{"_id":"5e239a498ebc3e4ad9296c11","slug":"positive-attitude-show-off-may-be-wrong-with-colleagues-on-workplace-says-in-research","type":"story","status":"publish","title_hn":"ऑफिस में सहकर्मियों के साथ पॉजिटिव एटीट्यूड का दिखावा पड़ सकता है भारी","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
ऑफिस में सहकर्मियों के साथ पॉजिटिव एटीट्यूड का दिखावा पड़ सकता है भारी
Sun, 19 Jan 2020 05:22 AM IST
आसिम खान
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
Published by: आसिम खान
Updated Sun, 19 Jan 2020 05:22 AM IST
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
वर्कप्लेस पर अपने फायदे के लिए सहकर्मियों के साथ पॉजिटिव एटीट्यूड का दिखावा उल्टा पड़ सकता है। एक नए अध्ययन में बताया गया है कि इसकी बजाय महसूस किए गए भावनाओं को व्यक्त करना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है।
विज्ञापन
अलग-अलग क्षेत्र के कर्मचारियों का सर्वे
जर्नल ऑफ अप्लायड साइकोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन के दौरान शिक्षा. मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग और वित्तीय सेवा जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों का सर्वे किया गया। सर्वे में यह पता लगाने की कोशिश की गई कि कर्मचारी अपने भावनाओं को किस तरह व्यक्त करते हैं। इसमें भावनाओं को नियंत्रित करने के दो तरीकों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया- सरफेस एक्टिंग और डीप एक्टिंग।
विज्ञापन
अध्ययन की सह लेखिका और एलेर कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट की एलिसन गैब्रियल ने बताया कि सरफेस एक्टिंग में कर्मचारी अपने अंदर की भावनाएं नहीं बताते, जैसे कि कोई व्यक्ति अंदर से दुखी हो लेकिन सहकर्मियों के साथ खुश होने का नाटक कर रहा हो। डीप एक्टिंग में कर्मचारी अपनी आंतरिक भावनाओं को ही बदलने की कोशिश करते हैं।
विज्ञापन
अध्ययनकर्ताओं ने इसके जरिये यह जानने की कोशिश की कि कर्मचारी अपने सहकर्मियों के साथ बातचीत करते हुए भावनाओं को नियंत्रित रखने का प्रयास करते हैं या नहीं। उन्होंने यह भी पता लगाया कि जब वर्कप्लेस पर भावनाओं को नियंत्रण में रखने संबंधी नियम नहीं है फिर कर्मचारी ऐसा क्यों करते हैं और उन्हें इससे क्या फायदा मिलता है।
अधिकांश लोग करते हैं दिखावा
सर्वे के आधार पर कर्मचारियों को चार श्रेणियों में बांटा गया- नॉन एक्टर, लो एक्टर, डीप एक्टर और रेगुलेटर। नॉन एक्टर वो होते हैं जो विरले ही सरफेस या डीप एक्टिंग का सहारा लेते हैं। लो एक्टर में सरफेस और डीप एक्टिंग का स्तर थोड़ा ज्यादा होता है।
डीप एक्टर सरफेस एक्टिंग कम लेकिन डीप एक्टिंग सबसे ज्यादा करते हैं जबकि रेगुलेटर में डीप और सरफेस एक्टिंग का स्तर ज्यादा होता है। अध्ययन के मुताबिक ऑफिस में नॉन एक्टर की संख्या सबसे कम होती है। इससे स्पष्ट है कि वर्कप्लेस पर अधिकांश कर्मचारी भावनाओं का दिखावा करते हैं।
लंबे समय तक दिखावे से नुकसान
गैब्रियल और उनके सहयोगियों ने उन कारणों का भी पता लगाया जिसके चलते कर्मचारी अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं और इसे दो श्रेणियों में बांटा- सामाजिक और दिखावा। इसमें पहली श्रेणी में वो लोग शामिल होते हैं जो अच्छा सहकर्मी बनने के साथ दूसरे लोगों से अच्छे संबंध बनाने की इच्छा रखते हैं।
वहीं, दूसरी श्रेणी के कर्मचारी अपने बॉस और सहकर्मियों के बीच अच्छा बनने का दिखावा करते हैं। अध्ययन में बताया गया है कि रेगुलेटर आम तौर पर दिखावे के लिए जबकि डीप एक्टर सामाजिक कारणों से भावनाएं नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं। डीप एक्टर को इसके फायदे भी मिलते हैं। उन्हें काम में सहकर्मियों का साथ और सलाह मिलती है और कैरियर में आगे बढ़ना भी आसान होता है।
वहीं, रेगुलेटर भावनात्मक बोझ के साथ जीते हैं और अक्सर उनका काम भी संतोषप्रद नहीं होता। अध्ययन के मुताबिक पॉजिटिव एटीट्यूड का दिखावा तत्काल फायदेमंद भले हो, लेकिन यह कर्मचारी के स्वास्थ्य के साथ सहकर्मियों से अच्छे संबंध बनाने में भी बाधक बन सकता है।