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नशेड़ियों की राजधानी बनता अफगान
Updated Thu, 11 Apr 2013 07:43 PM IST
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अफगानिस्तान में दुनिया की करीब 90 फ़ीसदी अफीम पैदा होती है। अभी हाल तक वहां अफीम खाने वालों की संख्या बहुत कम थी।
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लेकिन आज साढ़े तीन करोड़ की आबादी वाले इस देश में क़रीब दस लाख लोग अफ़ीम और इससे बनी दवाओं का सेवन करते हैं। यह औसत दुनिया में सबसे अधिक है।
क़ाबुल में बहने वाली क़ाबुल नदी के किनारे लोग हेरोइन की खरीद-फरोख्त के लिए जमा होते हैं। यह एक बदनाम और दयनीय जगह है।
दिन के उजाले में वहां करीब दर्जन भर व्यस्क और किशोर जमे हैं, वे सिगरेट पी रहे हैं और दवाओं की सुइयां लगा रहे हैं। इनमें से कुछ डॉक्टर हैं, कुछ इंजीनियर हैं तो कुछ व्यापारी।
नशेड़ियों के सुधार के लिए काम करने वाली संस्था ‘नाजत’ के पदाधिकारी तारीक सुलेमान यहां नशेड़ियों को समझाने के लिए रोज आते हैं।
आतंकवाद और नशा
वे कहते हैं, ''हम पहले ही आत्मघाती हमलों, बम धमाकों और रॉकेट के हमलों में अपने बच्चों को खो रहे हैं। लेकिन अब नशा भी आतंकवाद की ही तरह हो गया है, जो हमारे देशवासियों का मार रहा है।''
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देश के उत्तरी हिस्से के बदखाहशान के रहने वाले 18 साल के जावेद पिछले 10 साल से हेरोइन ले रहे हैं। खेतों में जमकर काम करवाने के लिए उनके चाचा ने उन्हें बचपन में ही हेरोइन का आदी बना दिया था।
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वह कहते हैं,'' इस उम्र में मुझे स्कूल में होना चाहिए।लेकिन मैं नशे का आदी हो चुका हूं।'' जावेद के पिता की मौत हो चुकी है।
उनकी विकलांग मां, चाहती हैं कि उनका बेटा एक साफ-सुथरा जीवन जिए। वे बेटे के दवाओं की खुराक के लिए सड़क पर भीख मांगती हैं।
यह जानना काफी कठिन है कि अधिकांश अफ़गानी नशेड़ी क्यों होते जा रहे हैं। लेकिन यह साफ़ है कि दशकों से जारी हिंसा का इसमें काफी योगदान है।
अधिकारियों का कहना है कि देश में फैली हिंसा के दौर में बहुत से लोग ईरान और पाकिस्तान चले गए थे, जहां नशे की दर पहले से ही अधिक रही है।
क़रीब 30 साल बाद वे एक बार फिर लौट आए हैं, नशे की बीमारी वे अपने साथ लाए हैं। अफ़ग़ानिस्तान में बेरोजगारी की दर क़रीब 40 फ़ीसदी है, इससे भी नशेड़ियों की संख्या बढ़ रही है।
आसान पहुंच
एक अस्पताल में प्रबंधक का काम कर चुके फारूख कहते हैं, ''अगर मेरे पास नौकरी होती तो, मैं यहां नदी के किनारे नहीं होता। मैं जिस हालत में हूं, उसकी तुलना में मैं मर जाना पसंद करुंगा।''
हेरोइन की उपलब्धता बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि पिछले कुछ सालों से अफ़ग़ानिस्तान में ही अफीम से हेरोइन बनाई जाने लगी है।
काबुल में हेरोइन खरीदना उतना ही आसान है जितना खाना खरीदना। यहां के किसी भी कोने में एक ग्राम हेरोइन छह डॉलर में खरीदी जा सकती है।
साल 2001 में जब विदेशी फ़ौजें में अफ़गानिस्तान आई थीं तो उनका एक मकसद नशीले पदार्थों का उत्पादन बंद करना भी था। लेकिन चरमपंथियों से लड़ाई में ऐसी उलझीं कि उन्होंने अफ़ीम की खेतों की ओर से आंखें फेर लीं।
अफगानिस्तान में सदियों से अफ़ीम का उपयोग दवाओं के रूप में होता आ रहा है।
देश के उत्तर में स्थित मजार-ए-शरीफ शहर के एक अस्पताल में फ़ातिमा भर्ती हैं।
उन्होंने बताया कि बच्चा पैदा होते समय अत्यदिक रक्तस्राव वजह से उन्हें अफ़ीम लेनी पड़ी। उनके लिए डॉक्टर के पास जाने से सस्ता अफीम था।
उन्होंने बच्चे की दूध पीने की आदत छुड़वाने के लिए उसे भी अफीम का स्वाद चखा दिया। आजकल मां-बेटे, दोनों अफीम के आदी हैं। अफगानिस्तान के 40 फ़ीसदी बच्चे और महिलाएं नशीली दवाओं के आदी हैं।
महंगा इलाज
फ़ातिमा और उनके बच्चे का एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है। लेकिन ऐसे बहुत से लोगों को यह सुविधा हासिल नहीं है।
स्वास्थ्य मंत्रालय देशभर में 95 ऐसे अस्पताल चला रहा है, जहां नशे का इलाज किया जाता हैं। इनमें 2305 लोगों के इलाज की व्यवस्था है।
देश के क़रीब दस लाख नशेड़ियों के इलाज के लिए क़रीब 22 लाख डॉलर सालाना का बजट है, यानी की एक आदमी के इलाज पर दो डॉलर ही खर्च किया जाता है।
जावेद इससे तीन गुने से अधिक की हेरोइन एक दिन में खा जाते हैं। जब मैं काबुल में था तो उन्हें तारीक सुलेमान नाजत चैरिटी के अस्पताल में इलाज के लिए जगह मिल गई। उनका तीन दिन तक इलाज चला।
मरीजों का सिर मूंड़ कर इलाज शुरू किया गया। इसके एक दिन बाद ही जावेद को दर्द सताने लगा, जिसे वे सह गए। लेकिन दूसरी रात वे चीखने-चिल्लाने लगे। दर्द से परेशान जावेद अपना सिर दीवारों से टकरा रहे थे।
एक दिन मैं उनसे सड़क पर मिला तो उन्होंने इससे इनकार किया की वे हेरोइन की तलाश में आए हैं। लेकिन उनकी लाल आंखें और लड़खड़ाती आवाज कुछ और ही कहानी बयां कर रहीं थीं।
गोधूली की बेला में वे जिस तरह से वह गायब हो गए, उससे इस बात की संभावना कम है कि वे अपनी आदत को छोड़ पाएं।
ताहिर कादरी
बीबीसी न्यूज, काबुल