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वुसत का ब्लॉगः 25 साल के मंजूर पश्तीन से क्यों डर रही पाक सरकार

Tue, 24 Apr 2018 01:29 PM IST
बीबीसी, हिंदी
बीबीसी, हिंदी Updated Tue, 24 Apr 2018 01:29 PM IST
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why pakistan Government is fearing from Manzoor Pashteen
पश्तून आंदोलन

इन दिनों पाकिस्तान में जिस पार्टी की सबसे ज्यादा चर्चा है वो है पश्तून ताहफुज मूवमेंट यानी पश्तून रक्षा आंदोलन। इसका जन्म कराची में एक कबायली युवा नकीबुल्लाह महसूद के पुलिस एनकाउंटर के बाद शुरू होने वाले आंदोलन से हुआ। शुरू में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट एसएसपी राव अनवार की गिरफ्तारी के लिए कबायली लोगों ने इस्लामाबाद में धरना दिया और फिर इस धरने से एक 25 वर्ष का लड़का निकला मंजूर पश्तीन। उसके साथ हो लिए सैकड़ों पश्तून औरतें और मर्द और फिर ये तादाद पहुंच गई हजारों में और फिर खैबर पख्तूनख्वां और वजीरिस्तान में जगह-जगह मंजूर पश्तीन को सुनने के लिए भीड़ इकट्ठा होनी शुरू हो गई।

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पश्तूनों की मांगें क्या

मांगें बहुत ही सीधी हैं। यानी पिछले 10 वर्ष में चरमपंथ के खिलाफ जंग के दौरान जो सैकड़ों पाकिस्तानी शहरी गायब हुए हैं उन्हें जाहिर करके अदालत में पेश किया जाए। अफगान सीमा से लगे कबायली इलाकों में अंग्रेजों के दौर का काला कानून एफसीआर खत्म कर वहां भी पाकिस्तानी संविधान लागू कर वजीरिस्तान और दूसरे कबायली इलाकों को वही बुनियादी हक दिए जाएं जो लाहौर, कराची और इस्लामाबाद के नागरिकों को हासिल हैं।
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तालिबान के खिलाफ फौजी ऑपरेशन में आम लोगों के जो घर और कारोबार तबाह हुए उनका मुआवजा दिया जाए और इन इलाकों में चेक पोस्टों पर वहां के लोगों से अच्छा सलूक किया जाए। लेकिन राष्ट्रीय संस्थाओं को शक है मंजूर पश्तीन इतना सीधा नहीं हैं और उनकी डोरें कहीं और से हिल रही हैं। इसलिए मीडिया को हिदायत दी गई है कि वो मंजूर पश्तीन के जलसों की रिपोर्टिंग न करे। जहां-जहां पश्तून ताहफुज मूवमेंट के जलसे होते हैं वहां पहले रुकावटें खड़ी की जाती हैं, फिर हटा ली जाती हैं। कल पश्तून ताहफुज मूवमेंट ने लाहौर में जलसा किया, पहले इजाजत दी गई, फिर इजाजत वापस ले ली गई।
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क्या है आंदोलन की ताकत

फिर आंदोलन के कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया फिर छोड़ दिया गया। साथ ही साथ जहां जलसा होना था, वहां पानी छोड़ दिया गया। लेकिन लोग फिर भी आए, सिर्फ पश्तून ही नहीं, पंजाब की सिविल सोसाइटी भी मंजूर पश्तीन को सुनने आई। मीडिया कवरेज न होने के बावजूद इस आंदोलन को सोशल मीडिया की ताकत और लाइव स्ट्रीम जिंदा रखे हुए है। ताकत के बल पर निपटना इसलिए मुश्किल हो रहा है क्योंकि एक तो ये आंदोलन अब तक शांतिपूर्ण है, दूसरा उनकी मांगें जिनमें से कोई भी संविधान या राष्ट्र के कानून से बाहर नहीं हैं।


लोग-बाग पहले की तरह आंखें बंद कर देशद्रोह और गद्दारी के आरोप हजम करने को तैयार नहीं हैं, वो अब सवाल करते हैं और सबूत मांगते हैं। धीरे-धीरे राजनीतिक गुट भी कहने लगे हैं कि इन नौजवानों को बात करने दी जाए और इनकी बात सुनी जाए, इससे पहले कि अरब स्प्रिंग की तरह ये आंदोलन पाकिस्तानी स्प्रिंग में तब्दील न हो जाए। लेकिन दुनिया का हर देश चलाने वालों की विडंबना ये है कि जो बात आम लोगों को सबसे पहले समझ में आती है, राष्ट्रीय इस्टैब्लिशमेंट को सबसे आखिर में समझ में आती है और जब तक समझ में आती है, तब तक वक्त आगे बढ़ चुका होता है।

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