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यहां से आता है उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के लिए पैसा
बीबीसी हिंदी
Updated Thu, 19 Apr 2018 06:43 PM IST
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उत्तर कोरिया के पास एक के बाद एक मिसाइल बनाने के लिए पैसा कहां से आता है?
तकरीबन दो साल से कई देशों में चल रही एक जांच की मानें तो करीब डेढ़ लाख उत्तर कोरियाई लोग दूसरे देशों में रहकर पैसा कमाते हैं और यही पैसा किम जोंग-उन के परमाणु कार्यक्रम में इस्तेमाल होता है।
खुफिया तरीके से की गई यह जांच अलग-अलग देशों के कुछ पत्रकारों ने एक अंतरराष्ट्रीय समूह बनाकर की जिसमें रूस, चीन और पोलेंड में काम कर रहे उत्तर कोरियाई लोगों से बात की गई। इस जांच के मुताबिक ये लोग जो कर रहे हैं उसे 21वीं सदी में होने वाली गुलामी माना जा सकता है।
उत्तर कोरिया के इन लोगों को हर साल एक बिलियन पाउंड यानी करीब 9,335 करोड़ रुपये कमाने के लिए विदेश भेजा गया है।
लंदन में उत्तर कोरिया के उप-राजदूत रहे, थे योंग-हो के मुताबिक इसमें से ज्यादातर पैसा किम जोंग-उन के परमाणु कार्यक्रम में लगाया जाता है। थे योंग-हो कहते हैं, "अगर ये पैसा शांति से देश की तरक्की के लिए खर्च होता तो अर्थव्यवस्था बेहतर हालत में होती। तो फिर सारा पैसा कहां गया? इसे किम और उनके परिवार के ऐशोआराम, परमाणु कार्यक्रम और सेना पर खर्च किया गया। ये एक तथ्य है।"
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इस जांच के दौरान पत्रकारों की एक अंडरकवर टीम रूस के व्लादिवोस्तोक शहर में फ्लैट ढूंढ रहे लोगों की तरह गई और वहां काम करने वाले उत्तर कोरियाई लोगों से मिली।
रिपोर्टर: आपको यहां पर काम करने के कितने रुपये मिलते हैं?
उत्तर कोरियाई व्यक्ति: अभी सब कुछ हमारे कप्तान को मिलता है।
रिपोर्टर: कप्तान? जो इस समय इंचार्ज है? कोई रूसी व्यक्ति?
उत्तर कोरियाई व्यक्ति: नहीं, एक उत्तर कोरियाई शख्स।
ये लोग अजनबियों के साथ खुलकर बात करने में हिचक रहे थे लेकिन एक मजदूर नाम छुपाने की शर्त पर कोरियाई पत्रकार से बात करने के लिए तैयार हो गया।
उत्तर कोरियाई मजदूर: "यहां पर आपके साथ कुत्तों जैसा व्यवहार होता है और ढंग से खाने को भी नहीं मिलता। यहां रहते हुए आप खुद को इंसान मानना बंद कर देते हैं।"
इस मजदूर ने भी बताया कि उन्हें अपनी ज्यादातर कमाई किसी और को सौंपनी होती है।
उत्तर कोरियाई मजदूर: "कुछ लोग इसे पार्टी के प्रति हमारी जिम्मेदारी बताते हैं तो कुछ इसे क्रांति के प्रति फर्ज कहते हैं। जो ऐसा नहीं कर सकते, वे यहां नहीं रह सकते।"
बताया जाता है कि पोलैंड के शिपयार्ड में 800 उत्तर कोरियाई काम करते हैं जिनमें से ज्यादातर वेल्डर और मजदूर हैं।
जांच कर रही अंडरकवर टीम ने पोलैंड के स्तेचिन शहर में नौकरी देने वाली एक कंपनी के प्रतिनिधि के तौर पर वहां के एक गार्ड से मुलाकात की।
गार्ड: "उत्तर कोरियाई लोग स्तेचिन में सब जगह हैं। वे यहां और दूसरी कंपनियों में भी काम करते हैं। उनकी हालत ऐसी ही है जैसी हमारी साम्यवाद के दौर में थी। आपको पता है कि उन्हें बात करने की इजाजत क्यों नहीं है? कहीं पश्चिम उन्हें लुभा न ले।"
गार्ड ने पत्रकारों की टीम को उत्तर कोरियाई मजदूरों के फोरमैन यानी मुखिया से भी मिलाया।
फोरमैन: "हमारे लोग पोलैंड काम करने आए हैं। वे सिर्फ बगैर वेतन वाली छुट्टियां लेते हैं। जब कम समय में काफी काम करना होता है तो हम बिना रुके काम करते हैं। हम पोलैंड के लोगों की तरह नहीं हैं जो एक दिन में आठ घंटे काम करें और घर चले जाएं। हम ऐसा नहीं करते, हम जब तक जरूरत होती है तब तक काम करते हैं।"
वारसॉ में मौजूद उत्तर कोरियाई दूतावास कहता है कि उसके नागरिक पोलैंड के कानून और यूरोपीय संघ के नियमों के मुताबिक काम कर रहे हैं।
पोलैंड की सरकार के मुताबिक वह लगातार पड़ताल करती रही है और ऐसे कोई सबूत नहीं हैं कि कमाई को उत्तर कोरिया भेजा जा रहा हो।
साथ ही सरकार का कहना है कि पोलैंड ने उत्तर कोरियाई नागरिकों को नए वर्क परमिट जारी करना बंद कर दिया है।
यूएन के प्रतिबंध जारी लेकिन
पूर्व उप-राजदूत थे योंग-हो कहते हैं कि "इसमें कोई शक नहीं है कि विदेशों में काम करने वाले कामगारों की कमाई से उत्तर कोरिया में रह रहे उनके परिवारों का गुजारा चलता है, लेकिन क्या हमें इसके लिए प्रतिबंधों को हटा देना चाहिए? इसके अलावा हम किस तरह उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइलों को रोक सकते हैं?"
एक कंपनी जेएमए ने अपने बयान में कहा है कि उसने उत्तर कोरियाई लोगों को नौकरी पर नहीं रखा है और उसकी जानकारी के मुताबिक उनके सभी कर्मचारी कानूनी रूप से काम कर रहे हैं।
सयुंक्त राष्ट्र संघ ने दिसंबर में उत्तर कोरिया पर नए प्रतिबंध लगाए थे जिसके बाद उत्तर कोरियाई नागरिकों के विदेशों में काम करने पर रोक लगा दी गई है। लेकिन ऐसे देश जहां उत्तर कोरियाई लोग काम कर रहे हैं, उन्हें इस आदेश को मानने के लिए दो साल का समय दिया गया है।
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तकरीबन दो साल से कई देशों में चल रही एक जांच की मानें तो करीब डेढ़ लाख उत्तर कोरियाई लोग दूसरे देशों में रहकर पैसा कमाते हैं और यही पैसा किम जोंग-उन के परमाणु कार्यक्रम में इस्तेमाल होता है।
खुफिया तरीके से की गई यह जांच अलग-अलग देशों के कुछ पत्रकारों ने एक अंतरराष्ट्रीय समूह बनाकर की जिसमें रूस, चीन और पोलेंड में काम कर रहे उत्तर कोरियाई लोगों से बात की गई। इस जांच के मुताबिक ये लोग जो कर रहे हैं उसे 21वीं सदी में होने वाली गुलामी माना जा सकता है।
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उत्तर कोरिया के इन लोगों को हर साल एक बिलियन पाउंड यानी करीब 9,335 करोड़ रुपये कमाने के लिए विदेश भेजा गया है।
लंदन में उत्तर कोरिया के उप-राजदूत रहे, थे योंग-हो के मुताबिक इसमें से ज्यादातर पैसा किम जोंग-उन के परमाणु कार्यक्रम में लगाया जाता है। थे योंग-हो कहते हैं, "अगर ये पैसा शांति से देश की तरक्की के लिए खर्च होता तो अर्थव्यवस्था बेहतर हालत में होती। तो फिर सारा पैसा कहां गया? इसे किम और उनके परिवार के ऐशोआराम, परमाणु कार्यक्रम और सेना पर खर्च किया गया। ये एक तथ्य है।"
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इस जांच के दौरान पत्रकारों की एक अंडरकवर टीम रूस के व्लादिवोस्तोक शहर में फ्लैट ढूंढ रहे लोगों की तरह गई और वहां काम करने वाले उत्तर कोरियाई लोगों से मिली।
रिपोर्टर: आपको यहां पर काम करने के कितने रुपये मिलते हैं?
उत्तर कोरियाई व्यक्ति: अभी सब कुछ हमारे कप्तान को मिलता है।
रिपोर्टर: कप्तान? जो इस समय इंचार्ज है? कोई रूसी व्यक्ति?
उत्तर कोरियाई व्यक्ति: नहीं, एक उत्तर कोरियाई शख्स।
ये लोग अजनबियों के साथ खुलकर बात करने में हिचक रहे थे लेकिन एक मजदूर नाम छुपाने की शर्त पर कोरियाई पत्रकार से बात करने के लिए तैयार हो गया।
उत्तर कोरियाई मजदूर: "यहां पर आपके साथ कुत्तों जैसा व्यवहार होता है और ढंग से खाने को भी नहीं मिलता। यहां रहते हुए आप खुद को इंसान मानना बंद कर देते हैं।"
इस मजदूर ने भी बताया कि उन्हें अपनी ज्यादातर कमाई किसी और को सौंपनी होती है।
उत्तर कोरियाई मजदूर: "कुछ लोग इसे पार्टी के प्रति हमारी जिम्मेदारी बताते हैं तो कुछ इसे क्रांति के प्रति फर्ज कहते हैं। जो ऐसा नहीं कर सकते, वे यहां नहीं रह सकते।"
बताया जाता है कि पोलैंड के शिपयार्ड में 800 उत्तर कोरियाई काम करते हैं जिनमें से ज्यादातर वेल्डर और मजदूर हैं।
जांच कर रही अंडरकवर टीम ने पोलैंड के स्तेचिन शहर में नौकरी देने वाली एक कंपनी के प्रतिनिधि के तौर पर वहां के एक गार्ड से मुलाकात की।
गार्ड: "उत्तर कोरियाई लोग स्तेचिन में सब जगह हैं। वे यहां और दूसरी कंपनियों में भी काम करते हैं। उनकी हालत ऐसी ही है जैसी हमारी साम्यवाद के दौर में थी। आपको पता है कि उन्हें बात करने की इजाजत क्यों नहीं है? कहीं पश्चिम उन्हें लुभा न ले।"
गार्ड ने पत्रकारों की टीम को उत्तर कोरियाई मजदूरों के फोरमैन यानी मुखिया से भी मिलाया।
फोरमैन: "हमारे लोग पोलैंड काम करने आए हैं। वे सिर्फ बगैर वेतन वाली छुट्टियां लेते हैं। जब कम समय में काफी काम करना होता है तो हम बिना रुके काम करते हैं। हम पोलैंड के लोगों की तरह नहीं हैं जो एक दिन में आठ घंटे काम करें और घर चले जाएं। हम ऐसा नहीं करते, हम जब तक जरूरत होती है तब तक काम करते हैं।"
वारसॉ में मौजूद उत्तर कोरियाई दूतावास कहता है कि उसके नागरिक पोलैंड के कानून और यूरोपीय संघ के नियमों के मुताबिक काम कर रहे हैं।
पोलैंड की सरकार के मुताबिक वह लगातार पड़ताल करती रही है और ऐसे कोई सबूत नहीं हैं कि कमाई को उत्तर कोरिया भेजा जा रहा हो।
साथ ही सरकार का कहना है कि पोलैंड ने उत्तर कोरियाई नागरिकों को नए वर्क परमिट जारी करना बंद कर दिया है।
यूएन के प्रतिबंध जारी लेकिन
पूर्व उप-राजदूत थे योंग-हो कहते हैं कि "इसमें कोई शक नहीं है कि विदेशों में काम करने वाले कामगारों की कमाई से उत्तर कोरिया में रह रहे उनके परिवारों का गुजारा चलता है, लेकिन क्या हमें इसके लिए प्रतिबंधों को हटा देना चाहिए? इसके अलावा हम किस तरह उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइलों को रोक सकते हैं?"
एक कंपनी जेएमए ने अपने बयान में कहा है कि उसने उत्तर कोरियाई लोगों को नौकरी पर नहीं रखा है और उसकी जानकारी के मुताबिक उनके सभी कर्मचारी कानूनी रूप से काम कर रहे हैं।
सयुंक्त राष्ट्र संघ ने दिसंबर में उत्तर कोरिया पर नए प्रतिबंध लगाए थे जिसके बाद उत्तर कोरियाई नागरिकों के विदेशों में काम करने पर रोक लगा दी गई है। लेकिन ऐसे देश जहां उत्तर कोरियाई लोग काम कर रहे हैं, उन्हें इस आदेश को मानने के लिए दो साल का समय दिया गया है।