मलेशियाई हिंदू जो जोड़ रहा है धर्मो को

sachin yadavसचिन यादव Updated Wed, 23 Oct 2013 12:57 PM IST
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one hindu youth works for communal harmony

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मलेशिया में रहने वाले उथया शंकर का जन्म हिंदू परिवार में हुआ लेकिन बचपन में वे अकसर चर्च जाते थे और कभी मस्जिद में भी खेलते भी थे।
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वे कहते हैं कि अलग अलग धर्मों के लोगों से मिलने में बहुत मजा आता था। लेकिन 90 का दशक आते आते चीजें बदलने लगीं।
अब 41 साल के हो चुके उथया बताते हैं, “लोगों ने एक दूसरे के धार्मिक स्थानों पर जाना बंद कर दिया। राजनीतिक फायदे के लिए मलेशिया की राजनीतिक पार्टियों ने समानताओं की जगह धार्मिक भेदों पर जोर देना शुरु कर दिया।”
इसलिए 2010 में उन्होंने एक ऐसा मंच बनाने की सोची, जिसमें मलेशिया के सभी लोग धर्म और नस्ल की बात खुलकर कर सकें। वे टूर का आयोजन करते हैं जिसमें युवाओं को अलग अलग धार्मिक स्थलों पर ले जाया जाता है- मस्जिद, मंदिर, चर्च सभी जगह।

कुछ दिन पहले ही उथया कुछ युवाओं और छात्रों को कुआलालालंपुर के हिंदू मंदिर में लेकर गए थे, जहाँ उन्होंने हर मूर्ति के बारे में लोगों को बताया।

परज़ूएस जेम्स भारतीय मूल के ईसाई हैं और इस टूर का हिस्सा बने। वे इससे पहले कभी किसी मस्जिद में नहीं गए थे।

वे कहते हैं, “मुझे शर्म महसूस हुई कि दूसरे धर्मों के बारे में इतनी कम जानकारी है। मैं पहले सोचता था कि सिर्फ मुसलमान ही मस्जिद में जा सकते हैं।”

पहली बार देखा गुरुद्वारा
इस टूर का हिस्सा रहे 27 साल के रेनर के पिता चीनी बौद्ध हैं और माँ ईसाई। रेनर कहते हैं, “दूसरों के धर्मों के बारे में मुझे कुछ पता नहीं था। मुझे नहीं लगता कि हमें अपने दोस्तों से इसके बारे में बात करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।”

28 साल की नोर आर्लीन मुसलमान हैं और उनका परिवार मलेशिया, चीनी और पुर्तगाली मूल का है। वे इस टूर के तहत चीनी बौद्ध मंदिर गई और हिंदू और मुसलमान लोगों के साथ मिलकर वहाँ अगरबत्ती जलाई।

उथया शंकर तुरंत ही ये सारी तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अपना संदेश फैलाने का ये बढ़िया माध्यम है।

पर्यवेक्षकों का कहना है कि नस्लीय और धार्मिक मतभेद बढ़ रहे हैं, ऐसे समय में उथया शंकर का अभियान काबीले तारीफ़ है।

सात फ़ीसदी भारतीय
दो तिहाई मलेशियाई लोग भूमिपुत्र कहलाते हैं जो मूलत वहीं के हैं, एक चौथाई चीनी मूल के लोग हैं और सात फ़ीसदी भारतीय मूल के। सबसे ज़्यादा मुसलमान हैं जिसके बाद हिंदू, ईसाई और बौद्ध समुदाय के लोग।

लेकिन मलेशिया में धार्मिक आज़ादी की क्या सीमा है, इसका नमूना भी मिल जाता है। मिसाल के तौर पर मस्जिद के पास धार्मिक मामलों के विभाग के एक पोस्टर लगा है कि मलेशिया में सिर्फ़ सुन्नी इस्लाम का पालन किया जा सकता है और शिया इस्लाम के खिलाफ़ 1996 से ही फ़तवा है।

हालांकि प्रधानमंत्री नजीब रज़ाक ने वन मलेशिया नाम का अभियान चलाया था जिसे भारतीय हिंदू, ईसाई, बौद्ध और चीनी वोट जुटाने का एक असफल अभियान माना जाता है। आयोजकों को उम्मीद है कि ज़्यादा से ज़्यादा युवा ये संदेश फैलाएँगे कि मलेशियाई लोगों में बहुत सी आपसी समानताएँ हैं।
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