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साइबेरिया में 110 साल पहले हुए विस्फोट से कांप उठी थी धरती, कर दिया था राख
बीबीसी, हिन्दी
Updated Tue, 13 Mar 2018 04:04 PM IST
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बीबीसी
- फोटो : bbc
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ये वाकया 110 साल पुराना है। रूस के साइबेरिया इलाके में एक बहुत ही भयानक विस्फोट हुआ था। ये धमाका पोडकामेन्नया तुंगुस्का नदी के पास हुआ था। इस ब्लास्ट से आग का जो गोला उठा उसके बारे में कहा जाता है कि ये 50 से 100 मीटर चौड़ा था। इसने इलाके के टैगा जंगलों के करीब 2 हजार वर्ग मीटर इलाके को पल भर में राख कर दिया था। धमाके की वजह से 8 करोड़ पेड़ जल गए थे।
साइबेरिया में 110 साल पहले हुए इस धमाके में इतनी ताकत थी कि धरती कांप उठी थी। जहां धमाका हुआ वहां से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित क़स्बे के घरों की खिड़कियां टूट गई थीं। वहां के लोगों तक को इस धमाके से निकली गर्मी महसूस हुई थी। कुछ लोग तो उछलकर दूर जा गिरे थे।
क़िस्मत से जिस इलाके में ये भयंकर धमाका हुआ, वहां पर आबादी बेहद कम या न के बराबर थी। आधिकारिक रूप से इस धमाके में सिर्फ़ एक गड़ेरिए के मारे जाने की तस्दीक की गई थी। वो धमाके की वजह से एक पेड़ से जा टकराया था और उसी में फंसकर रह गया था। इस ब्लास्ट की वजह से सैकड़ों रेंडियर कंकाल में तब्दील हो गए थे।
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उस धमाके के गवाह रहे एक शख्स ने बताया था कि, 'जंगल के ऊपर का आसमान मानो दो हिस्सों में बंट गया था। ऐसा लग रहा था कि आकाश में आग लग गई है। ऐसा लगा कि ज़मीन से कोई चीज टकराई है। इसके बाद पत्थरों की बारिश और गोलियां चलने की आवाजें आई थीं'। धमाके के दो दशक बाद 1927 में वैज्ञानिक लियोनिद कुलिक की अगुवाई में एक रूसी टीम तुंगुस्का पहुंची
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साइबेरिया में 110 साल पहले हुए इस धमाके में इतनी ताकत थी कि धरती कांप उठी थी। जहां धमाका हुआ वहां से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित क़स्बे के घरों की खिड़कियां टूट गई थीं। वहां के लोगों तक को इस धमाके से निकली गर्मी महसूस हुई थी। कुछ लोग तो उछलकर दूर जा गिरे थे।
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क़िस्मत से जिस इलाके में ये भयंकर धमाका हुआ, वहां पर आबादी बेहद कम या न के बराबर थी। आधिकारिक रूप से इस धमाके में सिर्फ़ एक गड़ेरिए के मारे जाने की तस्दीक की गई थी। वो धमाके की वजह से एक पेड़ से जा टकराया था और उसी में फंसकर रह गया था। इस ब्लास्ट की वजह से सैकड़ों रेंडियर कंकाल में तब्दील हो गए थे।
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उस धमाके के गवाह रहे एक शख्स ने बताया था कि, 'जंगल के ऊपर का आसमान मानो दो हिस्सों में बंट गया था। ऐसा लग रहा था कि आकाश में आग लग गई है। ऐसा लगा कि ज़मीन से कोई चीज टकराई है। इसके बाद पत्थरों की बारिश और गोलियां चलने की आवाजें आई थीं'। धमाके के दो दशक बाद 1927 में वैज्ञानिक लियोनिद कुलिक की अगुवाई में एक रूसी टीम तुंगुस्का पहुंची
धमाके के राज से पर्दा नहीं हटा
बीबीसी
- फोटो : bbc
दुनिया इसे 'तुंगुस्का विस्फोट' के नाम से जानती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस धमाके से इतनी ऊर्जा पैदा हुई थी कि ये हिरोशिमा पर गिराए गए एटम बम से 185 गुना ज़्यादा थी। कई वैज्ञानिक तो ये मानते हैं कि धमाका इससे भी ज्यादा ताकतवर था। इस धमाके से जमीन के अंदर जो हलचल मची थी, उसे हजारों किलोमीटर दूर ब्रिटेन तक में दर्ज किया गया था। आज 110 साल बाद भी इस धमाके के राज से पूरी तरह से पर्दा नहीं हट सका है। आज भी वैज्ञानिक अपने-अपने हिसाब से इस धमाके की वजह पर अटकलें ही लगा रहे हैं।
बहुत से लोगों को लगता है कि उस दिन तुंगुस्का में कोई उल्कापिंड या धूमकेतु धरती से टकराया था। ये धमाका उसी का नतीजा था। हालांकि इस टक्कर के कोई बड़े सबूत इलाके में नहीं मिलते हैं। बाहरी चट्टान के सुराग भी वहां नहीं मिले। असल में साइबेरिया का तुंगुस्का इलाका बेहद दुर्गम है। वहां की आबो-हवा भी भी अजीबो-गरीब है। यहां सर्दियां बेहद भयानक और लंबी होती हैं। गर्मी का मौसम बहुत कम वक़्त तके लिए आता है। इस दौरान जमीन दलदली हो जाती है। इसी वजह से वहां पहुंचना बहुत मुश्किल होता है। 20 अरब किलोमीटर दूर जा चुका वोएजर क्या है? धूमकेतु बर्फ, कार्बन डाईऑक्साइड, मीथेन, अमोनिया तथा अन्य पदार्थ जैसे सिलिकेट और कार्बनिक मिश्रण के बने होते हैं
20 साल बाद भी धमाके के निशान मिले
धमाका होने के कई साल बाद तक वहां इसकी पड़ताल के लिए कोई नहीं गया। उस दौर में रूस में सियासी उथल-पुथल चल रही थी। इसलिए धमाके को किसी ने गंभीरता से लिया भी नहीं। अमरीका के एरिज़ोना स्थित प्लेनेटरी साइंस इंस्टीट्यूट की नतालिया आर्तेमिएवा कहती हैं कि धमाके के दो दशक बाद 1927 में लियोनिद कुलिक नाम के वैज्ञानिक की अगुवाई में एक रूसी टीम ने तुंगुस्का इलाके का दौरा किया। लियोनिद को धमाके के 6 साल बाद एक अख़बार में इसकी ख़बर पढ़ने को मिली थी। जिसके बाद लियोनिद ने उस इलाक़े में जाने का फैसला किया।
20 साल बाद भी वहां पहुंचने पर लियोनिद को धमाके के निशान बिखरे हुए मिले। करीब पचास वर्ग किलोमीटर के दायरे मे जले हुए पेड़ पड़े हुए थे। लियोनिद ने कहा कि धरती से कोई चीज आसमान से आकर टकराई थी। ये ब्लास्ट उसी का नतीजा था।
लेकिन, लियोनिद इस बात से हैरान था कि इस टक्कर की वजह से धरती पर कोई गड्ढा नहीं बना था। इस सवाल के जवाब मे लियोनिद ने ही कहा कि चूंकि इलाके की जमीन दलदली थी. इसलिए जो झटका टक्कर से लगा, उससे कोई निशान नहीं बना। 1938 में तुंगुस्का विस्फोट के बारे में लियोनिद कुलिक ने लिखा कि, 'हमें उम्मीद है कि धरती से 25 मीटर की गहराई में निकेल-युक्त लोहे के टुकड़े मिलेंगे। इनका वजन एक या दो सौ मीट्रिक टन हो सकता है'।
बाद में कुछ रूसी रिसर्चर्स ने कहा कि उस दिन तुंगुस्का में धरती से कोई उल्कापिंड नहीं बल्कि एक धूमकेतु टकराया था। असल में धूमकेतु चट्टानों के बजाय बर्फ से बने होते हैं। इसी वजह से इस टक्कर के बाद किसी बाहरी चट्टान के टुकड़े वहां पर नहीं मिले। धूमकेतु जब धरती के वायुमंडल में आया होगा तो बर्फ पिघलने लगी होग। मगर इस थ्योरी से भी तुंगुस्का धमाके को लेकर अटकलों का दौर खत्म नहीं हुआ। क्योंकि धमाके की असल ठोस वजह अब तक पता नहीं चल सकी है।
एक सदी से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी तुंगुस्का विस्फोट को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। कोई कहता है कि ये मैटर और एंटीमैटर के बीच टक्कर का नतीजा था। तो, किसी का दावा है कि ये एटमी विस्फोट था। एक ओर अफवाह ये भी है कि उस दिन तुंगुस्का में एलियन्स का जहाज धरती से टकराया था। वो बैकाल झील के ताजे पानी की तलाश में धरती पर आए थे।
1958 में कुछ रिसर्चर्स ने एक बार फिर तुंगुस्का इलाक़े का दौरा किया। उन्हें वहां पर सिलिकेट और मैंग्नेटाइट के छोटे-छोटे टुकड़े मिले। इनकी आगे पड़ताल की गई, तो इनमें निकेल भी मिला। निकेल आम तौर पर उल्कापिंडों की चट्टानों में बहुत पाया जाता है। इस नई खोज के बाद से एक बार फिर उस दिन उल्कापिंड के धरती से टकराने की थ्योरी को बल मिला।
रिसर्चर्स की टीम के अगुवा के। फ्लोरेंस्की ने 1963 में अपनी रिपोर्ट में लिखा कि, 'मुझे पब्लिसिटी के लिए ऐसी अटकलों की अहमियत को समझता हूं। लेकिन इससे किसी का भला नहीं होता। तथ्यों से छेड़खानी करके विज्ञान का भला नहीं हो सकता'।
लेकिन, फ्लोरेंस्की की रिपोर्ट के बाद भी तुंगुस्का को लेकर अटकलों का दौर जारी रहा। 1973 में मशहूर वैज्ञानिक पत्रिका 'नेचर' में लेख छपा। इसमें कहा गया कि साइबेरिया में 1908 में एक ब्लैक होल धरती से टकराया था। उस दिन तुंगुस्का में हुआ भयानक धमाका इसी टक्कर का नतीजा था।
बहुत से वैज्ञानिकों ने फौरन ही इस नई थ्योरी पर सवाल उठा दिए। नतालिया आर्तेमिएवा कहती हैं कि ऐसी थ्योरी इंसान की मनोदशा का नतीजा हैं। लोग गहरे राज जानने और किसी साजिश की थ्योरी में बहुत जल्दी भरोसा करते हैं। वो वैज्ञानिकों की नहीं सुनना चाहते। दिक्कत ये भी है कि तुंगुस्का में किसी आकाशीय पिंड के टुकड़े भी नहीं मिले। इसीलिए ऐसी थ्योरी को बल मिलता है।
नतालिया कहती हैं कि 110 साल पुराने धमाके को लेकर अफ़वाहों के दौर के लिए वैज्ञानिक भी जिम्मेदार हैं। क्योंकि उन्होंने इसकी सही वजह बताने में बहुत वक़्त ले लिया।
असल में वैज्ञानिकों को लगता है कि जब धरती से उल्कापिंड टकराते हैं, तो बड़े पैमाने पर तबाही मचती है. जैसा की साढ़े छह करोड़ साल पहले हुआ था. चिक्सलुब उल्कापिंड की टक्कर से डायनासोर धरती से ख़त्म हो गए थे.
2013 में वैज्ञानिकों की एक टीम ने तुंगुस्का विस्फोट से जुड़ी अटकलों के खात्मे के लिए नए सिरे से पहल की। यूक्रेन की एकेडमी ऑफ साइंस के विक्टर क्वास्नित्सया ने तुंगुस्का इलाके से मिले चट्टानों के छोटे-छोटे टुकड़ों की पड़ताल की। ये टुकड़े 1978 में जमा किए गए थे। इन टुकड़ों मे विक्टर को ग्रेफाइट जैसा तत्व मिला। ये आम तौर पर छोटे उल्कापिंडों के धरती से टकराने से बनता है।
विक्टर कहते हैं कि उनकी तफ़्तीश से इस बात के पक्के सबूत मिले हैं कि तुंगुस्का में 1908 में एक उल्कापिंड ही धरती से टकराया था। वो बताते हैं कि असल में वहां जो भी गया वो बड़े टुकड़े तलाशता रहा। जबकि होना ये चाहिए था कि दलदल में छोटे टुकड़े खोजे जाने चाहिए थे। मगर, आप ये सोचें कि विक्टर की खोज के बाद तुंगुस्का पर बहस बंद हो गई हो, तो ऐसा नहीं है। धरती पर अक्सर उल्कापिंडों की बारिश होती है। छोटे-छोटे टुकड़े यहां-वहां बिखर जाते हैं। मगर, तुंगुस्का में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला।
भले ही तमाम वैज्ञानिक अभी अटकलें लगा रहे हों। मगर, मोटे तौर पर सब का यही मानना है कि तुंगुस्का में 1908 में जो महाविस्फोट हुआ, वो धरती से किसी धूमकेतु या उल्कापिंड के टकराने से ही हुआ था। तुंगुस्का की घटना बाकी ऐसी घटनाओं से इसलिए अलग है क्योंकि ये महाविस्फोट था। इससे 10 से 15 मेगाटन टीएनटी के विस्फोट के बराबर एनर्जी निकली थी।
लंदन के इंपीरियल कॉलेज के जेरथ कॉलिंस कहते हैं कि तुंगुस्का जैसी घटनाएं हजारों-लाखों साल में एक बार होती हैं। मानवता के इतिहास में हुई ये अपने तरह की पहली घटना थी। शायद इसलिए भी इसे हम पूरी तरह से समझ नहीं पाए। नतालिया आर्तेमिएवा कहती हैं कि जब कोई ब्रह्मांडीय चीज धरती के वायुमंडल में प्रवेश करती है, तो वायुमंडल के असर से वो जलने लगती है। इससे वो कई टुकड़ों में बंट जाती है।
नासा के शोधकर्ता बिल कूक कहते हैं कि हमारा वायुमंडल, ब्रह्मांड से आने वाली ऐसी चीजों से हमारी हिफाजत करता है। इसीलिए जब कोई धूमकेतु या उल्कापिंड या क्षुद्र ग्रह हमारी धरती के वायुमंडल में घुसता है, तो वो असंख्य टुकड़ों में बंट जाता है। इस तरह कोई बड़ी तबाही होने से बच जाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि तुंगुस्का महाविस्फोट में भी यही हुआ होगा। जो भी उल्कापिंड या धूमकेतु रहा होगा, वो ज़मीन से 8-10 किलोमीटर ऊपर ही टुकड़े-टुकड़े हो गया होगा। जो छोटे-छोटे टुकड़े बचे होंगे, वो बड़े इलाक़े में बिखर गए होंगे। इसीलिए वहां पर कोई गहरा गड्ढा नहीं बना। आर्तेमिएवा कहती हैं कि उस दिन ऐसा ही हुआ होगा। टक्कर की वजह से आग और धुएं का बड़ा सा गुबार उठा होगा, जिसका दायरा कई किलोमीटर रहा होगा।
लेकिन, अभी भी तुंगुस्का की कहानी पर पूर्ण विराम नहीं लगा है। कई रिसर्चर मानते हैं कि कुछ तो है, जो अभी भी राज है। 2007 में इटली के वैज्ञानिकों की टीम ने दावा किया कि तुंगुस्का से 8 किलोमीटर दूर स्थित चेको नाम की झील में उस घटना के राज छुपे हो सकते हैं। हो सकता है कि 1908 में धरती से टकराने वाला उल्कापिंड इसी झील की गहराई में दफ़्न हो गया हो। इसे रूसी रिसर्चर आसानी से निकाल सकते हैं।
हालांकि झील इतनी गहरी नहीं है कि ऐसा राज उसमें लंबे वक्त तक छुपा हो। मगर रूस ने कभी भी इस दावे की पड़ताल करने की कोशिश नहीं की। लेकिन, इटली की बोलोना यूनिवर्सिटी के लुका गैस्पेरिनी कहते हैं कि चेका झील इसी धमाके की वजह से बनी। उसके बनने का और कोई तरीका नहीं हो सकता। गैस्पेरिनी ये मानते हैं कि झील की गहराई में उस महाविस्फोट के राज छुपे हुए हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि तुंगुस्का में हुआ महाविस्फोट असाधारण खगोलीय घटना थी। वो आज तक वैज्ञानिकों के रिसर्च और सोच पर असर डाल रहा है। 2013 में रूस के चेल्याबिंस्क इलाके में एक छोटा सा उल्कापिंड टकराया था। इसकी रफ्तार और टकराने की जगह को लेकर जो अनुमान किए गए थे, वो गलत साबित हुए।
पहले माना जाता था कि चेल्याबिंस्क जैसी घटनाएं 100 साल में एक बार होती हैं। वहीं तुंगुस्का जैसे महाविस्फोट हजारों लाखों सालों में एक बार दिखते हैं। लेकिन अब अंदाजा लगाया जा रहा है कि ये विस्फोट 100-200 साल में एक बार देखने को मिल सकते हैं। अगर तुंगुस्का जैसी घटना किसी बड़ी आबादी वाले शहर में होती है, तो भयंकर तबाही मचेगी। लेकिन इसकी संभावना कम ही है। धरती का 70 फ़ीसदी हिस्सा समंदरों से मिलकर बनता है। इसलिए किसी बड़े उल्कापिंड के किसी बड़े शहर से टकराने की आशंका कम ही है।
बहुत से लोगों को लगता है कि उस दिन तुंगुस्का में कोई उल्कापिंड या धूमकेतु धरती से टकराया था। ये धमाका उसी का नतीजा था। हालांकि इस टक्कर के कोई बड़े सबूत इलाके में नहीं मिलते हैं। बाहरी चट्टान के सुराग भी वहां नहीं मिले। असल में साइबेरिया का तुंगुस्का इलाका बेहद दुर्गम है। वहां की आबो-हवा भी भी अजीबो-गरीब है। यहां सर्दियां बेहद भयानक और लंबी होती हैं। गर्मी का मौसम बहुत कम वक़्त तके लिए आता है। इस दौरान जमीन दलदली हो जाती है। इसी वजह से वहां पहुंचना बहुत मुश्किल होता है। 20 अरब किलोमीटर दूर जा चुका वोएजर क्या है? धूमकेतु बर्फ, कार्बन डाईऑक्साइड, मीथेन, अमोनिया तथा अन्य पदार्थ जैसे सिलिकेट और कार्बनिक मिश्रण के बने होते हैं
20 साल बाद भी धमाके के निशान मिले
धमाका होने के कई साल बाद तक वहां इसकी पड़ताल के लिए कोई नहीं गया। उस दौर में रूस में सियासी उथल-पुथल चल रही थी। इसलिए धमाके को किसी ने गंभीरता से लिया भी नहीं। अमरीका के एरिज़ोना स्थित प्लेनेटरी साइंस इंस्टीट्यूट की नतालिया आर्तेमिएवा कहती हैं कि धमाके के दो दशक बाद 1927 में लियोनिद कुलिक नाम के वैज्ञानिक की अगुवाई में एक रूसी टीम ने तुंगुस्का इलाके का दौरा किया। लियोनिद को धमाके के 6 साल बाद एक अख़बार में इसकी ख़बर पढ़ने को मिली थी। जिसके बाद लियोनिद ने उस इलाक़े में जाने का फैसला किया।
20 साल बाद भी वहां पहुंचने पर लियोनिद को धमाके के निशान बिखरे हुए मिले। करीब पचास वर्ग किलोमीटर के दायरे मे जले हुए पेड़ पड़े हुए थे। लियोनिद ने कहा कि धरती से कोई चीज आसमान से आकर टकराई थी। ये ब्लास्ट उसी का नतीजा था।
लेकिन, लियोनिद इस बात से हैरान था कि इस टक्कर की वजह से धरती पर कोई गड्ढा नहीं बना था। इस सवाल के जवाब मे लियोनिद ने ही कहा कि चूंकि इलाके की जमीन दलदली थी. इसलिए जो झटका टक्कर से लगा, उससे कोई निशान नहीं बना। 1938 में तुंगुस्का विस्फोट के बारे में लियोनिद कुलिक ने लिखा कि, 'हमें उम्मीद है कि धरती से 25 मीटर की गहराई में निकेल-युक्त लोहे के टुकड़े मिलेंगे। इनका वजन एक या दो सौ मीट्रिक टन हो सकता है'।
बाद में कुछ रूसी रिसर्चर्स ने कहा कि उस दिन तुंगुस्का में धरती से कोई उल्कापिंड नहीं बल्कि एक धूमकेतु टकराया था। असल में धूमकेतु चट्टानों के बजाय बर्फ से बने होते हैं। इसी वजह से इस टक्कर के बाद किसी बाहरी चट्टान के टुकड़े वहां पर नहीं मिले। धूमकेतु जब धरती के वायुमंडल में आया होगा तो बर्फ पिघलने लगी होग। मगर इस थ्योरी से भी तुंगुस्का धमाके को लेकर अटकलों का दौर खत्म नहीं हुआ। क्योंकि धमाके की असल ठोस वजह अब तक पता नहीं चल सकी है।
एक सदी से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी तुंगुस्का विस्फोट को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। कोई कहता है कि ये मैटर और एंटीमैटर के बीच टक्कर का नतीजा था। तो, किसी का दावा है कि ये एटमी विस्फोट था। एक ओर अफवाह ये भी है कि उस दिन तुंगुस्का में एलियन्स का जहाज धरती से टकराया था। वो बैकाल झील के ताजे पानी की तलाश में धरती पर आए थे।
1958 में कुछ रिसर्चर्स ने एक बार फिर तुंगुस्का इलाक़े का दौरा किया। उन्हें वहां पर सिलिकेट और मैंग्नेटाइट के छोटे-छोटे टुकड़े मिले। इनकी आगे पड़ताल की गई, तो इनमें निकेल भी मिला। निकेल आम तौर पर उल्कापिंडों की चट्टानों में बहुत पाया जाता है। इस नई खोज के बाद से एक बार फिर उस दिन उल्कापिंड के धरती से टकराने की थ्योरी को बल मिला।
रिसर्चर्स की टीम के अगुवा के। फ्लोरेंस्की ने 1963 में अपनी रिपोर्ट में लिखा कि, 'मुझे पब्लिसिटी के लिए ऐसी अटकलों की अहमियत को समझता हूं। लेकिन इससे किसी का भला नहीं होता। तथ्यों से छेड़खानी करके विज्ञान का भला नहीं हो सकता'।
लेकिन, फ्लोरेंस्की की रिपोर्ट के बाद भी तुंगुस्का को लेकर अटकलों का दौर जारी रहा। 1973 में मशहूर वैज्ञानिक पत्रिका 'नेचर' में लेख छपा। इसमें कहा गया कि साइबेरिया में 1908 में एक ब्लैक होल धरती से टकराया था। उस दिन तुंगुस्का में हुआ भयानक धमाका इसी टक्कर का नतीजा था।
बहुत से वैज्ञानिकों ने फौरन ही इस नई थ्योरी पर सवाल उठा दिए। नतालिया आर्तेमिएवा कहती हैं कि ऐसी थ्योरी इंसान की मनोदशा का नतीजा हैं। लोग गहरे राज जानने और किसी साजिश की थ्योरी में बहुत जल्दी भरोसा करते हैं। वो वैज्ञानिकों की नहीं सुनना चाहते। दिक्कत ये भी है कि तुंगुस्का में किसी आकाशीय पिंड के टुकड़े भी नहीं मिले। इसीलिए ऐसी थ्योरी को बल मिलता है।
नतालिया कहती हैं कि 110 साल पुराने धमाके को लेकर अफ़वाहों के दौर के लिए वैज्ञानिक भी जिम्मेदार हैं। क्योंकि उन्होंने इसकी सही वजह बताने में बहुत वक़्त ले लिया।
असल में वैज्ञानिकों को लगता है कि जब धरती से उल्कापिंड टकराते हैं, तो बड़े पैमाने पर तबाही मचती है. जैसा की साढ़े छह करोड़ साल पहले हुआ था. चिक्सलुब उल्कापिंड की टक्कर से डायनासोर धरती से ख़त्म हो गए थे.
2013 में वैज्ञानिकों की एक टीम ने तुंगुस्का विस्फोट से जुड़ी अटकलों के खात्मे के लिए नए सिरे से पहल की। यूक्रेन की एकेडमी ऑफ साइंस के विक्टर क्वास्नित्सया ने तुंगुस्का इलाके से मिले चट्टानों के छोटे-छोटे टुकड़ों की पड़ताल की। ये टुकड़े 1978 में जमा किए गए थे। इन टुकड़ों मे विक्टर को ग्रेफाइट जैसा तत्व मिला। ये आम तौर पर छोटे उल्कापिंडों के धरती से टकराने से बनता है।
विक्टर कहते हैं कि उनकी तफ़्तीश से इस बात के पक्के सबूत मिले हैं कि तुंगुस्का में 1908 में एक उल्कापिंड ही धरती से टकराया था। वो बताते हैं कि असल में वहां जो भी गया वो बड़े टुकड़े तलाशता रहा। जबकि होना ये चाहिए था कि दलदल में छोटे टुकड़े खोजे जाने चाहिए थे। मगर, आप ये सोचें कि विक्टर की खोज के बाद तुंगुस्का पर बहस बंद हो गई हो, तो ऐसा नहीं है। धरती पर अक्सर उल्कापिंडों की बारिश होती है। छोटे-छोटे टुकड़े यहां-वहां बिखर जाते हैं। मगर, तुंगुस्का में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला।
भले ही तमाम वैज्ञानिक अभी अटकलें लगा रहे हों। मगर, मोटे तौर पर सब का यही मानना है कि तुंगुस्का में 1908 में जो महाविस्फोट हुआ, वो धरती से किसी धूमकेतु या उल्कापिंड के टकराने से ही हुआ था। तुंगुस्का की घटना बाकी ऐसी घटनाओं से इसलिए अलग है क्योंकि ये महाविस्फोट था। इससे 10 से 15 मेगाटन टीएनटी के विस्फोट के बराबर एनर्जी निकली थी।
लंदन के इंपीरियल कॉलेज के जेरथ कॉलिंस कहते हैं कि तुंगुस्का जैसी घटनाएं हजारों-लाखों साल में एक बार होती हैं। मानवता के इतिहास में हुई ये अपने तरह की पहली घटना थी। शायद इसलिए भी इसे हम पूरी तरह से समझ नहीं पाए। नतालिया आर्तेमिएवा कहती हैं कि जब कोई ब्रह्मांडीय चीज धरती के वायुमंडल में प्रवेश करती है, तो वायुमंडल के असर से वो जलने लगती है। इससे वो कई टुकड़ों में बंट जाती है।
नासा के शोधकर्ता बिल कूक कहते हैं कि हमारा वायुमंडल, ब्रह्मांड से आने वाली ऐसी चीजों से हमारी हिफाजत करता है। इसीलिए जब कोई धूमकेतु या उल्कापिंड या क्षुद्र ग्रह हमारी धरती के वायुमंडल में घुसता है, तो वो असंख्य टुकड़ों में बंट जाता है। इस तरह कोई बड़ी तबाही होने से बच जाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि तुंगुस्का महाविस्फोट में भी यही हुआ होगा। जो भी उल्कापिंड या धूमकेतु रहा होगा, वो ज़मीन से 8-10 किलोमीटर ऊपर ही टुकड़े-टुकड़े हो गया होगा। जो छोटे-छोटे टुकड़े बचे होंगे, वो बड़े इलाक़े में बिखर गए होंगे। इसीलिए वहां पर कोई गहरा गड्ढा नहीं बना। आर्तेमिएवा कहती हैं कि उस दिन ऐसा ही हुआ होगा। टक्कर की वजह से आग और धुएं का बड़ा सा गुबार उठा होगा, जिसका दायरा कई किलोमीटर रहा होगा।
लेकिन, अभी भी तुंगुस्का की कहानी पर पूर्ण विराम नहीं लगा है। कई रिसर्चर मानते हैं कि कुछ तो है, जो अभी भी राज है। 2007 में इटली के वैज्ञानिकों की टीम ने दावा किया कि तुंगुस्का से 8 किलोमीटर दूर स्थित चेको नाम की झील में उस घटना के राज छुपे हो सकते हैं। हो सकता है कि 1908 में धरती से टकराने वाला उल्कापिंड इसी झील की गहराई में दफ़्न हो गया हो। इसे रूसी रिसर्चर आसानी से निकाल सकते हैं।
हालांकि झील इतनी गहरी नहीं है कि ऐसा राज उसमें लंबे वक्त तक छुपा हो। मगर रूस ने कभी भी इस दावे की पड़ताल करने की कोशिश नहीं की। लेकिन, इटली की बोलोना यूनिवर्सिटी के लुका गैस्पेरिनी कहते हैं कि चेका झील इसी धमाके की वजह से बनी। उसके बनने का और कोई तरीका नहीं हो सकता। गैस्पेरिनी ये मानते हैं कि झील की गहराई में उस महाविस्फोट के राज छुपे हुए हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि तुंगुस्का में हुआ महाविस्फोट असाधारण खगोलीय घटना थी। वो आज तक वैज्ञानिकों के रिसर्च और सोच पर असर डाल रहा है। 2013 में रूस के चेल्याबिंस्क इलाके में एक छोटा सा उल्कापिंड टकराया था। इसकी रफ्तार और टकराने की जगह को लेकर जो अनुमान किए गए थे, वो गलत साबित हुए।
पहले माना जाता था कि चेल्याबिंस्क जैसी घटनाएं 100 साल में एक बार होती हैं। वहीं तुंगुस्का जैसे महाविस्फोट हजारों लाखों सालों में एक बार दिखते हैं। लेकिन अब अंदाजा लगाया जा रहा है कि ये विस्फोट 100-200 साल में एक बार देखने को मिल सकते हैं। अगर तुंगुस्का जैसी घटना किसी बड़ी आबादी वाले शहर में होती है, तो भयंकर तबाही मचेगी। लेकिन इसकी संभावना कम ही है। धरती का 70 फ़ीसदी हिस्सा समंदरों से मिलकर बनता है। इसलिए किसी बड़े उल्कापिंड के किसी बड़े शहर से टकराने की आशंका कम ही है।