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गूगल पर मरने के तरीके ढूंढ रहे बच्चे, शरणार्थी केंद्रों पर बड़ा खतरा
न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूज सर्विस, केनबरा
Updated Tue, 28 Aug 2018 05:46 PM IST
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आमतौर पर गूगल सर्च इंजन पर हर वह चीज मौजूद रहती है जो हम खोजना चाहते हैं। इसके द्वारा यह भी पता लगाया जा सकता है कि किसी देश या शहर के यूजर किस तरह की सूचनाओं को सर्च कर रहे हैं। इसी संबंध में ऑस्ट्रेलियाई व्हिसल ब्लोअर ने जो जानकारी जुटाई है वह चौंकाने वाली है, क्योंकि यहां पर शरणार्थी केंद्र में रहने वाले बच्चे खुद को मारने और नुकसान पहुंचाने के तरीके गूगल पर सर्च कर रहे हैं।
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ऑस्ट्रेलिया के व्हिसल ब्लोअर ने जुटाई जानकारी, शरणार्थी केंद्रों के बच्चे संकट के दौर में
900 शरणार्थी बच्चों पर हुई शोध में 120 ने गूगल पर आत्मघाती उपाय तलाशे
गूगल पर की जाने वाली इस तरह की खोज बताती है कि दुनिया में शरणार्थी संकट किस दौर से गुजर रहा है। इस समस्या का बच्चों पर पड़ने वाला हताशावादी असर इस बात के संकेत देता है कि शरणार्थी समस्या अब खतरनाक दौर में प्रवेश कर रही है। ऑस्ट्रेलिया के नाउरू आप्रवासन केंद्र में बच्चों द्वारा खोजी गई इन सूचनाओं के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसे हैरानी वाला मामला बताया है। ऑस्ट्रेलियाई प्रसारणकर्ता एबीसी ने इस संबंध में देश भर की घटनाओं पर व्हिसल ब्लोअर द्वारा एकत्रित दस्तावेजों का खुलासा किया है।
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1000 में से दुनिया के 850 रिफ्यूजी बच्चे गुलामी की जिंदगी जीने को मजबूर
इस द्वीप पर अगस्त 2016 से अप्रैल 2018 तक अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य व मेडिकल सेवा (आईएचएमएस) से जुड़े बाल मनोचिकित्सक वेरनॉन रिनॉल्ड्स ने इस रिपोर्ट पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में शरणार्थी बच्चों में गंभीर आघात के संकेत मिल रहे हैं। गूगल सर्च ने इस बारे में अधिकृत रिपोर्ट पेश की है। शरणार्थी कैंपों के भीतर बच्चों में सब कुछ छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ रही है और यह सिंड्रोम बच्चों को बेहोशी की हालत तक में ले जा सकता है।
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बच्चों में उभर रही है आत्मघाती प्रवृत्ति
यदि शरणार्थी बच्चों को अलग भी कर दिया जाए तो मौजूदा दौर में माता-पिता के तनाव और दबाव के चलते बच्चों में आत्मघात की प्रवृत्ति बढ़ रही है। हालांकि गूगल पर इसकी कोई अलग से जानकारी नहीं है लेकिन दुनिया के बच्चे अब खुद को खत्म करने के लिए सर्च इंजन का सहारा लेने लगे हैं। इंटरनेशनल हैल्थ एंड मेडिकल सर्विस (आईएचएमएस) की वरिष्ठ कार्यकर्ता फियोना ओवेंस ने इसकी पुष्टि की। उन्होंने कहा कि बेहद अधिक दबाव में बच्चे सोचते हैं कि वे क्या उपाय करें कि उन्हें दर्द भी न हो और हताशा भी खत्म हो जाए।