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एक संन्यासिन की सुरमयी जीवन यात्रा

Fri, 03 May 2013 08:03 AM IST
Updated Fri, 03 May 2013 08:03 AM IST
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dolma story

आनी छोयिंग डोल्मा ने तेरह बरस की उम्र में संन्यासिन बनने का फ़ैसला कर लिया। अपने गुस्सैल पिता की मार और ग़रीबी से बचने का उन्हें ये सबसे आसान रास्ता नज़र आया।

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लेकिन उन्हें तब शायद से पता नहीं था कि इस रास्ते पर चलते हुए वो एक दिन अपनी आवाज़ की आध्यात्मिक को पा लेंगी और इसके ज़रिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति हासिल होगी।
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डोल्मा काठमांडू के पास आर्यतारा स्कूल चलाती हैं जहाँ दूर दराज से आई छोटी बच्चियों को शिक्षा दी जाती है। उन्होंने दुनिया के नामी-गिरामी संगीतज्ञों के साथ 20 से ज़्यादा शहरों में अपने संगीत के सुर बिखेरे हैं।
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