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अंतरिक्ष में भारत से पहले रॉकेट छोड़ा पर भी क्यों है पाकिस्तान का स्पेस प्रोग्राम फ्लॉप?
amarujala.com- Submitted by: आनंद
Updated Wed, 10 May 2017 12:47 PM IST
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क्या आप जानते हैं कि भारतीय स्पेस प्रोग्राम से कई वर्ष पहले शुरू हुआ था पाकिस्तानी स्पेस प्रोग्राम? क्या आप जानते हैं कि पूरे एशिया महाद्वीप में पाकिस्तान ऐसा तीसरा देश और दुनिया का 10वां देश था जिसने अंतरिक्ष में सफलता पूर्वक रॉकेट छोड़ा था? क्या आप जानते हैं कि पाकिस्तान ने अंतरिक्ष में अपना पहला रॉकेट, भारत के पहला रॉकेट छोड़ने से पूरे एक साल पूर्व भेज दिया था?
आखिर क्या वजह है कि मौजूदा दौर में दुनिया भर के टॉप स्पेस कार्यक्रमों में भारत का 'इसरो' शामिल है जबकि पाकिस्तान के 'सुपारको' का जिक्र मुश्किल से ही मिलता है। बात 1960 की है। कराची में पाकिस्तान-अमेरिकी काउंसिल का लेक्चर चल रहा था और स्पीकर ने अपने एक बयान से सबको चौंका दिया।
"पाकिस्तान अब स्पेस एज में दाखिल होने वाला है और बहुत जल्द हम अंतरिक्ष में एक रॉकेट भेजने वाले हैं।" प्रोफेसर अब्दुस सलाम के भाषण का हिस्सा अगले दिन दुनिया के तमाम जाने-माने अखबारों के पहले पन्नों पर छपा।
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आखिर क्या वजह है कि मौजूदा दौर में दुनिया भर के टॉप स्पेस कार्यक्रमों में भारत का 'इसरो' शामिल है जबकि पाकिस्तान के 'सुपारको' का जिक्र मुश्किल से ही मिलता है। बात 1960 की है। कराची में पाकिस्तान-अमेरिकी काउंसिल का लेक्चर चल रहा था और स्पीकर ने अपने एक बयान से सबको चौंका दिया।
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"पाकिस्तान अब स्पेस एज में दाखिल होने वाला है और बहुत जल्द हम अंतरिक्ष में एक रॉकेट भेजने वाले हैं।" प्रोफेसर अब्दुस सलाम के भाषण का हिस्सा अगले दिन दुनिया के तमाम जाने-माने अखबारों के पहले पन्नों पर छपा।
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अमेरिका ने की मदद
ये वही अब्दुस सलाम थे जो आगे चल कर विज्ञान के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार जीतने वाले पहले मुसलमान और पाकिस्तानी थे। पाकिस्तान में जानकार बताते हैं कि अब्दुस सलाम ने 1958-59 के दौरान पाकिस्तान के शासक जनरल अयूब खान से मुलाकातें बढ़ा दी थीं। अयूब खान से अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू करवाने के पीछे अब्दुस सलाम का बड़ा किरदार था। जाने-माने न्यूक्लियर साइंटिस्ट परवेज हुदभाई इन दिनों इस्लामाबाद की कायदे-ए-आजम यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं।
उन्होंने बताया, "1960-61 में पाकिस्तान ने अमेरिका की मदद से अपने स्पेस प्रोग्राम को शुरू किया। उस समय इसका प्रमुख मकसद मौसम विज्ञान सम्बंधी जानकारी जुटाना था।'' उन्होंने कहा, ''जो रॉकेट थे वो अमेरिका से मिले थे और उनको पकिस्तान में मॉडिफाई किया गया था। इसी को पाकिस्तान के पहले रॉकेट रहबर-1 के नाम से जाना गया जिसे कराची स्थित सुपारको यानी पाकिस्तान स्पेस एंड अपर एटमॉस्फियर रिसर्च कमिशन ने अंतरिक्ष से छोड़ा गया"।
इसके पहले जनरल अयूब खान पांच अहम लोगों को रॉकेट लॉन्च करने की ट्रेनिंग लेने अमेरिका (नासा) भेज चुके थे। इनके नाम थे तारिक मुस्तफा (पाकिस्तान एटॉमिक एनर्जी कमिशन- पीएईसी- के प्रमुख इंजीनियर), सलीम महमूद (पीएईसी के साइंस अफसर), सिकंदर जमान (पीएईसी के इंजिनियर), एम रहमतुल्लाह (पाकिस्तान मौसम विभाग के निदेशक) और ए जेड फारूकी (पीएईसी)।
उन्होंने बताया, "1960-61 में पाकिस्तान ने अमेरिका की मदद से अपने स्पेस प्रोग्राम को शुरू किया। उस समय इसका प्रमुख मकसद मौसम विज्ञान सम्बंधी जानकारी जुटाना था।'' उन्होंने कहा, ''जो रॉकेट थे वो अमेरिका से मिले थे और उनको पकिस्तान में मॉडिफाई किया गया था। इसी को पाकिस्तान के पहले रॉकेट रहबर-1 के नाम से जाना गया जिसे कराची स्थित सुपारको यानी पाकिस्तान स्पेस एंड अपर एटमॉस्फियर रिसर्च कमिशन ने अंतरिक्ष से छोड़ा गया"।
इसके पहले जनरल अयूब खान पांच अहम लोगों को रॉकेट लॉन्च करने की ट्रेनिंग लेने अमेरिका (नासा) भेज चुके थे। इनके नाम थे तारिक मुस्तफा (पाकिस्तान एटॉमिक एनर्जी कमिशन- पीएईसी- के प्रमुख इंजीनियर), सलीम महमूद (पीएईसी के साइंस अफसर), सिकंदर जमान (पीएईसी के इंजिनियर), एम रहमतुल्लाह (पाकिस्तान मौसम विभाग के निदेशक) और ए जेड फारूकी (पीएईसी)।
सुपरको के शुरुआती दिन
सुपरको के शुरुआती दिन बेहतरीन बताए जाते हैं और इंग्लैंड और अमेरिका में रिसर्च करने वाले कई पाकिस्तानी वैज्ञानिक कराची आकर इससे जुड़ गए थे। ये वो दौर था जब विज्ञान जगत में अब्दुस सलाम की तूती बोलती थी और उन्हें कुछ लोग 'पाकिस्तान का होमी भाभा' भी कहते थे। जानकार बताते है कि जनरल अयूब खान के दौर में पाकिस्तानी स्पेस कार्यक्रम काफी 'फला-फूला' और अमेरिका तक ने यहाँ होने वाले काम को 'सराहा'।
लेकिन ये दौर सिर्फ दस साल तक रहा और जनरल याह्या खान और प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के दौर में प्राथमिकताएं तेजी से बदलीं। परवेज हुदभाई ने बताया, "कुछ हद तक ये बात सही है कि स्पेस प्रोग्राम की फंडिंग में कटौती होती रही जो जनरल जिया-उल-हक के जमाने में और तेज हो गई। मंजर कुछ ऐसा था कि पाकिस्तान को सुरक्षा की चिंता ज्यादा सता रही थी और कुछ जंगे भी हो चुकी थीं। बस यहीं से पाकिस्तान का फोकस एटम बम और मिसाइल तकनीक पर जम गया।
जो बेहतरीन वैज्ञानिक थे वे एटोमिक परीक्षण के काम में लग गए और दूसरे मिसाइल बनाने में। इस सब में स्पेस कार्यक्रम पीछे छूटता गया"। कुछ लोगों की राय ये भी है कि 1970 के दशक के बाद से पाकिस्तान की नजदीकियां चीन से भी खासी बढ़ चुकीं थीं और तकनीकी मदद का आदान प्रदान भी। इसी सिलसिले के साथ सुपारको के प्रमुख भी वरिष्ठ फौजी अफसर होने लगे और रिसर्च का काम धीमा होता गया। मिसाल के तौर पर साल 2001 के बाद से सुपारको के चीफ पाकिस्तान फौज के मेजर जनरल रैंक के अफसर होते रहे हैं।
लेकिन ये दौर सिर्फ दस साल तक रहा और जनरल याह्या खान और प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के दौर में प्राथमिकताएं तेजी से बदलीं। परवेज हुदभाई ने बताया, "कुछ हद तक ये बात सही है कि स्पेस प्रोग्राम की फंडिंग में कटौती होती रही जो जनरल जिया-उल-हक के जमाने में और तेज हो गई। मंजर कुछ ऐसा था कि पाकिस्तान को सुरक्षा की चिंता ज्यादा सता रही थी और कुछ जंगे भी हो चुकी थीं। बस यहीं से पाकिस्तान का फोकस एटम बम और मिसाइल तकनीक पर जम गया।
जो बेहतरीन वैज्ञानिक थे वे एटोमिक परीक्षण के काम में लग गए और दूसरे मिसाइल बनाने में। इस सब में स्पेस कार्यक्रम पीछे छूटता गया"। कुछ लोगों की राय ये भी है कि 1970 के दशक के बाद से पाकिस्तान की नजदीकियां चीन से भी खासी बढ़ चुकीं थीं और तकनीकी मदद का आदान प्रदान भी। इसी सिलसिले के साथ सुपारको के प्रमुख भी वरिष्ठ फौजी अफसर होने लगे और रिसर्च का काम धीमा होता गया। मिसाल के तौर पर साल 2001 के बाद से सुपारको के चीफ पाकिस्तान फौज के मेजर जनरल रैंक के अफसर होते रहे हैं।
मिसाइल बनाने पर है ध्यान
Pakistan Space Program
भारत में विज्ञान मामलों के जानकार पल्लव बागला मानते हैं कि पाकिस्तानी स्पेस कार्यक्रम 'फ्लॉप' होता गया और उम्मीद से बहुत पहले ही 'उसका फोकस डगमगा गया'। उनके मुताबिक, "भारत और पाकिस्तान दोनों ने अमेरिका से स्पेस प्रोग्राम में मदद ली। फर्क यही रहा कि पाकिस्तान में आगे चलकर इसे सरकारी समर्थन मिलना कम होता गया और भारत में इसके विपरीत समर्थन बढ़ता गया।'' उन्होंने, ''आज भी भारत का स्पेस कार्यक्रम बजट करीब सवा अरब डॉलर है जो अमेरिका या चीन की तुलना में कहीं कम है। लेकिन पाकिस्तान में यही बजट भारत से कोई 50-60% कम है"।
हालांकि 1980 के दशक में पाकिस्तान के मशहूर वैज्ञानिक मुनीर अहमद खान ने जिया-उल-हक के साथ मिलकर सुपारको में नई जान फूंकने की कोशिश थी। कई नए मिशन लॉन्च हुए रिसर्च के लिए पैसे दिए गए। लेकिन ज्यादातर फोकस अब रक्षा क्षेत्र की तरफ जा चुका था और जो कुछ लांच भी हो रहे थे वे चीन से ही हो रहे थे। मिसाल के तौर पर पकिस्तान के पहले सैटलाइट बद्र-1 को 1990 में चीन से अंतरिक्ष में छोड़ा गया।
पल्लव बागला का ये भी मानना है कि पाकिस्तान को ये एहसास बहुत पहले ही हो चुका था कि उनकी प्राथमिकता दूरसंचार क्षेत्र में स्पेस रिसर्च करना नहीं शायद कुछ और थी। उन्होंने कहा, "दूरसंचार क्षेत्र में आप अपने काम दूसरे देशों के सैटलाइटों से करार कर के भी कर सकते हैं और जाहिर है पाकिस्तन ने भी कानूनी तरीके से इसे किया होगा। जाहिर है कि पाकिस्तान को अपनी बड़ी फौज के लिए भी बड़े बजट की जरुरत बनी रही है"।
पाकिस्तान के नामचीन न्यूक्लियर साइंटिस्ट परवेज हुदभाई भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं। उन्होंने कहा, "फिलहाल पाकिस्तान का पूरा ध्यान मिसाइलें बनाने पर है और स्पेस प्रोग्राम का हाल ये है कि न तो नए सैटलाइट लांच हो रहे हैं और जो हो भी रहे हैं वे नाकाम हो रहे हैं। दरअसल पाकिस्तान में एक बड़ा मसला ये भी है कि पढाई के स्तर, उच्च विज्ञान पर तवज्जो कम होता जा रहा है "।
हालांकि 1980 के दशक में पाकिस्तान के मशहूर वैज्ञानिक मुनीर अहमद खान ने जिया-उल-हक के साथ मिलकर सुपारको में नई जान फूंकने की कोशिश थी। कई नए मिशन लॉन्च हुए रिसर्च के लिए पैसे दिए गए। लेकिन ज्यादातर फोकस अब रक्षा क्षेत्र की तरफ जा चुका था और जो कुछ लांच भी हो रहे थे वे चीन से ही हो रहे थे। मिसाल के तौर पर पकिस्तान के पहले सैटलाइट बद्र-1 को 1990 में चीन से अंतरिक्ष में छोड़ा गया।
पल्लव बागला का ये भी मानना है कि पाकिस्तान को ये एहसास बहुत पहले ही हो चुका था कि उनकी प्राथमिकता दूरसंचार क्षेत्र में स्पेस रिसर्च करना नहीं शायद कुछ और थी। उन्होंने कहा, "दूरसंचार क्षेत्र में आप अपने काम दूसरे देशों के सैटलाइटों से करार कर के भी कर सकते हैं और जाहिर है पाकिस्तन ने भी कानूनी तरीके से इसे किया होगा। जाहिर है कि पाकिस्तान को अपनी बड़ी फौज के लिए भी बड़े बजट की जरुरत बनी रही है"।
पाकिस्तान के नामचीन न्यूक्लियर साइंटिस्ट परवेज हुदभाई भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं। उन्होंने कहा, "फिलहाल पाकिस्तान का पूरा ध्यान मिसाइलें बनाने पर है और स्पेस प्रोग्राम का हाल ये है कि न तो नए सैटलाइट लांच हो रहे हैं और जो हो भी रहे हैं वे नाकाम हो रहे हैं। दरअसल पाकिस्तान में एक बड़ा मसला ये भी है कि पढाई के स्तर, उच्च विज्ञान पर तवज्जो कम होता जा रहा है "।