म्यांमार: बांग्लादेश में रोहिंग्या मुसलमानों का 'दर्द न जाने कोय'
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म्यांमार के रखाइन प्रांत में हिंसा से प्रभावित सैंकड़ों अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश की तरफ पलायन कर रहे हैं। ये अपने परिवार और जो कुछ भी सामान साथ आ सका उसे लेकर सीमा पार कर बांग्लादेश पहुंच रहे और वहां बेहद दयनीय स्थिति में जी रहे हैं।
कॉक्स बाजार से करीब एक घंटे की दूरी पर है कुटापलौंग जहां पर एक बड़ा शरणार्थी शिविर है। पिछले कई सालों से आए रोहिंग्या शरणार्थी यहां रह रहे हैं। यहां हमने सुना है कि बीस तीस हजार शरणार्थी रहते थे।
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लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से यहां काफी लोग आए हैं, और बताया जा रहा है कि अब यहां 70 हज़ार से भी अधिक लोग हैं. मैंने पहले भी इस शिविर का दौरा किया है और पाया कि पीने का स्वच्छ पानी यहां की बड़ी जरूरत है।
कुछ सहायता एजेंसियां मदद पहुंचाने के लिए यहां कैंप लगाए हुए हैं लेकिन यहां दिन पर दिन लोगों की समस्या बढ़ती ही जा रही है और म्यांमार की तरफ से पलायन भी रुक नहीं रहा।
म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों का आगमन जारी है
म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों का आगमन जारी है, हालांकि आने वालों की संख्या में फिलहाल थोड़ी कमी आई है। जिस दिन हम पहुंचे तो सड़क कुटापलौंग की सड़क के दोनों तरफ रोहिंग्या शरणार्थियों की भीड़ लगी हुई थी। लोग रहने की जगह तलाशने के लिए चले जा रहे थे।
पलायन कर आने वालों में हर उम्र के लोग दिख जाएंगे। छोटे-छोटे बच्चों के साथ किसी तरह जान बचाकर बांग्लादेश पहुंचीं महिलाएं रहने की जगह की तलाश में भटक रही हैं। सहायता एजेंसियां मदद की कोशिश कर तो रही हैं लेकिन ऐसा लगता है कि सहायता सामग्री पहुंचाने में कोई तालमेल नहीं है।
रोहिंग्या मुस्लिमों को है सहायता की दरकार
सहायता सामग्री लेकर जैसे ही कोई ट्रक आता है, आस पास अफरा-तफरी मच जाती है। सामानों को कर्मचारी ट्रक के ऊपर से लोगों तक देने की कोशिश करते हैं। संयुक्त राष्ट्र की सहायता एजेंसी ने भी और तालमेल की जरूरत को माना है।
एजेंसी का ये भी कहना है कि बांग्लादेश की सरकार की ओर से कुछ खास इलाकों में ही काम करने की पाबंदी ने इस समस्या को बढ़ाया है। इसलिए कुछ ही कैंप हैं, जहां उन्हें काम करने की इजाजत है।
जो शरणार्थी दूर दराज या कैंप से अलग रह रहे हैं, उन तक कोई सहायता सामग्री नहीं पहुंच पा रही है। शरणार्थियों में बच्चों और महिलाओं की संख्या अधिक है।
इनमें से नवजात बच्चों की भी भारी संख्या है। शरणार्थियों को सबसे अधिक समस्या रहने की आ रही है। आने वाले लोग यहां के व्यापारियों से बांस खरीदते हैं। वे बांस के सहारे तारपोलीन लगाकर झुग्गीनुमा घर बनाते हैं।
रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों के लिए रहने को घर नहीं
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जिनके पास पैसा है, वो नाव के सहारे इस तरफ आ जा रहे हैं, लेकिन जिनके पास पैसा नहीं है, वो एक तरह से म्यांमार में ही फंसे हुए हैं और उनके दिल में म्यांमार सेना का बहुत डर समाया हुआ है। उन्हें लगता है कि अगर वो यहां रहे और पकड़े गए तो मार दिए जाएंगे।