तालिबान सरगना ही है कांधार कांड का मास्टरमाइंड
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कांधार विमान अपहरण कांड के बारे में नई गुत्थी सुलझी है। तालिबान के नए चीफ मुल्ला अख्तर मुहम्मद मंसूर को इस कांड का मास्टर माइंड बताया जा रहा है। इस केस में शामिल अधिकारियों के मुताबिक मुल्ला मंसूर ने ही अपहरण की साजिश रची थी।
तालिबान का सिविल एविएशन मिनिस्टर के पद पर रहते हुए मुल्ला मंसूर ने अपने साथी तालिबान के विदेश मंत्री वकील अहमद मुत्तवकिल और कांधार कोर कमांडर अख्तर मुहम्मद उस्मानी के साथ इस अपहरण कांड को अंजाम दिया था।
भारतीय खूफिया एजेंसी के अधिकारियों यकीन है कि मुल्ला मंसूर वो सारी जानकारी मुहैया करा सकता है जब अफगान स्थित आईएसआई ने अपहरणकर्ताओं को हथियार और गोला-बारूद बरामद करवाया था। ये मदद उस समय की गई थी जब विमान अपहरणकर्ताओं के कब्जे में था।
आईएसआई ने की थी अपहरणकर्ताओं की मदद
पूर्व रॉ चीफ सी.डी. सहाय के मुताबिक इस वारदात को अंजाम देने के लिए अपहरणकर्ता मिठाई के डिब्बे में पिस्तोल रखकर नेपाल के काठमांडू में विमान में सवार हुए थे। लेकिन जब विमान को अपहरण करते लैड किया गया तो उनके पास अत्याधुनिक हथियार और गोला-बारूद था। इसका मतलब उन्हें जरूर ये सब मुहैया कराया गया था।
तालिबान के पतन के बाद जब संगठन के सदस्य मुत्तवकिल ने अमेरिका को आत्मसमर्पण कर दिया था तो उस समय सीबीआई चीफ मुलिंजा नारायणन को मुत्तवकिल से बात करने की अनुमति मिल गई थी। मुत्तवकिल इस कांड से जुड़ी कोई भी सूचना देने से साफ मुकरा गया था।
सीबीआई पूर्व कांधार कॉर्फ्स कमांडर उस्मानी से भी इस कांड के बारे में जानकारियां जुटाना चाहती थी लेकिन इससे पहले ही साल 2006 में हेलमंड प्रांत में तालिबान पर हुए हवाई हमले में उस्मानी मारा गया।
‘भारत सरकार को तीनों आतंकियों पर करनी चाहिए थी कार्रवाई’
अपहरणकर्ताओं से विमान को छुड़ाने के लिए बिचौलिए की भूमिका निभाने वाले पूर्व राजनयिक विवेक काटजू ने कहा था कि भारत सरकार को तीनों आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।
मुल्ला मंसूर के बारे में कहा जाता है कि उसका जन्म कांधार मंडल में सन 1960 में हुआ था। साल 2007 में क्वेटा में उसे तालिबान का सुप्रीम पॉलिटिकल और मिलिट्री काउंसिल बनाया गया था।
इस दौरान खोस्त, पक्तिया, पाकतिका और अफगानिस्तान में संगठन में होने वाली गतिविधियों में उसका सीधा हस्तक्षेप था। अफगानिस्तान की खूफिया एजेंसी के मुताबिक मुल्ला मंसूर नशीले पदार्थों से तालिबान के लिए पैसा जुटाता था।
जब गनी बारादर की जगह मुल्ला मंसूर बना वारिस
तालिबान के पूर्व सरगना मुल्ला मुहम्मद उमर ने मुल्ला मंसूर को फरवरी 2010 में मुल्ला अब्दुल गनी बारादर की जगह संगठन का वारिस घोषित कर दिया।
उधर बारादर को पाकिस्तान के करांची में आईएसआई ने गिरफ्तार कर लिया। तब से उसे लोगों के बीच नहीं देखा गया। साल 2013 में तत्कालीन अफगान राष्ट्रपति हमिद करजई और बारादर के लोगों के बीच बातचीत हुई, लेकिन उसे एक वादे के साथ आईएसआई ने अफगानिस्तान को सौंप दिया।
मुल्ला मंसूर के तालिबान का नया चीफ बनने को पाकिस्तान के मध्यस्थ की भूमिका में देखा जा रहा है जो उन सौदों को गति दे सकता है, जो इस्लामी विद्रोही समूह और अफगान सरकार बीच अटके पड़े हैं।
मुल्ला मंसूर के जिहादी मंसूबे
अफगान तालिबान के नए नेता मुल्ला अख्तर मंसूर ने अपने एक ऑडियो संदेश में एकजुटता का आह्वान करते हुए कहा है कि उनका गुट अपनी लड़ाई जारी रखेगा। मुल्ला उमर की मौत के बाद मुल्ला मंसूर को गुरुवार को अफगान तालिबान का नया नेता चुना गया था।
लेकिन कहा जा रहा है कि मुल्ला मंसूर को सभी तालिबान ने नहीं चुना है और ये शरिया कानून के खिलाफ है। मुल्ला अख्तर मंसूर ने अपने ऑडियो संदेश में कहा है कि लड़ाकों को एकजुट होना चाहिए क्योंकि मतभेद से शत्रुयों को फायदा होगा।
इसमें ये भी कहा गया है कि तालिबान देश में इस्लामी कानून लाने के लिए अपनी जिहाद जारी रखेगा।