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सऊदी महिलाएं देंगी वोट, लड़ेंगी पहली बार चुनाव

Wed, 02 Dec 2015 11:14 PM IST
Updated Wed, 02 Dec 2015 11:14 PM IST
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first time women contest in election in saudi arabia

ये बदलाव बहुत धीमा और इंतजार लंबा है। लेकिन सऊदी सफराजेट (महिला अधिकार के लिए आंदोलन करने वाली महिलाएं) के लिए स्थानीय चुनाव में मतदान भी जश्न मनाने का विषय है। इस रूढ़िवादी देश में निगम चुनाव के 12 दिसंबर को होने वाले तीसरे चरण में, महिलाओं को भी पहली बार चुनाव लड़ने का मौका मिला है।

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हाएफा अल-हबादी एक स्थानीय अखबार में छपी अपनी तस्वीर दिखाती हुई कहती हैं, "हम इतिहास बना रहे हैं।" ये तस्वीर उस दिन ली गई थी जिस दिन वह स्थानीय चुनाव मैदान में उतरने वाली पहली महिला बनी थीं। इसके ख्याल से ही उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और वह एक आंसू पोंछती हैं।
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जब मैं इस ओर इशारा करती हूं कि अधिकतर देशों में मतदान का अधिकार बरसों पहले मिल गया है तो वह कहती हैं, "सऊदी अरब एक नया और छोटा देश है, मात्र 85 साल पुराना। हम वह पीढ़ी हैं जो बदलाव लाएंगी।" लेकिन इस हालिया उपलब्धि पर प्रतिक्रियाएं खामोश ही रही हैं।
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करीब तीन करोड़ की आबादी वाले देश के पांच लाख पंजीकृत मतदाताओं में महिलाओं की संख्या केवल 20 फीसद है। अल-नाहदा केंद्र में मुख्य परियोजना अधिकारी शेखा अल-सुदैरी कहती हैं, "यह पहला कदम है। आप इसे इसलिए बेमतलब नहीं बता सकते क्योंकि यह परिपूर्ण (परफ़ेक्ट) नहीं है।"

अल-नाहदा में महिलाएं निदेशक मंडल से लेकर सफ़ाई कर्मचारियों तक की ज़िम्मदारी उठा रही हैं। देश में वे मतदान के सिद्धांतों और व्यवहार के बारे में महिलाओं और पुरुषों को बता रही हैं हालांकि उन्हें इसका अनुभव नहीं है।

महिलाओं के ये नए अधिकार भी शामिल

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सऊदी अरब के राजतंत्र होने के नाते सभी बदलाव, जिसमें महिलाओं के ये नए अधिकार भी शामिल हैं, राजाज्ञा से आते हैं। वो कहती हैं, "हम लोग स्थानीय परिषदों के बारे में बात कर रहे हैं और इसका अर्थ पानी, सीवेज, कूड़े के प्रबंधन में अंतर कर दिखाने से है। इसलिए हम लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि अपनी नागरिक ज़िम्मेदारी निभाकर वह फर्क ला सकते हैं।"

उनका चुनावी वीडियो एक रंगीन और चतुरताई से भरा कार्टून है जिसमें एक परिवार गाड़ी से एक सऊदी शहर से गुज़र रहा है और कूड़ेदानों से बाहर निकलते कूड़े और ट्रैफ़िक जाम की शिकायत कर रहा है और फिर वह बदलाव की ख़ूबसूरती के बारे में पुकार लगाते हैं। अल-नाहदा की मुख्य कार्यकारी अधिकारी राशा अल-तुर्की कहती हैं, "प्रशिक्षण के लिए आने वालों की प्रतिक्रिया ख़ुश करने वाली है।"

वो कहती हैं, "शुरू में तो वह कुछ तुनकमिजाज़ से होते हैं। लेकिन अंत में वह इतने ऊर्जावान हो जाते हैं कि आप उनसे बिजली का कोई उपकरण लगा दें तो वह काम करने लगे।"

विश्वविद्यालयों में महिलाएं पुरुषों से अधिक संख्या में

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वो कहती हैं, "शुरू में तो वह कुछ तुनकमिजाज़ से होते हैं। लेकिन अंत में वह इतने ऊर्जावान हो जाते हैं कि आप उनसे बिजली का कोई उपकरण लगा दें तो वह काम करने लगे।"यह ऊर्जा अब भी सऊदी अरब की नई पीढ़ी की कंप्यूटर में दक्ष महिलाओं तक नहीं पहुंची है।

पिछले राजा अब्दुल्लाह के शुरू किए गए वज़ीफ़ों के कार्यक्रमों की बदौलत अब विश्वविद्यालयों में महिलाएं पुरुषों से अधिक संख्या में हैं। रियाद के प्रिंस सुल्ताऩ विश्वविद्यालय में महिला विभाग में वास्तुकला और शहरी डिज़ाइन पढ़ाने वालीं हाएफ़ा अल-हबादी कहती हैं, "मैं अपनी छात्राओं को कहती हूं कि मतदान ऐसी विलासिता है जो हम यहां नहीं पा सकतीं।" वो कहती हैं, "हमारी पीढ़ी के लिए यह एक सपना था और उनके लिए, उन्हें कोई परवाह ही नहीं है। क्या आप इसकी कल्पना कर सकते हैं?"


राजधानी रियाद, जो जेद्दाह जैसे अन्य मुख्य शहरों के मुक़ाबले ज़्यादा परंपरावादी है, में मेरी मुलाक़ात ऐसी युवतियों से हुई जो बदलाव को लेकर आशंकित थीं। कॉर्पोरेट गवर्नेस में सलाहकार के रूप में काम करने वाली 27 साल की सुल्ताना अहमद कहती हैं, "मुझे लगता है कि यह एक बड़ा क़दम है लेकिन मैं थोड़ा रुककर इसके परिणाम देखना चाहूंगी।" जब मैंने उनसे पूछा कि वह किस बात से झिझक रही हैं, तो उनका जवाब था, "शायद असफलता का डर।

मैं देखना चाहती हूं कि महिलाएं सचमुच कुछ कर दिखाती भी हैं।" उनके साथ बैठी हुई, 29 साल की अधवा शाकेर इससे सहमति जताती हैं, "हम एक रूढ़िवादी मानसिकता वाले समाज में रहते हैं। हम अपने दादा की पीढ़ी और अपनी पीढ़ी के बीच एक मध्यममार्गी आधार तलाशने की और साथ मिलकर बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।"

एकमात्र ऐसा देश है जहां महिलाएं गाड़ी नहीं चला सकतीं

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एक विशिष्ट समाज में, जहां किसी मुद्दे पर वास्तव में जुड़ाव दरअसल सोशल मीडिया के ज़रिए ही होता है, बेचैनी के कई युवा स्वर भी हैं। सऊदी अरब में ट्विटर और यूट्यूब का सर्वाधिक प्रति व्यक्ति प्रयोग होता है।

लेखिका और मानवाधिकार कार्यकर्ता बारीअा अल-ज़ुबीदी कहती हैं, "लोग बदलाव से डरे हुए हैं। उन्हें लगता है कि हर बदलाव के बाद कुछ बुरा होगा।" बारीअा 'महिलाओं गाड़ी चलाएं' अभियान से जुड़ी हुई थीं। ये इस रूढ़िवादी राज्यव्यवस्था में महिलाओं के अधिकारों की दुर्लभ सार्वजनिक अभिव्यक्ति थी। सऊदी अरब दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां महिलाएं गाड़ी नहीं चला सकतीं। जिन दो महिलाओं ने इस प्रतिबंध का उल्लंघन किया था उन्हें 70 दिन जेल में रखने के बाद इसी साल कुछ समय पहले रिहा किया गया है।

बारीआ महिलाओं के मताधिकार पर कहती हैं, "उनकी कोशिश है कि हम छोटे मुद्दों पर ही सोचें, जैसे कि वह बड़े मामले हों। यह एक चाल है।" महिलाओं के मतदान करने और चुनाव लड़ने से वह सार्वजनिक रूप से ज़्यादा नज़र आएंगी, हालांकि प्रचार के लिए महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग रखने के सख़्त नियम लागू हैं। एक ऐसा सरंक्षण तंत्र जिसमें महिलाओं को शिक्षा से लेकर बाहर जाने तक, हर काम के लिए पुरुष की अनुमति की ज़रूरत पड़ती है, जटिलताएं और बढ़ा देता है। लेकिन देखें तो महिलाओं की स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव मुख्यतः शाही आदेश और आर्थिक अनिवार्यता से ही आया है।

मुख्य द्वार पर सुरक्षा के काम भी कर रही

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चारों ओर मौजूद किसी शॉपिंग मॉल में से किसी एक महंगे ब्रांड वाले मॉल में घुस जाइए आपको काले चोगों- एबाया- और स्कार्फ़ में लिपटी महिलाएं दिखाई देंगी, जो अब सुपरमार्केट समेत हर दुकान में काम करती हैं।

महिलाएं अब मुख्य द्वार पर सुरक्षा के काम भी कर रही हैं। यह बदलाव पिछले कुछ साल का है। एक नई राजाज्ञा ने महिलाओं को सेवा देने वाले हर स्टोर में महिलाओं को नौकरी देना अनिवार्य बना दिया है। एक विश्वविद्यालय में पढ़ रही 22 साल की हाना बहान्नान कहती हैं, "हमें समय दीजिए।" उनकी दोस्त 22 साल की ओहोद अल-आरिफ़ी भी आशा और गर्व से चमकते हुए कहती हैं, "जब मेरी उम्र हो जाएगी तो मैं भी स्थानीय निकाय चुनाव में खड़ी होऊंगी। और एक दिन मैं सरकार में मंत्री बनूंगी।"

लेकिन क्या राज्य के रूढ़िवादी विद्वान, जिन्होंने इन अति सीमित बदलावों का भी तीखा विरोध किया है, उन्हें रोक देंगे? इस सवाल पर वो इनकार में अपना सिर यक़ीन के साथ हिलाती हैं, जो उतना ही मज़बूत है जितना कि उन लोगों की आशंका कि ऐसा नहीं हो पाएगा।

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