उत्तर अफ्रीकी देश लीबिया में शांति संकल्प, संकट फिर भी बरकरार

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Updated Tue, 21 Jan 2020 01:23 AM IST
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उत्तर अफ्रीकी देश लीबिया के युद्ध में शामिल पक्षों ने बर्लिन में हुई वार्ता के दौरान संघर्ष विराम का फैसला किया है। रूस, तुर्की, मिस्र और यूएई ने भविष्य में गृह युद्ध में शामिल गुटों को हथियार व सैनिकों से मदद न करने का संकल्प लिया और हस्ताक्षर किए हैं। जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने कहा है कि युद्धविराम पर फौरन अमल की गारंटी आसान नहीं है। इसलिए स्थायी युद्धविराम पर दस्तखत नहीं हुए।
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हालांकि इस फैसले का विश्व बिरादरी ने स्वागत किया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने सम्मेलन के बाद कहा कि अब लीबिया से शुरू होने वाले क्षेत्रीय युद्ध का खतरा फिलहाल टल गया है। सम्मेलन के दौरान लीबिया में सरकारी टुकड़ियों से लड़ रहे खलीफा हफ्तार और संयुक्त राष्ट्र से मान्यता प्राप्त फयाज अल सराज की सरकार के बीच कोई गंभीर संवाद की शुरुआत में अभी सफलता नहीं मिली है। 
इसीलिए जर्मनी की चांसलर संघर्ष विराम को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। हालांकि उन्होंने युद्धविराम की निगरानी करने की जिम्मेदारी ली है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने माना कि अभी सवाल बाकी हैं लेकिन उम्मीद है कि लीबिया में हिंसा कम होगी और वहां लड़ रहे गुटों के बीच बातचीत शुरू करने का मौका होगा।
इसलिए बरकरार है संकट
हाल के महीनों में संयुक्त राष्ट्र समर्थित सराज के सैनिकों पर हफ्तार के सैनिकों के हमलों में तेजी आई है। लड़ाई में करीब 280 असैनिक नागरिक और 2000 सैनिक मारे गए हैं और हजारों लोग बेघर हो गए हैं। यहां रूस हफ्तार के समर्थन में है तो तुर्की सराज नेतृत्व वाली सरकार के साथ है। उसने सराज के समर्थन में सेना भेजी है। हफ्तार को अब भी ताकतवर गुटों का समर्थन है। इस कारण यहां संकट बरकरार है।

तेल की चिंता
विश्व समुदाय की चिंता की एक वजह लीबिया का तेल भंडार भी है। वहां शांति प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा तेल भंडारों की सुरक्षा और उसका नियंत्रण भी हो सकता है। यूएन महासचिव गुटेरस ने भी चिंता जताई है कि हफ्तार की टुकड़ियों ने न सिर्फ तेल की ढुलाई करने वाले पोर्टों की नाकेबंदी की है बल्कि एक तेल भंडार में तेल निकासी का काम भी रुकवा दिया है।
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