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बर्मा में मुस्लिम-बौद्ध दंगे, आपातकाल की घोषणा

Sat, 23 Mar 2013 01:08 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Sat, 23 Mar 2013 01:08 PM IST
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muslims buddhist riot in burma emergency declared

बर्मा के शहर मेकटिला में बौद्ध धर्म और मुस्लिम समुदाय के बीच तीन दिनों तक छिड़ी सांप्रदायिक हिंसा के बाद आपात स्थिति की घोषणा कर दी गई है।

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एक सरकारी चैनल पर राष्ट्रपति थीन सेन की ओर से इस फैसले की घोषणा की गई। बयान में कहा गया है कि इस कदम से मैंडले के दक्षिण में मौजूद इस दंगा प्रभावित क्षेत्र में शांति व्यवस्था को बनाए रखने में मदद मिलेगी।
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जब से हिंसा शुरू हुई है तब से लेकर अब तक संभवतः कम से कम 20 लोग मारे गए हैं लेकिन अभी आंकड़े स्पष्ट नहीं हैं।

शहरी इलाके से आए एक बीबीसी संवाददाता का कहना है कि उन्होंने करीब 20 मुसलमानों के शव देखे जिसे स्थानीय लोग जलाने की कोशिश कर रहे थे।

क्या हैं हालात
मेकटिला के सांसद विन थेन ने बीबीसी की बर्मा सेवा को बताया कि बौद्ध धर्म के ज्यादातर लोग जिन पर हिंसा में शामिल रहने का आरोप था, उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार किया है।
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उन्होंने कहा कि उन्होंने शुक्रवार की सुबह शहर में हिंसा में मारे गए आठ लोगों के शव भी देखे। विन का कहना है कि शुक्रवार सुबह हुई हिंसा अब थम गई है लेकिन मेकटिला में अब भी माहौल तनावपूर्ण है।

पुलिस का कहना है कि शुक्रवार को 15 बौद्ध साधुओं ने शहर के बाहरी इलाके में मौजूद एक मुसलमान परिवार के घर को जला दिया था। हालांकि इसमें किसी के हताहत होने की कोई खबर नहीं है।


शहर के लोगों ने बीबीसी को बताया कि शहर का मुख्य बाजार पांच दिन तक बंद रहा जिसके चलते खाने-पीने के सामान की कमी पड़ गई।

मेकटिला में सैकड़ों पुलिसकर्मी भेजे गए हैं। वे पुरुषों और महिलाओं को उनके जले हुए घर से निकालने की कोशिश कर रहे हैं।

हालांकि पुलिस पर यह आरोप लगते रहे हैं कि वे दोनों समुदायों के लोगों को हताहत होने से बचाने के लिए उम्मीद के मुताबिक कुछ नहीं कर रहे हैं।

हिंसा नई नहीं
बीबीसी के दक्षिण पूर्व एशिया के संवाददाता जोनाथन हेड का कहना है कि ताज़ा सांप्रदायिक हिंसा बर्मा के पश्चिमी राज्य रखीन में बौद्धों और मुसलमानों के बीच छिड़े संघर्ष की ही एक कड़ी है जिसमें करीब 200 लोग मारे गए थे और हजारों लोग विस्थापित होने के लिए मजबूर हुए थे।

रखीन में हुई सांप्रदायिक हिंसा बौद्ध धर्म के लोगों और रोहिंग्या मुसलमान के बीच हुआ जिन्हें बर्मा का नागरिक नहीं माना जाता है। सरकार को अब भी इस संघर्ष को विराम देने के लिए कोई लंबी अवधि का प्रस्ताव पेश करना है।

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