अफगानिस्तान: तालिबान को कतर का बड़ा सहारा, प्रमुख सूत्रधार बनने से दुनिया में बढ़ने लगा कद
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विस्तार
31 अगस्त को अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान छोड़ देने के बाद तालिबन ने जश्न में गोलियां तो जरूर चलाईं लेकिन लाखों अफगान नागरिकों के भविष्य के साथ वह अलग-थलग हो गया था। सूखे, भूखमरी, अर्थव्यवस्था के ढहने जैसे तमाम चुनौतियों के साथ काबुल के हामिद करजई एयरपोर्ट को लेकर भी तालिबान के सामने बड़ी रणनीतिक और मानवीय समस्या खड़ी है। तभी काबुल एयरपोर्ट की इस समस्या के समाधान के लिए कतर आगे आया। अपने इंजीनियरों और टेक्निशियनों को भेज कर एयरपोर्ट के दोबारा संचालन पर काम कर रहा है।तालिबान का आरोप था कि पश्चिमी बलों ने अपने निकासी मिशन के दौरान एयरपोर्ट को क्षतिग्रस्त कर दिया था। अमेरिकी अधिकारियों ने भी स्वीकारा था कि काबुल एयरपोर्ट के बुनियादी ढांचे को नष्ट कर दिया गया है। इस एयरपोर्ट का संचालन दोबारा कैसे शुरु किया जाए, इसे लेकर तालिबान सोच में पड़ा था।
तालिबान के साथ मिलकर काबुल के हवाई अड्डे को फिर से खोलने के लिए इस खाड़ी देश के इंजीनियर्स, टेक्निशियन और विशेषज्ञ काबुल पहुंचने लगे हैं। कतर ने कहा कि उसकी मुख्य प्राथमिकता हवाई अड्डे की सुविधाओं और सुरक्षा को ध्यान रखते हुए उसका नियमित संचालन बहाल करना है। अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद दुनिया की कई ताकतें वहां अपना प्रभाव डालने के लिए हाथ-पांव मार रही हैं। और इस प्रक्रिया में मुस्लिम दुनिया का एक देश कतर प्रमुख मध्यस्थ और सूत्रधार के रूप में उभर रहा है।
अमेरिका ने भी मांगी थी मदद
15 अगस्त को काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद अमेरिका ने हजारों लोगों को देश से बाहर निकालने में कतर से मदद मांगी थी। अंततराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अफगानिस्तान से बाहर निकाले गए लोगों में से करीब 40 फीसदी कतर के रास्ते से ही बाहर निकले। अमेरिका ने पिछले सप्ताह बताया था कि 14 अगस्त के बाद से अफगानिस्तान से 1,13,500 लोगों को निकाला गया। वहीं कतर दावा था कि उसके सैन्य वाहन से 43,000 से अधिक लोग इस देश के जरिए बाहर निकलने में कामयाब हो सके।
जिसमें बोर्डिंग स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाली छात्राएं, राजदूतों में काम करने वाले कर्मचारी और बड़ी संख्या में पत्रकार भी शामिल थे। अंततराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने भी अपने कर्मचारियों और पत्रकारों को बाहर निकालने के लिए कतर से ही सहयोग मांगा था। कतर एयरवेज ने अपनी राजधानी दोहा से दूसरे देश में निकाले गए लोगों को ले जाने के लिए 10 विमान भी उपलब्ध कराए थे।
खाना बांटने से लेकर बच्चों के जन्म तक में मदद
मिली जानकारी के मुताबिक लोगों को अफगानिस्तान से बाहर निकालते समय कतर ने एक आपातकालीन फील्ड अस्पताल, आश्रय स्थलों और पोर्टेबल वॉशरूम का निर्माण भी किया था। एक तरफ अमेरिकी सैनिक भूखे-प्यासे हवाईअड्डे पर जमा लोगों को खाना बांट रहे थे वहीं कतर की सेना ने भी काबुल एयरपोर्ट से लेकर दोहा तक 50 हजार लोगों को खाना खिलाया। कतर में अभी भी करीब 20 हजार शरणार्थी वहीं और अन्य देशों में शरण लेने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
कतर सरकार ने फीफा विश्व कप के लिए बनी सुसज्जित अपार्टमेंट को शरणार्थियों की मेजबानी के लिए दे दिया है। फीफा विश्व कप अगले साल दोहा में खेला जाना है। कतर पहुंचने के बाद से सात अफगान महिलाओं ने दोहा में बच्चों को जन्म दिया। मां और बच्चे को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराई गईं। बताया जा रहा है कि कतर कुछ अफगानी छात्राओं को दोहा में अपनी शिक्षा जारी रखने और छात्रवृत्ति देने की भी पेशकश कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लोगों की निकासी में कतर के इस सहयोग के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने व्यक्तिगत रूप से कतर के 41 वर्षीय अमीर तमीम बिन हमद अल थानी को फोन कर उनकी सराहना की। बताया जाता है कि बाइडन ने कहा कि कतर के समर्थन के बिना अमेरिका के नेतृत्व वाली एयरलिफ्ट संभव नहीं होती, जिसमें हजारों लोगों को बाहर निकाला जा सका। थिंक टैंक इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रूप की वरिष्ठ सलाहकार दीना एस्फांडियरी ने बीबीसी को बताया " कतर को शामिल किए बिना कोई भी इस तरह अफगानिस्तान से इतनी बड़ी निकासी की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाता।"
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ने लगा कतर का कद?
विदेश मामलों के जानकार रॉबिन्दर सचदेव कहते हैं, निश्चित तौर पर तालिबान के आने से दुनिया में कतर का कद बढ़ेगा। क्योंकि निकासी कार्यक्रम में उसने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरी तरफ अंतर्राष्ट्रीय संयुक्त राष्ट्र एजेंसियां भी अफगानिस्तान को मदद पहुंचाने के लिए कतर की ओर देख रही है। काबुल में कई विदेशी दूतावास बंद हो जाने के बाद ज्यादातर देश कतर से ही अपने दूतावास के संचालन पर विचार कर रहे हैं। अमेरिका और नीदरलैंड ने वहां अपना दूतावास खोल लिया है।
सचदेव बताते हैं, जापानी विदेश मंत्रालय ने भी बीते बुधवार को घोषणा की है कि तालिबान के साथ बातचीत के लिए जापान ने दोहा में एक अस्थायी कार्यालय स्थापित किया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के इस कदम से कतर की हैसियत बढ़ेगी उसकी जेब में पैसा भी आएगा। इसलिए कहा जा सकता है कि अफगानिस्तान में हुए घटनाक्रम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कतर बहुत प्रभावशाली और महत्वपूर्ण हो गया है। इससे निश्चित तौर पर उसे राजनीतिक लाभ भी मिलेगा।
राजनीतिक लाभ हासिल करने से विदेश मंत्री का इंकार
हालांकि कतर के सहायक विदेश मंत्री लोलवा अल-खतर ने राजनीतिक लाभ हासिल करने के किसी भी तरह की बात को अस्वीकार किया। पिछले हफ्ते एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया से बातचीत में उन्होंने कतर के इन तमाम प्रयासों को विशुद्ध रूप से रणनीतिक मानने से इंकार कर दिया। उन्होंन कहा "अगर कोई यह मानता है कि यह केवल राजनीतिक लाभ के किया गया, तो मेरा विश्वास कीजिए, प्रचार पाने के और तरीके हो सकते हैं। अपने लोगों को और अपनी जमीन को जोखिम में डाल कर कोई ऐसा नहीं करना चाहेगा।
तालिबान के टॉप 20 से ज्यादा नेताओं के घर यहां
यह देश तालिबान और अमेरिका के बीच लंबे समय से एक विश्वसनीय मध्यस्थ बना हुआ है। तालिबान का राजनीतिक कार्यालय भी यहीं है। जानकार बताते हैं कि तालिबान ने अपना कार्यालय खोलने के लिए कतर को इसलिए प्राथमिकता दी क्योंकि उसे लगा था कि देश तटस्थ और संतुलित है। वह कतर को एक ऐसे देश के रूप में देखता है जिसके सभी पक्षों के साथ संतुलित संबंध हैं और इस्लामी दुनिया में उसे एक प्रतिष्ठित मुकाम हासिल है।
हाल के कुछ सालों में कतर में तालिबान के प्रतिनिधियों की संख्या और उनकी गतिविधियों में धीरे-धीरे इजाफा होने लगा। कहा जाता है कि वे पाकिस्तान के रास्ते कतर पहुंचे हैं। तालिबान के टॉप के 20 से अधिक नेता अपने परिवारों के साथ यहां रहने लगे। कतर से ही तालिबान अपने प्रतिनिधियों को जापान, फ्रांस, जर्मनी और ईरान भेजने लगा।
कतर ने ही अमेरिका-तालिबान शांति वार्ता की मेजबानी की थी
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रशासन ने जब तालिबान से युद्ध समाप्त करने की मांग की तो कतर ने ही 2011 से शांति प्रयासों पर चर्चा करने के लिए तालिबान नेताओं की मेजबानी की। जब डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति पर थे तब कतर में ही तालिबान और अमेरिका ने फरवरी 2020 में अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने के शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। राष्ट्रपति का पद ग्रहण करने के बाद, जो बाइडन ने घोषणा की कि वह 11 सितंबर तक पूर्ण वापसी की समय सीमा बढ़ा रहे हैं। हालांकि तालिबान का धमकी के बाद 31 अगस्त तक अमेरिकी सैनिक वापस बुला लिए गए।
अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद से तालिबान नेतृत्व दोहा में अपने राजनीतिक कार्यालय के माध्यम से कई देशों के साथ संपर्क स्थापित कर रहा है। बीते मंगलवार को तालिबानी नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्टेनकजई ने दोहा में ही भारत के राजदूत दीपक मित्तल से भारतीय दूतावास में मुलाकात की थी। यह 90 के दशक में तालिबान के गठन के बाद से भारत का पहला आधिकारिक संपर्क था।