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श्रीलंका में आपातकाल: राजपक्षे सरकार की चौतरफा नाराजगी, हो सकता है देश को गहरा नुकसान

Tue, 07 Sep 2021 05:02 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 07 Sep 2021 05:02 PM IST
सार

आपातकाल के एलान के पहले श्रीलंका में पाउडर दूध, रसोई गैस, केरोसीन आदि जैसी चीजों की भारी कमी हो गई थी। इन्हें खरीदने के लिए लोगों को लंबी कतारें लगानी पड़ रही थीँ। विरोधियों का कहना है कि इस अभाव के लिए खुद सरकार जिम्मेदार है, जिसने विदेशी मुद्रा बचाने के मकसद से पिछले साल मोटर वाहनों, कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामानों, कपड़ों, कॉस्मेटिक्स और मसालों का आयात रोक दिया था...

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President Gotabaya Rajapaksa government has faced fierce opposition from opposition parties after declared emergency in Sri Lanka
गोटाबाया राजपक्षे - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

श्रीलंका में पिछले हफ्ते आपातकाल की घोषणा के बाद से राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे सरकार को विपक्षी दलों, आयातकों, और व्यापारियों के तीखे विरोध का सामना करना पड़ रहा है। राष्ट्रपति राजपक्षे ने देश में बढ़ते आर्थिक संकट के कारण आपातकाल का एलान किया था। इससे सरकार को जरूरी चीजों के खुदरा मूल्य तय करने और व्यापारियों का भंडार जब्त करने का अधिकार मिल गया है। बताया जाता है कि देश में विदेशी मुद्रा के अभाव के कारण सरकार को आपातकाल लगाना पड़ा।

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अब आयातकों ने चेतावनी दी है कि लागू किए गए आपातकालीन नियमों के कारण देश में सप्लाई का संकट खड़ा हो सकता है। उधर विपक्षी दलों का कहना है कि इस कदम के जरिए सरकार ने देश में अपनी तानाशाही कायम करने की कोशिश की है। वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम की एक खबर के मुताबिक 30 अगस्त को आपातकाल की घोषणा के बाद से व्यापारियों और आयातकों ने व्यापार मंत्रालय के अधिकारियों के साथ कई बैठकें की हैं। बताया जाता है कि इस दौरान उन्होंने लागू किए गए आपातकालीन नियमों को वापस लेने की गुजारिश की।
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बताया जाता है कि जरूरी चीजों की सप्लाई के लिए एक सैनिक अधिकारी को आयुक्त बनाने के राष्ट्रपति के फैसले से विरोध भाव और फैला है। मेजर जनरल एमडीएसपी निवुनहेला को ये जिम्मेदारी दी गई है। सरकार ने चाल, चीनी और दूसरी उपभोक्ता सामग्रियों को आवश्यक वस्तु घोषित कर दिया है।
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इस कदम पर विरोध जताते हुए विपक्षी सांसद एरान विक्रमरत्ने ने निक्कई एशिया से कहा- ‘श्रीलंका ने आजादी के बाद पिछले 75 वर्षों में ऐसे हालात से निपटने के लिए जरूरी संस्थागत ढांचा खड़ा किया है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राष्ट्रपति ने इन संस्थाओं का पूरा उपयोग नहीं किया है और टास्क फोर्सों की नियुक्ति कर दी है। इनकी कमान ऐसे लोगों को दी गई है, जिन्हें ऐसे काम का कोई अनुभव नहीं है।’

श्रीलंका की मुख्य विपक्षी पार्टी समगई जन बालावेगया (एसजेबी) ने कहा है कि राष्ट्रपति ने नागरिकों के मूल अधिकारों में कटौती करने के दुर्भावनापूर्ण मकसद से आपातकाल की घोषणा की है। वे देश को तानाशाही की ओर ले जाना चाहते हैं। लेकिन राजपक्षे सरकार में व्यापार मंत्री बानदुला गुनावर्धेना ने कहा है कि देश में एक साजिश के तहत जरूरी चीजों के दाम बढ़ाए जा रहे थे। देश में इन चीजों का कृत्रिम अभाव पैदा किया गया। इसे देखते हुए आपातकाल लागू करने के अलावा कोई और चारा नहीं था।

पिछले हफ्ते अधिकारियों ने कई जगहों पर छापा मार कर 29 हजार टन चीनी जब्त की। इस बीच देश के एक प्रमुख आयातक ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर वेबसाइट निक्कई एशिया को बताया कि आपातकाल के तहत नियम बना दिया गया है कि आयातक एक सीमा से ज्यादा खाद्य पदार्थों की खरीदारी नहीं कर सकते हैं। आयातक ने कहा कि इसके गंभीर परिणाम होंगे। आयातकों के पास बड़े ऑर्डर हैं, जिनकी सप्लाई वे करना चाहते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में सरकार का दखल देना ठीक नहीं है।

आपातकाल के एलान के पहले श्रीलंका में पाउडर दूध, रसोई गैस, केरोसीन आदि जैसी चीजों की भारी कमी हो गई थी। इन्हें खरीदने के लिए लोगों को लंबी कतारें लगानी पड़ रही थीं। विरोधियों का कहना है कि इस अभाव के लिए खुद सरकार जिम्मेदार है, जिसने विदेशी मुद्रा बचाने के मकसद से पिछले साल मोटर वाहनों, कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामानों, कपड़ों, कॉस्मेटिक्स और मसालों का आयात रोक दिया था।

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