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'भारत-जापान की करीबी से चीन में हलचल'

Fri, 31 May 2013 08:53 AM IST
बीबीसी
बीबीसी Updated Fri, 31 May 2013 08:53 AM IST
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panic in china by india japan closeness

बर्मा और भारत के साथ जापान की शीर्ष स्तर की बैठकों के बाद चीनी मीडिया जापान पर बेहद आक्रामक हो गया है।

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चीनी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने (चीनी भाषा के संस्करण में) जापान को "मेनोपॉज़ल" यानी रजोनिवृत्त देश करार दिया है, जो असरदार नहीं रह गया।

अख़बार कहता है कि जापान की “चीन को घेरने” की कोशिशें महज़ भ्रम ही हैं। अख़बार की हेडलाइन है: “मेनोपॉज़ल” जापान असंतुलित, चीन को अपने स्तर तक खींचने की कोशिश।

हॉंगकॉंग में बीबीसी संवाददाता सुज़ी लिडेस्टर कहती हैं कि अख़बार का अंग्रेजी संस्करण काफ़ी नरम दिखता है और इसमें 'रजोनिवृत्ति' जैसा का कहीं उल्लेख नहीं है।
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'सिर्फ़ भ्रम'
बीजिंग का हुआन्की शीबाओ (ग्लोबल टाइम्स) लिखता है, “जापान भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का स्वागत कर रहा है और दोनों देश नौसैनिक सुरक्षा सहयोग पर बात कर रहे हैं। कुछ ही दिन पहले जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे बर्मा गए थे। बहुत से लोग इसे चीन को घेरने के जापान के ‘खेल’ की तरह देख रहे हैं।
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“जापान चीन के समक्ष बहुत कमज़ोर पड़ चुका है, न सिर्फ़ शक्ति के स्तर पर बल्कि मानसिक रूप से भी। हमें न तो एक ‘मेनोपॉज़ल’ देश के साथ ‘मौत तक संघर्ष’ करने की ज़रूरत है और न ही जापान के साथ झगड़े को लेकर खुद को दोष देने की ज़रूरत है।”

अख़बार आगे कहता है, “उच्च आत्मविश्वास और गुस्से के बगैर ताकत के प्रदर्शन के साथ चीन का एक असली शक्ति बनना तय है। चीन को न तो जापान के साथ प्रदर्शन की होड़ में शामिल होने की ज़रूरत है और न ही मेल-मिलाप करने की।”

भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चार दिन की जापान यात्रा पर थे और दोनों देशों ने नौसैनिक सुरक्षा सहयोग पर चर्चा की है।

कुछ दिन पहले जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे बर्मा गए थे। इसे जापान की चीन को टुकड़ा-टुकड़ा घेरने के खेल का हिस्सा माना जा रहा है।

जापान की रणनीति चीन के पड़ोस में अपनी सक्रियता बढ़ाने की है। जापान की सावधानी से साबित होता है कि 21वीं सदी में जापान पर चीन का भारी प्रभाव रहेगा।

लेकिन चीन को घेरने की जापान की सोच सिर्फ़ एक भ्रम ही है। चीन के साथ प्रतियोगिता कर वह कुछ मोलभाव तो हासिल कर सकता है लेकिन एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना उसके बस में नहीं है।

लंबा है रास्ता
चीन की बढ़ती ताकत ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बदल दिया है। इससे चीन के साथ विशेष भौगोलिक परिस्थितियां साझा करने वाले जापान को तकलीफ़देह प्रभाव झेलना पड़ रहा है।

जापान को यह हकीकत समझने में वक्त लगेगा कि चाहे वह एक वक्त पूर्वी एशिया की एकमात्र शक्ति रहा हो लेकिन अब उसे चीन के लिए रास्ता ख़ाली करना पड़ेगा, जिसकी जीडीपी और नौसैनिक शक्ति जापान को दरकिनार कर देगी।

यह प्रक्रिया जापान के लिए मुश्किल होगी लेकिन यह एक न एक दिन तो होना ही है। जापान जो तरीके आज़मा रहा है वह उसे राहत देने की कोशिशें भर हैं लेकिन इनका एशिया के विकास पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा।

अपने देश का मनोबल ऊंचा रखने के लिए जापान चीन के मुकाबले अपनी अवनति को छुपाने की हर कोशिश कर रहा है। लेकिन चीन को अपना आत्मविश्वास पाने और ताकत साबित करने के लिए जापान के साथ प्रतियोगिता करने की ज़रूरत नहीं है।

चीन और जापान के बीच जारी तनाव को “रणनीतिक” कहने की ज़रूरत नहीं है। दरअसल जापान और चीन का संपूर्ण रणनीतिक भविष्य पहले ही तय हो चुका है।

दोनों देशों के बीच मतभेदों से होने वाले फ़ायदे या नुकसान से किसी भी देश के भविष्य पर असर नहीं पड़ने वाला। चीन को चापान पर बहुत ज़्यादा ऊर्जा खर्च करने की ज़रूरत भी नहीं है।

एक विकसित होता और युवा चीनी समाज को जापान के साथ संघर्ष को टाल नहीं सकता। आत्मविश्वास के साथ एक महान शक्ति के रूप में विकसित होने के लिए चीन को परिपक्व होना पड़ेगा और यह रास्ता अभी लंबा है।

विकास की राह
चीन और जापान के बीच आखिरी फ़ैसला करने का यह वक्त नहीं है और न ही चीन के लिए जापान के साथ अपने संबंध दुरुस्त करने का मौका है। चीन को बस इसे “आराम से लेना चाहिए।”

चीन को यह समझना चाहिए कि जापान की कोशिशें चीन की रणनीति को कभी प्रभावित नहीं कर सकतीं। चीन को यह तय करना होगा कि वह कब और कितनी गंभीरता से इसका जवाब देता है।


दरअसल चीन और जापान दोनों को ही एक दूसरे की राह रोकने, अवरोध बनने से बचना होगा। सिर्फ़ आपसी विश्वास और आदर से ही दोनों शांतिपूर्वक साथ-साथ रह सकते हैं।

यह माना जाता है कि यह सह-अस्तित्व न सिर्फ़ दोनों देशों के विकास के लिए सहयोगी होगा बल्कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की शांति और विकास में भी योगदान देगा।

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