हैं, ''अब हम देख रहे हैं कि कुछ सासें आगे आई हैं और कह रही हैं कि मैं अगले महीने से खेतों की देखभाल करने जा रही हूँ या मैं यह सुनिश्चित करने जा रही हूँ कि मेरी बहू को अच्छा और भरपूर खाना मिले।''
माइल्स इसे बड़ा बदलाव बताती हैं। पति भी अपने व्यवहार में बदलाव ला रहे हैं। जानुका जब पहली बार गर्भवती हुई थीं तो उनके पति माधव घर से दूर काम करते थे। लेकिन इस समय जब वह दूसरी बार गर्भवती हुई हैं तो वो उनकी मदद के लिए गाँव लौट आए हैं।
पत्नी की मदद को लौटकर आया पति
माधव कहते हैं कि अपनी पत्नी और होने वाले बच्चे के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए वो लौटकर आए हैं। वो कहते हैं, ''जब मेरी पत्नी खेतों में काम कर रही होती है और कहती है कि उसके पेट में दर्द है तो मैं डर जाता हूँ।''
माधव कहते हैं, ''अपनी पत्नी के पहली गर्भावस्था के समय मैं चिंतित था और अब मैं फिर डरा हुआ हूँ कि यह सब कैसे होगा। इसलिए वह कामकाज में अपनी पत्नी की थोड़ी मदद करते हैं। एक दिन उन्होंने बारिश के पानी से गीले हुए खेत में खुरपे से सुराख बनाया, जबकि जानुका ने उनमें पौधे लगाए।
जानुका कहती हैं कि इससे पहले सारे काम उन्हें ख़ुद ही करने पड़ते थे। वो कहती हैं, ''अपनी पहली गर्भावस्था में मैंने कठिन परिश्रम किया। उसकी तुलना में यह कुछ भी नहीं है।'' पावाती जैसी जगह में गर्भावस्था के अंतिम दिनों में कठिन परिश्रम माताओं और गर्भ में पल रहे बच्चे की भलाई से अलग चीज़ है।
नाभिनाल में फंसा बच्चा!
जब मैं (लेखिका) जानुका से मिली थी, उसके दो महीने बाद में उससे मिली। उसने पास के कस्बे के एक अस्पताल में बच्चे को जन्म देने की योजना बनाई थी। लेकिन उसने थोड़ा पहले ही बच्चे को जन्म दे दिया। इसलिए उसे अस्पताल जाने का मौका नहीं मिला।
उसने बच्चे को घर पर ही जन्म दिया। बच्चे की पैदाइश काफी कठिन हो गई थी। आशंका है कि खेतों में अधिक काम करने की वजह से बच्चा नाभिनाल में फंस गया था। वहाँ बच्चों के जन्म के समय सहायता करने वाला भी कोई नहीं था और एंबुलेंस आने में काफी समय लग जाता। इसका नतीजा यह हुआ कि बच्चे की मौत हो गई।
जानुका कहती हैं कि वो एक और बच्चे की योजना बना रही हैं। उनके पति कुछ महीने बाद कमाने के लिए विदेश चले जाएंगे। लेकिन अभी वो उनकी घर और खेतीबाड़ी के काम में मदद कर रहे हैं।