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जापानी वैज्ञानिकों ने बनाई दिमाग को पढ़ने वाली मशीन
एजेंसी, टोक्यो
Updated Fri, 05 Jan 2018 06:34 PM IST
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जापान के वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) की मशीन बनाई है, जो आपके दिमाग को पढ़ सकती है और आप जो सोच रहे हैं या देख रहे हैं, उसकी तस्वीर बना सकती है। इस तकनीक में वैज्ञानिकों ने एमआरआई स्कैनर का प्रयोग किया। दिमाग में रक्त के प्रवाह में होने वाले बदलाव के जरिए उसे पढ़ने की कोशिश की गई।
इस मशीन के प्रयोग के दौरान प्रयोग के लिए खुद को प्रस्तुत करने वाले व्यक्तियों को अलग-अलग चीजें दिखाई गईं, जैसे बत्तख, विमान, खिड़की, उल्लू, शेर आदि। फिर एआई नेटवर्क वाले स्कैनर से दिमाग को पढ़ा गया। यह एआई न्यूरॉन नेटवर्क जैसा है जो ठीक उसी तरह काम करता है जैसे दिमाग।
वैज्ञानिकों के मुताबिक इस स्कैनर ने प्रोजेक्टर पर करीब-करीब वैसी ही तस्वीरें उकेर दीं, जैसी व्यक्तियों को दिखाई गई। यानी जब व्यक्ति ने बत्तख देखा तो एआई ने बत्तख बनाया, जब उन्होंने शेर देखा तो एआई ने शेर बना दिया। वह भी करीब-करीब वैसी ही रंग और आकृति में जैसी व्यक्ति देख रहे थे।
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यह मशीन अक्षरों और अलग-अलग आकृतियों को भी पकड़ने में कामयाब रही। यानी अगर व्यक्ति अक्षरों के बारे में सोच रहे थे, तो मशीन ने उनकी तस्वीर बना दी। क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का दावा है कि यह खोज आंतरिक दुनिया के नए रास्ते खोल देगी।
इससे भविष्य में सपनों की फुटेज बनाने और विकलांग लोगों से बातचीत की नई तकनीक खोजने में मदद मिलेगी। जर्नल बायोरिक्विव में यह शोध प्रकाशित हुआ है।
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इस मशीन के प्रयोग के दौरान प्रयोग के लिए खुद को प्रस्तुत करने वाले व्यक्तियों को अलग-अलग चीजें दिखाई गईं, जैसे बत्तख, विमान, खिड़की, उल्लू, शेर आदि। फिर एआई नेटवर्क वाले स्कैनर से दिमाग को पढ़ा गया। यह एआई न्यूरॉन नेटवर्क जैसा है जो ठीक उसी तरह काम करता है जैसे दिमाग।
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वैज्ञानिकों के मुताबिक इस स्कैनर ने प्रोजेक्टर पर करीब-करीब वैसी ही तस्वीरें उकेर दीं, जैसी व्यक्तियों को दिखाई गई। यानी जब व्यक्ति ने बत्तख देखा तो एआई ने बत्तख बनाया, जब उन्होंने शेर देखा तो एआई ने शेर बना दिया। वह भी करीब-करीब वैसी ही रंग और आकृति में जैसी व्यक्ति देख रहे थे।
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यह मशीन अक्षरों और अलग-अलग आकृतियों को भी पकड़ने में कामयाब रही। यानी अगर व्यक्ति अक्षरों के बारे में सोच रहे थे, तो मशीन ने उनकी तस्वीर बना दी। क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का दावा है कि यह खोज आंतरिक दुनिया के नए रास्ते खोल देगी।
इससे भविष्य में सपनों की फुटेज बनाने और विकलांग लोगों से बातचीत की नई तकनीक खोजने में मदद मिलेगी। जर्नल बायोरिक्विव में यह शोध प्रकाशित हुआ है।