{"_id":"5c42d7b2bdec22737361ae58","slug":"report-said-foreign-staff-in-america-and-spain-are-over-qualified-according-their-posts","type":"story","status":"publish","title_hn":"अमेरिका, इंग्लैंड सहित 15 देशों के स्टाफ हैं ज्यादा पढ़े-लिखे, भारत में यह है समस्या","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
अमेरिका, इंग्लैंड सहित 15 देशों के स्टाफ हैं ज्यादा पढ़े-लिखे, भारत में यह है समस्या
Sat, 19 Jan 2019 01:24 PM IST
Sneha Baluni
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
Published by: Sneha Baluni
Updated Sat, 19 Jan 2019 01:24 PM IST
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विकसित देशों में इस तरह के कर्मचारियों की संख्या में इजाफा हो रहा है जो अपने काम के लिहाज से ज्यादा पढ़े-लिखे यानी ओवर क्वालिफाइड हैं। इस संख्या में विदेशी कर्मचारी सबसे ज्यादा हैं। यह जानकारी ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) ने सभी देशों की स्टडी के बाद दी है।
विज्ञापन
किसी काम की जरूरत के लिए यदि पढ़े लिखे कर्मचारियों के फायदे होते हैं तो इसके नुकसान भी हैं। फायदा यह होता है कि कर्मचारी बेहतर प्रदर्शन करता है। वहीं ऐसे कर्मचारियों को ज्यादा तनख्वाह की उम्मीद होती है। उनमें काम करने को लेकर नाखुशी रहती है और कंपनी छोड़ने की संभावना अधिक रहती है। जिन 15 देशों पर शोध किया गया है उसके एक-तिहाई विदेशी स्टाफ ओवर क्वालिफाईड हैं।
विज्ञापन
इन देशों में आने वाले विदेशियों ने अपनी योग्यता और क्षमता के हिसाब से कमतर नौकरी ली है। सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा 74.5 फीसदी स्टाफ दक्षिण कोरिया में है। उसका घरेलू आंकड़ा 59.6 प्रतिशत है। दक्षिण यूरोपीय देशों में भी जरूरत से ज्यादा पढ़ा-लिखा स्टाफ है। इसके बाद ग्रीस, स्पेन और इटली का नंबर आता है। ग्रीस में ओवर क्वालिफाईड कर्मचारियों की संख्या 60.7 प्रतिशत, स्पेन में 53.6 प्रतिशत और इटली में 51.7 प्रतिशत है।
विज्ञापन
अमेरिका में विदेशी और घरेलू ओवर क्वालिफाइड स्टाफ में सबसे कम अतंर है। यहां के 36.6 प्रतिशत विदेशी और 35.6 फीसदी घरेलू कर्मचारी ज्यादा पढ़े-लिखे हैं। भारत की बात करें तो यहां शिक्षा के हिसाब से काम न मिलना बहुत बड़ी समस्या है। पिछले साल नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने यह बात कही थी। उन्होंने इस समस्या को बेरोजगारी से भी ज्यादा गंभीर बताया था। उनसे पहले आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया इस बात को कह चुके हैं।