Power Crisis: ऊर्जा संकट से बदहाल होते जा रहे हैं धनी देशों के भी आम लोग, जानें पूरा मामला
जानकारों का कहना है कि बिजली बिल का यह संकट सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। बल्कि जापान जैसे विकसित देश से लेकर थाईलैंड, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे विकासशील देशों में यही हाल देखने को मिल रहा है।
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ऊर्जा की महंगाई के कारण अमेरिका में तकरीबन दो करोड़ परिवार समय पर अपने बिजली का बिल नहीं चुका पा रहे हैं। अमेरिका नेशनल एनर्जी एसिस्टैंस डायरेक्टर्स एसोसिएशन (नियेडा) के मुताबिक इस मामले में इतना गंभीर संकट इसके पहले कभी नहीं देखा गया था। प्राकृतिक गैस की बढ़ रही कीमतों के कारण देश में बिजली की कीमत भी असामान्य रूप से बढ़ी है।
अमेरिकी वेबसाइट ब्लूमबर्ग पर छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी परिवारों पर 16 बिलियन डॉलर का बिजली बिल बकाया हो गया है। कोरोना महामारी के पहले की तुलना में ये रकम दो गुना है। नियेडा के कार्यकारी निदेशक मार्क वोल्फ ने ब्लूमबर्ग से कहा- ‘बिजली की कीमत लोगों की बजट क्षमता से बाहर चली गई है। सबसे गरीब परिवार बिजली बिल को चुका पाने की स्थिति में नहीं हैं।’
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक बिजली जैसी सुविधाओं के बिल समय पर ना चुकाए गए, तो उसका बिजली कंपनियों की वित्तीय सेहत और पूरी अर्थव्यवस्था पर बहुत खराब असर होगा। बिजली कंपनियों की स्थिति बिगड़ने का असर उन लोगों पर भी पड़ेगा, जो समय पर बिल चुका रहे हैँ। उधर जो लोग बिल नहीं चुका पा रहे हैं, वे कर्ज के जाल में फंस सकते हैं।
वैसे जानकारों का कहना है कि बिजली बिल का यह संकट सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। बल्कि जापान जैसे विकसित देश से लेकर थाईलैंड, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे विकासशील देशों में यही हाल देखने को मिल रहा है। उन देशों के लोगों को तो लंबे समय तक लोडशेडिंग का भी सामना करना पड़ रहा है। दरअसल, यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर जो सख्त प्रतिबंध लगाए, उसकी वजह से सारी दुनिया को ऊर्जा संकट की मार झेलनी पड़ रही है।
यूरोप में हाल यह है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस हफ्ते कह दिया कि अब धन-धान्य का दौर गुजर गया है, इसलिए लोगों को दिक्कतें झेलनी पड़ रही हैं। अपने मंत्रियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि फ्रांस के सामने सर्दियों में बहुत कठिन चुनौती पेश आने वाली है। उन्होंने कहा- जलवायु परिवर्तन और यूक्रेन युद्ध के कारण हम अस्थिरता के एक नए युग में प्रवेश कर गए हैं।
ब्रिटिश अखबार द गार्जियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस हफ्ते इस खबर से फ्रांस में गहरी नाराजगी फैली है कि फ्रांस की बड़ी कंपनियों ने 2022 की दूसरी तिमाही में 44 बिलियन यूरो के लाभांश का भुगतान किया। पर्यवेक्षकों के मुताबिक लोगों की परेशानी के बीच कंपनियों के बढ़ते मुनाफे और कंपनी शेयरधारकों के लिए बढ़ रहे लाभांश के कारण मैक्रों सरकार की भी कड़ी आलोचना हो रही है। इसीलिए मंत्रिमंडल की बैठक में दिया गया उनका भाषण भी विवादों से घिर गया।
विपक्षी दलों और ट्रेड यूनियनों ने कहा है कि जिस समय कॉरपोरेट सेक्टर और धनी हो रहा है और आम लोग मुसीबत में हैं, तब मैक्रों आम लोगों से ही और कुर्बानी मांग रहे हैँ। मजदूर यूनियन सीजीटी के महासचिव फिलिप मार्तिनेज ने कहा- मैक्रों जिस धन-धान्य की बात कह रहे हैं, वह फ्रांस के ज्यादातर लोगों को कभी नसीब नहीं हुआ है।