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अफ़ग़ानिस्तानः 'जारी रहेगी शांति प्रक्रिया'
Updated Wed, 26 Jun 2013 04:03 PM IST
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काबुल में मंगलवार को हुए हमले के बावजूद अमेरिका और अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपतियों ने तालिबान से वार्ता करने की “फिर से पुष्टि” की है।
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अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यालय के अनुसार एक वीडियो कांफ्रेंस में बराक ओबामा और हामिद करज़ई ने इस बात पर सहमति जताई कि शांति प्रक्रिया से ही हिंसा को समाप्त किया जा सकता है।
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उन्होंने दोहा में तालिबान के कार्यालय का समर्थन करने की बात को भी दोहराया।
आपत्ति
मंगलवार को राष्ट्रपति निवास और एक सीआईए स्टेशन पर हुए हमले में तीन गार्ड्स और चार चरमपंथियों की मौत हो गई थी।
हमले में कम से कम दो वाहनों का इस्तेमाल किया गया जो अंतरराट्रीय सेनाओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले वाहनों जैसे थे।
पुलिस के अनुसार चरमपंथियों ने नकली बैजों और वाहन पासों का भी इस्तेमाल किया जिसकी वजह से वे राजधानी के बेहद सुरक्षित इलाके में प्रवेश कर पाए।
हमले के समय करज़ई निवास के अंदर ही थे लेकिन हमले का निशाना एरियाना होटल के पास था जहां सीआईए स्टेशन है।
शांति प्रक्रिया में शामिल होने के लिए कतर की राजधानी में तालिबान का एक कार्यालय खोलने के कुछ दिन बाद ही यह हमला हुआ है।
अमेरिका ने घोषणा की है कि वह तालिबान से औपचारिक रूप से वार्ता शुरू करेगा जिसके बाद अफ़गानिस्तान भी वार्ता करेगा।
करज़ई ने तालिबान के झंडे और निशान, “इस्लामिक अमीरात ऑफ़ अफ़गानिस्तान” के चलते तालिबान के कार्यालय का विरोध किया था। उनका कहना था कि तालिबान यह दिखाना चाह रहा है कि वह निर्वासित सरकार है।
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उन्होंने अपनी सरकार की ओर से बातचीत के लिए अधिकृत उच्च शांति परिषद को चेतावनी दी कि वे तब तक शांति वार्ता में हिस्सा न लें जब तक इसका “अफ़गान नेतृत्व” न हो।
अमेरिकी विदेश मंत्री के कतर सरकार को तालिबान का झंडा और निशान उतरवाने के लिए मनाने के बाद ही करज़ई नरम पड़े।
मुश्किल
काबुल में मंगलवार के हमले के बाद करज़ई ने कहा कि तालिबान ऐसा नहीं कर सकता कि एक ओर तो कतर में शांति वार्ता के लिए कार्यालय खोले और दूसरी ओर अफ़गानिस्तान में लोगों को मारना जारी रखे।
उन्होंने कहा, “अफ़गानों के दुश्मनों ने अपने विफल हमले से एक बार फिर साबित किया है कि वह अफ़गानिस्तान में शांति, स्थिरता और विकास के खिलाफ़ हैं।”
अमेरिकी राजदूत जेम्स कनिंघम का कहना है कि हमले का उद्देश्य सफल नहीं हो पाया है और इसने “हिंसा और आतंक के ज़रिए अपने लक्ष्य को पाने की तालिबान की कोशिशों की निरर्थकता को ही साबित किया है।”
व्हाइट हाउस के प्रवक्ता जे कार्नी ने बाद में कहा कि वीडियो कांफ्रेंस में ओबामा और करज़ई दोनों ने “इस बात को फिर से माना कि अफ़गान-नेतृत्व और अफ़गान-अधिकार वाली शांति और सामंजस्य प्रक्रिया ही हिंसा को खत्म करने और अफग़ानिस्तान और क्षेत्र में स्थायित्व कायम करने का सबसे पक्का तरीका है।”
“उन्होंने उच्च शांति परिषद और तालिबान के अधिकृत प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के लिए दोहा में कार्यालय का फिर समर्थन किया।”
दोनों नेताओं ने पिछले हफ़्ते नाटो से अफ़गान सेनाओं को सुरक्षा की ज़िम्मेदारी स्थानांतरित करने, अफ़गान-नेतृत्व वाले सामंजस्य के प्रयासों, अफ़गानिस्तान में 2014 में होने वाले चुनाव और द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते पर बातचीत के बारे में भी चर्चा की।
कार्नी के अनुसार, “दोनों राष्ट्रपतियों ने माना कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव अफ़गानिस्तान के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।”
वॉशिंगटन में बीबीसी संवाददाता जेन लिटिल कहती हैं कि मंगलवार के हमले से पता चलता है कि संवाद कायम करने की प्रक्रिया कितनी मुश्किल है।