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तेल से पहले मोती निकालते थे अरबवासी, जानिए कैसे?

Thu, 20 Nov 2014 12:44 PM IST
मैथ्यू टेलर/बीबीसी संवाददाता, दोहा, कतर
मैथ्यू टेलर/बीबीसी संवाददाता, दोहा, कतर Updated Thu, 20 Nov 2014 12:44 PM IST
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fishers of arab picked pearl before  the invention of petroleum

आज जब आप अरब के बारे में सोचते हैं तो आपके जेहन में तेल, असीम संपदा की तस्वीर उभरती होगी। लेकिन एक सदी से भी कम वक्त हुआ था, जब तेल की खोज होनी बाकी थी।

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यह इलाका गरीब था और इसकी आय का मुख्य स्रोत था- मोती की खोज करना। लेकिन औपनिवेशिक सत्ता और सस्ते माल से प्रतियोगिता के चलते यह भी बंद होने वाला था।

"यूसुफ डुबकी लगाने के लिए तैयार था। उसने अपनी टोकरी निकाली, कोने से पकड़ा और पत्थर से बंधी रस्सी से एक पैर में एक घेरा डाला। उसके बाद वह गहराई में उतरता गया, मैं उसे छह, 12, 24 फुट नीचे जाते देखता रहा।"
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ऑस्ट्रेलियन खोजी एलन विलियर्स ने अपनी किताब 'सन्स ऑफ सिंदबाद' में 1939 में कुवैत में मोती की खोज का वर्णन कुछ इसी तरह किया है।

"वह कितने समय से अंदर है! ऊपर सन्नाटा छाया हुआ था। रस्सी में खिंचाव हो रहा था और वह लगातार नीचे जा रही थी। यूसुफ को नीचे देखे हुए काफी समय हो गया था। फिर एक धुंधली सी तस्वीर एक आदमी के रूप में बदलने लगी।"
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"आखिरकार वह बाहर आ ही गया। सबसे पहले उसकी टोकरी बाहर आई, फिर उसका बूढा सिर। उसने पानी के अंदर की आदी हो गई अपनी आंखों को सूर्य की रोशनी से बचाने के लिए हाथ से ढक रखा था। उसने व्हेल की तरह पानी की फुहार भी छोड़ी।"

विलियर्स जानते थे कि उनकी किस्मत अच्छी है कि वह, मोती की खोज, वाले उद्योग के आखिरी समय को देख और उसकी तस्वीरें ले रहे हैं। वह उद्योग जिसने अरब के तटीय क्षेत्रों की आबादी को कई पुश्तों तक पोसा है।

जापानी संवर्धित (कृत्रिम रूप से पैदा किए गए) मोतियों की 1920 की शुरुआत से दुनिया के बाजार में भरमार हो गई थी। इन सस्ते और प्रचुर मोतियों ने अरब के श्रम-आधारित प्राकृतिक मोतियों की खोज, जो खाडी के गर्म पानी के नीचे सीपों से की जाती थी, को भारी धक्का पहुंचाया।

कितना मुश्किल था मोती निकालना?

fishers of arab picked pearl before  the invention of petroleum

मोती की खोज बहुत मुश्किल काम था। इसके लिए गोताखोर अपने शरीर पर तेल लगाते थे, रुई से कानों को बंद करते थे, उंगलियों और अंगूठों पर चमडे के दस्ताने पहनते थे ताकि धारदार चट्टानों से कटने से बच सकें, अपनी गर्दन पर रस्सियों से बनी टोकरी पहनते थे और नाक पर चिमटी लगाकर उसे बंद करते थे।

रस्सी से बंधे एक पत्थर को पकडे गोताखोर सीपियों के लिए नदी के तल तक डुबकी लगाते थे जो 60 फुट तक गहरा हो सकता था। फिर नाव के तल पर मौजूद एक सहायक उस पत्थर को खींच लेता था जबकि गोताखोर चाकू से सीपियों को निकालता था और अपनी गर्दन में बंधी टोकरी में उन्हें रखता जाता था।

जब और ज्यादा सांस रोके रखना संभव नहीं रहता तब वह रस्सी को झटका देता और फिर उसे ऊपर खींच लिया जाता।

ऐसा दिन भर में करीब 30 बार दोहराया जाता और गोताखोर नाव के तल पर सीपियां इकट्ठी करते रहते जहां कैप्टन के आंखों के सामने उन्हें खोला जाता।

मई और सितंबर के बीच खाडी के शहरों जिनमें कुवैत, बहरीन, दुबई और अबूधाबी शामिल थे, से सैकडों लकडी के बने जहाज सीपियों के तल वाले बंदरगाहों के ओर जाते। गोताखोरों, खींचने वालों और प्रशिक्षुओं के दल बेहद तंग हालात में हफ्तों तक रहते।

उस समय के समुद्री मल्लाहों को पुराने मोती खोजने वालों ने जिंदा रखा। ब्रिटिश लायब्रेरी एथनोम्यूजिकोलॉजिस्ट रॉल्फ किलियस ने कतर में 2013 में एक खासतौर पर निराशाजनक, याद रखने योग्य बैठक को रिकॉर्ड किया है।

मोती के लिए हठधर्मिता

fishers of arab picked pearl before  the invention of petroleum

सभी लोग कर्ज में डूबे हुए हैं। गोताखोरों ने अपनी नाव के कप्तानों से कर्ज लिया है, अगर एक साल बुरा बीतता तो अगला साल तनाव के साथ शुरू होता और कर्ज हर साल बढता ही जाता। कप्तानों पर मोती के व्यापारियों का कर्ज था, जो उन्होंने समुद्री यात्राओं के लिए लिया था- व्यापारियों पर खरीदारों का उधार था और इसी तरह यह श्रृंखला बढती जाती थी।

भारत और यूरोप से भारी मांग के चलते यह व्यापार चलता रहा। 1865 में बहरीन- जो खाड़ी में मोती खोज का केंद्र हुआ करता था- ने मोतियों से, आज के हिसाब से, करीब 2.90 अरब रुपए का फायदा कमाया था। अपने चरमोत्कर्ष, 1904-05, में यह उद्योग 9.67 अरब रुपये से ज्यादा कीमत का था।

लेकिन फिर भी वेतन और काम की स्थितियां भयानक थीं, क्योंकि शासक परिवार और औपनिवेशक सत्ता, ब्रिटेन, आधुनिकता के विचार के खिलाफ थे। ऐसा लगता था कि उऩ्हें डर है कि काम करने के नए ढंग से सामाजिक असंतुलन पैदा होगा।

आधुनिक तकनीकी अविष्कारों, जैसे कि गहरे समुद्र में गोता लगाने वाले सूट, के इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी गई। इसके बजाय ब्रिटेन ने इस विचार को हवा दी, "जो भी गोताखोरी के लिए कृत्रिम साधनों का इस्तेमाल करता है, वह भारी खतरा मोल लेता है"। यह ब्रिटिश राजदूत ह्यू बिस्कोए ने 1930 में लिखा था।

इस तरह की हठधर्मिता ने द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बहुत पहले ही नए कृत्रिम मोती उत्पादन के व्यापार के सामने खाडी के टिके रहने की संभावना को खत्म कर दिया।

एक पूरी पीढी ने बेहद गरीबी में जिंदगी गुजारी- जब तक कि 1950 में बडे पैमाने पर तेल उत्पादन ने सब कुछ बदलकर रख दिया।

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