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ब्लॉगर ने तोड़ी ढाका की 'इस्लामी नाकाबंदी'
बीबीसी
Updated Tue, 07 May 2013 08:14 PM IST
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बांग्लादेश की राजधानी ढाका देश के बाक़ी हिस्सों से कटी हुई है क्योंकि इस्लामी संगठन हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम ने पूरे शहर की नाकेबंदी कर रखी है। संगठन के हज़ारों कार्यकर्ता रविवार सुबह से शहर में प्रवेश के सभी छह मार्गों पर प्रदर्शन कर रहे हैं।
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ये लोग देश में इस्लामिक शासन लागू करने के साथ ही अनीश्वरवादी ब्लॉगर्स को कठोर सज़ा देने की मांग कर रहे हैं। इनका कहना है कि ये ब्लॉगर इस्लाम का अपमान कर रहे हैं।
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हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम के कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर शाहबाग़ क्रांति चला रहे ब्लागर्स पर भी हमला किया है।
कारण ये है कि शाहबाग आंदोलन में जब ब्लॉगर्स ने लिखना शुरु किया तो भारी तादाद में लोग इस आंदोलन से जुड़ने लगे। जानिए एक अनाम ब्लॉगर से कि उन्होंने क्यों और कैसे ब्लॉग लिखना शुरु किया।
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ब्लॉगर की कहानी
मैं बांग्लादेश में नहीं रहता। मैं बाहर रहकर पढ़ाई करता हूं। शाहबाग आंदोलन में पहली बार मैं सात फरवरी को शामिल हुआ। मैंने अपने जीवन में युवाओं के बीच इतनी जागरुकता पहले कभी नहीं देखी थी। इसके बाद मैंने तय किया कि मैं अपना ट्विटर अकाउंट खोलूंगा और इसके बारे में लोगों को रात-दिन सूचनाएं दूंगा।
शाहबाग आंदोलन शुरू होते ही ब्लॉगर्स अचानक सेलेब्रिटी बन गए। लेकिन अहमद हैदर की हत्या के बाद लोगों ने ब्लॉगर की तरफ से मुंह मोड़ लिया। वे घोषित तौर पर नास्तिक थे।
लेकिन इसके बाद लोग सभी ब्लॉगर्स को नास्तिक की तरह देखने लगे। लोग ब्लॉगर्स को इस्लाम को बदनाम करने वाला बता रहे हैं। मैंने बहुत से लोगों को हैदर की हत्या को जायज़ ठहराते देखा है। जहां तक मेरी बात है, मैं नास्तिक नहीं हूं। लेकिन मैं धार्मिक भी नहीं हूं।
नास्तिक ब्लॉगर
मैं पिछले आठ साल से बांग्ला भाषा में ब्लॉगिंग कर रहा हूं। मैं अपने तजुर्बे के आधार पर कह सकता हूं कि बांग्लादेश के एक फीसद से भी कम ब्लॉगर नास्तिक हैं। इनमें से कुछ का विकास उग्र इस्माम की आलोचना करते हुआ।
इस्लामी कट्टरपंथियों ने 84 ब्लॉगरों की लिस्ट जारी की है। इनमें कई को मैं जानता हूं। लेकिन वे नास्तिक नहीं हैं। असल में वो लोग शाहबाग आंदोलन के कार्यकर्ता हैं। उन्हीं लोगों ने शाहबाग आंदोलन को हवा दी है। शायद यही वजह है कि जमाते- इस्लामी के लोग उन्हें निशाने पर ले रहे हैं।
अब सबका ध्यान शाहबाग आंदोलन से हटकर ब्लॉगरों पर केंद्रित हो गया है। इसके लिए हमें 1971 का इतिहास देखना होगा। 1971 में बांग्लादेश में मुक्ति आंदोलन शुरू हुआ था। पाकिस्तान ने इसे हिंदुओं और धर्मनिरपेक्ष लोगों के खिलाफ जेहाद का नाम दिया था।
इसके बाद 1993 में जहान उर इमाम ने जब युद्ध अपराधियों को सजा देने के लिए मुहिम शुरू की तो उग्र कट्टरपंथियों ने उन्हें नास्तिक कहा। असल में बांग्लादेश में अगर आप किसी को नास्तिक कहते हैं तो आप आसानी से उसकी छवि नकारात्मक बना सकते हैं। उसे सज़ा दे सकते हैं।
इस्लामी कट्टरपंथियों ने यह पहले भी किया था। इस बार भी वो यही कर रहे हैं। शाहबाग आंदोलन हालांकि पूरी तरह मरा नहीं है। लेकिन उसमें रुकावट आ गई है और ये हुआ है इसके नेताओं के ग़लत फैसलों की वजह से।
शाहबाग आंदोलन के नेताओं ने सत्तारूढ़ पार्टी आवामी लीग से नजदीकी दिखाई। इस वजह से जनता का उनसे भरोसा उठने लगा और इस्लामी कट्टरपंथियों ने आंदोलन को हड़प लिया।
मैं ब्लॉग चलाता हूं। लेकिन बेनामी होकर। इस समय बांग्लादेश में 25 से 30 कम्युनिटी ब्लॉग हैं। इसके अलावा छह-सात लाख ब्लॉगर हैं। इनमें से 50-60 हज़ार ब्लॉगर राजनीतिक मसलों पर सक्रिय हैं। असल में बांग्लादेश के बहुत से ब्लॉगर देश के बाहर से बैठकर ब्लॉगिंग कर रहे हैं।
बढ़ता कट्टरवाद
अब जबकि बांग्लादेश के बहुत से छात्र घरों से निकलकर प्रदर्शन कर रहे हैं और पाकिस्तान की तरह यहां भी ईशनिंदा कानून लागू करने की मांग कर रहे हैं, मैं परेशानी महसूस करता हूं। मैंने अपने ब्लॉग पर विज्ञान से संबंधित पोस्ट डाली थी।
लेकिन बाद में मैंने उस पोस्ट को डिलीट कर दिया क्योंकि मुझे खुद को अच्छा दिखाना था। मुझे दिखाना था कि मैं नास्तिक नहीं हूं और मैं इस्लाम की बुराई भी नहीं करता हूं।
बांग्लादेश में जो ब्लॉगर अपना नाम और पहचान जाहिर कर रहे हैं उन्हें इस समय बहुत दिक्कत हो रही है।
हालांकि बांग्लादेश के लोग इंटरनेट के बारे में ज्यादा नहीं जानते, लेकिन वे लोग ब्लॉगर्स को जानने लगे हैं। अब अगर किसी के बारे में पता चलता है कि वह ब्लॉगर है, तो लोग उसे ऐसे देखते हैं जैसे वह किसी दूसरे ग्रह का प्राणी हो।
मैंने मदरसे के छात्रों से बात की है। वो ठीक-ठीक नहीं जानते कि ब्लॉगर क्या चीज है, लेकिन वो यह जानते हैं कि ब्लॉगर्स उपदेश देने लगे हैं। मेरे आसपास के लोग ट्विटर अकाउंट के बारे में जानते हैं। लेकिन वे यह नहीं जानते है कि इन्हें चलाता कौन है। यहां तक कि शाहबाग के नेता भी ट्विटर के बारे में जानते थे।
लेकिन वो भी मेरा नाम नहीं जानते थे। सिवाय कुछ लोगों के। इस्लामी कट्टरपंथियों की लिस्ट में जो ब्लॉगर हैं उन्हें पुलिस की सुरक्षा मिली हुई थी। लेकिन उन लोगों ने पुलिस की सुरक्षा हटा दी।
(यह लेख बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित है। इस ब्लॉगर ने सुरक्षा कारणों से अपना नाम जाहिर करने से मना कर दिया है।)