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चीन के लिए भारत कितना ज़रुरी?

Thu, 09 May 2013 08:00 AM IST
Updated Thu, 09 May 2013 08:00 AM IST
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indo china relationship

हिमालय के सीमाई इलाके में भारत के साथ चीन के लिए करने को अभी बहुत कुछ है। इस इलाके के बारे में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि यहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता है।

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चीन के युनान प्रांत के विकास शोध केंद्र के प्रमुख कॉंग कन कहते हैं,''सीमा पर हमारी कुछ समस्या है, इससे कोई इनकार नहीं कर रहा है। लेकिन हम इसका समाधान चाहते हैं। इसमें कुछ समय लगेगा। लेकिन हम नहीं चाहते कि इससे हमारे रिश्ते प्रभावित हों।''
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कॉंग कन चाहते हैं कि भारत के साथ सीमाई व्यापार फले-फूले।

चीन पहले से ही भारत का प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच पहले से ही 66।47 अरब डॉलर या क़रीब तीन लाख साठ हज़ार करोड़ रुपए का कारोबार हो रहा है। अगर हम सीमाई व्यापार को बढ़ाएं तो यह और अधिक हो जाएगा।
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विशाल व्यापारिक समूह


युनान के फ़ाइनेंस और इकोनॉमिक विश्वविद्यालय के लि झू कहते हैं, ''भारत और चीन दोनों की जनसंख्या एक-एक अरब से अधिक है, अगर ये दोनों देश मिल जाएं तो एक विशाल व्यापारिक समूह खड़ा हो सकता है।''

भारत और चीन के सैनिक हिमालय के एक बंजर इलाके के तनाव भरे माहौल में 15 अप्रैल से आमने-सामने थे।

भारत का कहना था कि देश के उत्तरी राज्य कश्मीर के लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के 19 किलोमीटर अंदर तक चीनी सैनिक चले आए थे।

चीन ने इन आरोपों का खंडन करते हुए चुनार और दौलत ओल्डी बेग सेक्टर में भारतीय सेना के निर्माण कार्य पर आपत्ति जताई थी। हालांकि रविवार को हुई कमांडर स्तर की बैठक के बाद पीछे हटने पर सहमति बनी। इससे पहले ऐसी कई बैठकें नाकाम हुई थीं।

भारत ने शुरुआती तौर पर चीन के अतिक्रमण को खारिज कर दिया था।

केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए सरकार ने विपक्ष और क्षेत्रिय पार्टियों के भारी दबाव में आकर धमकी दी थी कि चीन ने अगर अपनी सेना को पीछे नहीं हटाया तो विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की नौ मई को होने वाली बीजिंग यात्रा रद्द की जा सकती है।

तनातनी का दौर

इस तनातनी के दौरान मैं एक हफ्ते के लिए युनान प्रांत की राजधानी कुनमिंग में ही था।

इस दौरान मैं जिन चीनी शिक्षाविदों और अधिकारियों से मिला, वे सब चाहते थे कि सीमा विवाद का बिना समय गंवाए समाधान हो।

दक्षिण-पूर्व और दक्षिण एशिया के पड़ोसी देशों से व्यापारिक और सांस्कृतिक रिश्ते बढ़ाने की मोर्चेबंदी के लिए युनान प्रांत चीन का प्रवेश द्वार है।

कॉंग के सहयोगी यांग यी कहते हैं,''युनान से हम वियतनाम, लाओस, थाईलैंड और म्यामांर के लिए सड़कों का एक पूरा नेटवर्क, रेल संपर्क और जलमार्ग विकसित कर रहे हैं। हम भारत के लिए पुराने स्टिलवेल रोड और पूर्वी भारत और बांग्लादेश के लिए कुछ और स्थनीय रास्ते खोलना चाहते हैं।''

कलकत्ता (अब कोलकाता) से कुनिंग तक जाने वाली बीसीआईएम (बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार) कार रैली का रास्ता तय करने के लिए यी कुछ समय गुजार चुके हैं।

इस रैली को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 20 फवरी को रवाना किया था। यह रैली 15 दिन बाद कुनिंग में ख़त्म हुई थी।

यी कहते हैं,''लेकिन हम स्टिलवेल रोड से बचे। इसकी जगह हम बांग्लादेश होकर गए और भारतीय राज्य असम और मणिपुर होते हुए भारतीय कस्बे मोरेह होते हुए म्यामार में दाखिल हुए।''

नवंबर 2012 में हुए के2के (कोलकाता-कुनमिंग) सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने इस पहल का समर्थन किया था।

भारतीय निवेश

कॉंग कन कहते हैं,''हम युनान के दवा उद्योग और सूचना प्रद्यौगिकी क्षेत्र में भारतीय निवेश चाहते हैं।''

वह चाहते हैं कि दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों की तरह भारत कुनमिंग में वाणिज्य दूतावास खोले।

इस साल छह से दस जून तक युनान की प्रांतीय सरकार चीन दक्षिण एशिया प्रदर्शनी का आयोजन करने जा रही है।

युनान एक्सपो टूरिज्म ग्रुप के उप महाप्रबंधक वांग कहते हैं, ''हम चाहते हैं कि बड़ी भारतीय कंपनियां इसमें शिरकत करें।''

व्यापार और उद्योग के अलावा चीन अन्य कारणों से भी भारत के साथ घनिष्ठ संबंध चाहता है।

अगर चीन-भारत के संबंध ख़राब हुए तो, भारत मजबूती से अमरीका की ओर जा सकता है। चीन के पड़ोसी देशों को अपनी ओर आकर्षित करना राष्ट्रपति बराक ओबामा की प्रमुख रणनीति है। इससे चीन काफी चिंतित है।

युनान में उप क्षेत्रीय अध्ययन शोध समूह के प्रमुख झू युन झियांग हैं, ''अगर हमारे रिश्ते ख़राब हैं तो, यहाँ उसका फ़ायदा उठाने वाले बहुत हैं।'' उनका इशारा स्पष्ट रूप से अमरीका की ओर है।

कोलकाता स्थित सेंटर फॉर स्टडीज इन इंटरनेशनल रिलेशन एंड डवलेंपमेंट (सीएसआईआरडी) में चीनी मामलों पर नजर रखने वाले बिनोद मिश्र कहते हैं, ''भारत में बैठे लोग जितना सोचते हैं चीन की नीति भारत के बारे में उससे कहीं ज्यादा महीन है। हो सकता है कि रणनीतिक फायदे के लिए कुछ सैन्य कमांडर सीमा पर कड़ाई करें लेकिन चीन का शीर्ष नेतृत्व एक बढ़ते बाजार के रूप में एशिया में भारत के महत्व से भलीभांति परिचित है।''


सीमा विवाद, तिब्बत के अलावा कुछ और भी मसले हैं जो भारत-चीन के बीच तनाव का कारण बने रहेंगे। लेकिन भारत के विपरीत 1962 के युद्ध की यादें चीन के लोगों के दिमाग कम ही हैं।

युनान विश्वविद्यालय के एक छात्र ली हुशुन कहते हैं,''ऐतिहासिक कारणों से जापान के साथ हमारी बड़ी समस्या है। लेकिन आप लोगों के साथ ऐसा नहीं है।''

सुबीर भौमिक

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