उत्पादन में चीनी एकाधिकार को तोड़ने की दौड़ में ट्रंप से आगे निकले मोदी
- चीन के सप्लाई चेन पर कब्जे के खिलाफ वैश्विक लड़ाई के अगुआ बनकर उभरे हैं भारतीय पीएम
- ये वो भूमिका है, जो अब अधिकतर मौकों पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खाली छोड़ देते हैं
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के उत्पादन में एकाधिकार को तोड़ने की वैश्विक लड़ाई के नेता बनकर उभरे हैं। अमेरिकी मीडिया संस्थान ब्रेटबर्ट न्यूज ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि ये वो भूमिका है, जो अब अधिकतर मौकों पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खाली छोड़ देते हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि ट्रंप ने अपना पहला राष्ट्रपति चुनाव मुख्य तौर पर चीन के खिलाफ सख्ती दिखाने के वादे के चलते जीता था, लेकिन हालिया दिनों में यह नीति बदलती दिखाई दी है। इसके उलट चीन के साथ पिछले सप्ताह गलवां घाटी में हिंसक झड़प से पहले ही भारत ने उसकी उत्पादन शक्ति के कुछ हिस्से को कब्जाने की योजना पर काम चालू कर दिया था।
रिपोर्ट के मुताबिक, चीन को छोड़कर अपनी भरोसेमंद फैक्ट्रियां कहीं और ले जाने की सोच रही अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को प्रतिस्पर्द्धी सौदे की पेशकश करने के लिए भारत ने पर्याप्त जमीन चिह्नित करने की योजना बनाई थी।
इसके एक सप्ताह बाद ही एपल कंपनी ने अपने आईफोन के उत्पादन का अहम हिस्सा चीन से हटाकर भारत में स्थानांतरित करने की घोषणा कर दी। नतीजतन अंतरराष्ट्रीय न्यूज मीडिया के लिए अमूमन गुमनाम सा रहने वाला विषय भारत में चीन के साथ आर्थिक विभाजन का राष्ट्रीय अभियान बन गया।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि मोदी के ज्यादातर समर्थकों समेत भारतीय नागरिकों ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पुतले फूंकना शुरू कर दिए। साथ ही ऐसे ऑनलाइन चैलेंज भी चालू हो गए, जिनमें भाग लेने वाले को चीनी उत्पाद कूड़े में फेंकते हुए अपनी फिल्म बनाकर अपलोड करने के चैलेंज दिए जा रहे हैं।
बीजिंग को गलत साबित करने वाला पहला देश
रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन के सरकारी मीडिया ने घमंड के साथ अपने आर्थिक प्रभुत्व पर जोर देते हुए अपने देश के बहिष्कार को आत्मघाती अभियान बताया था, लेकिन भारत बीजिंग को गलत साबित करने वाला विश्व का पहला मुख्य देश बन रहा है।
रिपोर्ट में कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स की तरफ से देश के अमीर उद्योगपतियों से की गई चीनी उत्पादों के बहिष्कार की अपील का जिक्र किया गया है तो साथ ही भारत सरकार की तरफ से उत्पादों पर उसे बनाने वाले देश का नाम ‘मेड इन’ के तौर पर लिखने की अनिवार्यता के बारे में भी बताया गया है।
साथ ही उन रिपोर्ट का भी जिक्र किया गया है, जिनमें कहा गया था कि भारत न केवल चीनी उत्पादों को बल्कि एपल जैसी अमेरिकी कंपनियों की तरफ से चीन में बनवाकर लाए जा रहे उत्पादों को भी अपने बाजार में प्रवेश करने से रोक रहा है।
भारत कर सकता है तो अमेरिका क्यों नहीं?
ब्रेटबर्ट न्यूज ने अपनी रिपोर्ट में भारत का उदाहरण देते हुए कहा है कि नई दिल्ली की तरफ से चीन के बहिष्कार के लिए उठाए गए मजबूत कदम ने दिखाया है कि कम्युनिस्ट पार्टी को अपनी सप्लाई चेन से हटाना कोई फैंटेसी नहीं है।
रिपोर्ट में सवाल उठाते हुए कहा गया है कि जब भारत यह कर सकता है तो आधुनिक चीन का निर्माण करने वाली मुक्त व्यापार नीतियों से तबाह अमेरिकी भी जल्द ही महसूस कर सकते हैं कि अमेरिका भी ऐसा कर सकता है।
सप्लाई चेन पर ऐसा है अभी चीनी प्रभुत्व
चीन फिलहाल विश्व के किसी अन्य हिस्से से ज्यादा माल का उत्पादन करता है और केवल पूर्ण उत्पाद बल्कि दुनिया की सप्लाई चेन के सबसे जटिल उत्पादों के आवश्यक हिस्सों के निर्माण में एकाधिकार के जरिये स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को परास्त कर देता है। एंटीबायोटिक से लेकर कंप्यूटर तक, कोई भी, दुनिया में कहीं पर भी कुछ भी निर्मित करता है तो यह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को समृद्ध बनाता है।