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समलैंगिकों को छत से फेंक कर मौत देता है ISIS

Sun, 02 Aug 2015 08:26 AM IST
Updated Sun, 02 Aug 2015 08:26 AM IST
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islamic state throw who are gay or lesbian

खुद को इस्लामिक स्टेट (आईएस या आईसिस) कहने वाले संगठन में 'गे' यानी समलैंगिक लोगों को दंड देने का खास तरीक़ा है। ये संगठन समलैंगिकों को ऊंची इमारत से नीचे फेंक देता है। 24 साल का मेडिकल छात्र तमीम एक ऐसे खुशकिस्मत हैं, जो इराक से लेबनान भाग निकले और इस सजा से बच निकले। उन्होंने अपनी कहानी ख़ुद बयां की है। विस्तार से पढ़ें।

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हमारे समाज में गे होने का मतलब है मौत। जब इस्लामिक स्टेट ऐसे लोगों की जान लेता है तो ज़्यादातर लोग खुश होते हैं क्योंकि वो सोचते हैं कि हम बीमार हैं। मुझे इस बात का पहली बार अंदाज़ा उस वक़्त हुआ जब मैं 13 या 14 बरस का था। मैं खुद भी सोचता था कि समलैंगिकता एक बीमारी है। कॉलेज में पहले साल की पढ़ाई के दौरान मैंने इसके लिए उपचार लेना शुरू किया।
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मैं मुसलमान परिवार से हू्ं लेकिन मेरा पुराना ब्वॉयफ्रेंड ईसाई था और मेरे कई दोस्त ईसाई थे। मैं उनके साथ बाहर जाता था। साल 2013 में मेरा अपने साथ पढ़ने वाले छात्र उमर से ईसाइयों के साथ रहने की वजह से झगड़ा हो गया। उमर बाद में इस्लामिक स्टेट के साथ जुड़ गया। मेरे एक दोस्त ने उसे बताया कि मैं समलैंगिक होने की वजह से उपचार ले रहा हूं और मुश्किल दौर से गुजर रहा हूं, इसलिए वो मेरे साथ नरमी से पेश आए।

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तमीम के सिर का मुंडन

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मुझे लगता है कि मेरे दोस्त के इरादे नेक थे लेकिन उसकी वजह से जो कुछ हुआ उसने मेरी ज़िंदगी तबाह कर दी। नवंबर 2013 में उमर ने अपने दो दोस्तों के साथ मुझ पर हमला किया। मैं घर लौट रहा था। उन्होंने मुझे पीटा। मुझे ज़मीन पर गिरा दिया और मेरे सिर का मुंडन कर दिया। उन्होंने मुझसे कहा, "ये फिलहाल तुम्हारे लिए एक सबक है क्योंकि तुम्हारे पिता एक मज़हबी आदमी हैं।" वो कहना चाहते थे कि मेरे पिता की वजह से मुझे ज़िंदा छोड़ रहे हैं।

मैंने कुछ दिन के लिए शहर छोड़ दिया। मैं मार्च 2014 में वापस लौटा। मैंने एक बार फिर उमर को नाराज़ कर दिया। मैंने कहा कि गैरमुस्लिमों को 'जिज़िया' नहीं देना चाहिए। जिज़िया एक कर है जो गैर-मुस्लिम एक मुस्लिम सरकार को देते हैं। मैं यूनिवर्सिटी के बाथरूम में हाथ धो रहा था तभी उसने और दूसरे लोगों ने मुझ पर हमला कर दिया।

वो पीछे से आए लेकिन मैंने उनमें से एक को उसकी हरी घड़ी की वजह से पहचान लिया। उन्होंने ठोकरें मार-मार कर मुझे आधा बेहोश कर दिया। मैंने एक महीने के लिए यूनिवर्सिटी जाना बंद कर दिया। फाइनल परीक्षा के बीच आईएस ने कब्ज़ा कर लिया। उमर ने मुझे फोन किया और कहा कि मैं अपने गुनाहों की तौबा करूं और उनके साथ जुड़ जाऊं। मैंने फोन काट दिया। 4 जुलाई को आईएस लड़ाकों का एक गुट मेरे घर आया और मेरे पिता से कहा, " तुम्हारा बेटा काफिर है और समलैंगिक है। हम उसे खुदा की ओर से तय सज़ा देने आए हैं।" मेरे पिता मजहबी आदमी हैं। मेरी खुशकिस्मती से उन्होंने उन्हें दूसरे दिन आने को कहा ताकि वो पता लगा सकें कि क्या ये इल्ज़ाम सही है।

मौत का डर

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मेरे पिता अंदर आए और मुझ पर चीखने लगे। आखिर में उन्होंने कहा, "अगर ये इल्ज़ाम सही है तो मैं खुशी से तुम्हें उनके हवाले कर दूंगा।" मैं वहीं खड़ा रह गया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूं। मेरी मां ने तय किया कि मुझे तुरंत घर छोड़ देना चाहिए। उन्होंने मेरे इराक से बाहर निकालने की तैयारी शुरु कर दी। बीच रात उन्होंने कहा, "हम अभी जा रहे हैं।"

वो मुझे अपनी बहन के घर ले गईं। अगले दिन उन्होंने मेरे लिए तुर्की के विमान की टिकट ली और मेरा वीज़ा भी कराया। लेकिन मुझे इरबिल होकर यात्रा करनी थी और वो हमें कुर्दिस्तान में दाखिल होने की इजाज़त नहीं देने वाले थे। मैं इरबिल के पास एक गांव में दो हफ्ते रुका। बगदाद के रास्ते भी जाने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो सका। कई हफ्ते छुपे रहने के बाद आखिरकार मेरी मां ने मेरे किरकुक जाने का इंतजाम कर दिया। मेरा तुर्की जाने का इरादा था लेकिन पहली फ्लाइट बेरुत की मिली जहां जाने के लिए वीजा की भी जरुरत नहीं थी तो मैं यहां हूं।

मुझे अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ा

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अगर मैं वहां रुकता तो आईएस ने मुझे भी उसी तरह मार दिया होता जैसे कि उन्होंने दूसरों की जान ली। अगर आईसिस ने मुझे नहीं मारा होता तो मेरे परिवार ने मेरी जान ले ली होती। मेरे घर छोड़ने के कुछ दिन बाद पता चला कि मेरे चाचा ने परिवार की शान सफाई की कसम ली थी। मैं अब सुरक्षित जगह पर आजादी के साथ रहना चाहता हूं।

अपनी डिग्री हासिल करना चाहता हूं और जीना चाहता हूं। इराकी रिफ्यूजी असिस्टेंस प्रोजेक्ट के मानवाधिकार से जुड़े वकीलों ने मुझे शरणार्थी का दर्जा हासिल करने में मदद की। वो मुझे किसी दूसरे देश में बसाने की कोशिश में हैं जहां मैं अपनी पढ़ाई जारी रख सकूं। मुझे हमेशा वो दौर याद रहेगा जबकि मुझे अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ा।
 
मेरा अपने परिवार के ज्यादातर लोगों से संपर्क नहीं है। मैं अपनी मां से हर हफ्ते बात करता हूं। वो शानदार महिला हैं। वो जब मुझे बाहर निकालने की कोशिश में जुटी थीं, उन्होंने कभी मेरी समलैंगिकता की बात नहीं की। मेरे अब भी कई समलैंगिक दोस्त हैं लेकिन उनकी सुरक्षा की वजह से हम संपर्क में नहीं है। मेरा एक दोस्त जो वहां रह गया था वो मारा गया।

उसे मुख्य सरकारी इमारत से नीचे फेंक दिया गया। वो 22 साल का स्मार्ट युवक था। हम पहली बार ऑनलाइन मिले थे। इराकी गे ऑनलाइन कम्यूनिटी में काफी हैंगआउट करते हैं फिर रुबरू मिलते हैं। मैं रोना चाहता था। मुझे यकीन नहीं हो पा रहा था। वो जिंदगी जी रहा था और अब वो चला गया।

'इंसान हैं हम'

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आईएस के आने के पहले भी मैं लगातार डर में जी रहा था। वहां सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है। लड़ाके लोगों को गुपचुप मार देते हैं और कोई कुछ नहीं बोलता। उनके लिए हम खराब अपराधियों का एक झुंड हैं जिससे उन्हें छुटकारा पाना है। उनके मुताबिक हम खुदा की नाराजगी और बुराई की वजह हैं।

बीते कुछ साल बहुत मुश्किल भरे रहे हैं। सुरक्षाकर्मियों को अगर किसी के गे होने की जानकारी मिलती तो वो उसे गिरफ्तार कर लेते। उसके साथ बलात्कार करते और उसे प्रताड़ित करते। इराकी सेना की निगरानी में कई हत्याएं हुईं। लोगों के ज़िंदा जलाए जाने या फिर पत्थर मारकर उनकी जान लेने के वीडियो सामने आए।

मुझे लगता है कि आईएस के आने के पहले मेरे परिवार के दबदबे ने मुझे बचाया लेकिन अगर मान लीजिए आईएस इसी पल गायब हो जाए तो भी मेरी जान को उतना ही गंभीर खतरा है क्योंकि अब समलैंगिक के तौर पर मेरी पहचान उजागर हो चुकी है। हत्याओं को लेकर लोगों की प्रतिक्रिया सदमा पहुंचाने वाली है।

आमतौर पर जब आईएस ऑनलाइन तस्वीर पोस्ट करता है तो लोग मरने वाले के प्रति सहानुभूति रखते हैं लेकिन अगर वो गे हो तो ये सहानुभूति नहीं होती। मैं उस दोस्त के सम्मान में ये बता रहा हूं जिसे मार दिया गया और उन समलैंगिक लोगों के लिए भी जो अब भी इराक में हैं। मैं चाहता हूं कि इराकी जानें कि हम भी इंसान हैं। अपराधी नहीं। हमारे पास भी भावनाएं हैं। आत्मा है। हमसे नफरत करना बंद कर दीजिए क्योंकि हम अलग तरह से पैदा हुए हैं।
(तमीम ने अपनी कहानी बीबीसी की कैरोलीन हॉले को सुनाई। तमीम और उमर असल नाम नहीं हैं।)

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