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उर्दू लिखाड़ियों से सफाई मांगने में गलत क्या है?

Tue, 05 Apr 2016 03:12 PM IST
वुसअतुल्लाह ख़ान/ इस्लामाबाद से, बीबीसी
वुसअतुल्लाह ख़ान/ इस्लामाबाद से, बीबीसी Updated Tue, 05 Apr 2016 03:12 PM IST
सार

  • 'अल्लाह मेरा हामी हो, नासिर हो'
  • आखिर इसमें कौन सी आपत्ति है, अगर नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज ने माली सहायता उपलब्ध करने वाले तमाम उर्दू लिखाड़ियों और मैगजीन एडिटर्स को दो गवाहों की मौजूदगी में यह शपथ पत्र भरने को कहा है

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What is wrong in asking explanation from Urdu writers?
अखबार की दुकान - फोटो : बीबीसी

विस्तार

आखिर इसमें कौन सी आपत्ति है, अगर नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज ने माली सहायता उपलब्ध करने वाले तमाम उर्दू लिखाड़ियों और मैगजीन एडिटर्स को दो गवाहों की मौजूदगी में यह शपथ पत्र भरने को कहा है कि मेरी पुस्तक या मैगजीन में ऐसा कुछ नहीं जो भारत सरकार की नीतियों या राष्ट्रीय हित के खिलाफ हो या जिससे समाज के अन्य वर्गों में नफरत फैलती हो।

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मुझे वाकई में समझ में नहीं आ रहा है कि उर्दू वाले और उनके हिमायती दूसरी भाषाओं के लिखाड़ी इतनी जरा सी बात पर क्यों शोर मचा रहे हैं? ये काम तो स्मृति ईरानी के मंत्रालय ने राष्ट्रीय विचारधारा की एकता के लिए किया है। 
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वैसे भी अगर आप किसी से पैसे ले रहे हैं या अपनी पुस्तकें उसे बेच रहे हैं तो फिर आप उसके आदेश का पालन क्यों नहीं करेंगे? ये कोई आपके पैसे तो नहीं हैं। सरकार अपनी जेब से दे रही है ना।

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'अल्लाह मेरा हामी हो, नासिर हो'

What is wrong in asking explanation from Urdu writers?
स्मृति - फोटो : बीबीसी

हमारे पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक पार्लियामेंट के हर सदस्य को भले वो मुसलमान हो या ना हो, ये शपथ लेनी पड़ती है कि मैं कुरान, भगवत गीता या बाइबिल या ग्रंथ साहिब पर हाथ रखकर कसम उठाता हूं कि इस्लामिक विचारधारा की बुनियाद पर बनाए गए देश के संविधान का पालन और इसकी रक्षा करूंगा, अल्लाह मेरा हामी हो, नासिर हो।

मैंने तो आजतक किसी पाकिस्तानी मेंबर ऑफ पार्लियामेंट को इसपर नाक भौं चढ़ाते नहीं देखा। मगर शपथ ग्रहण करने का फॉर्म सिर्फ उर्दू लिखाड़ियों और एडिटरों के लिए है या हर भारतीय भाषा के विकास के लिए स्थापित हर उस सरकारी संस्था के लिए है जो लिखाड़ियों की मदद करती है।

हो सकता है कि किसी सरकारी जांच कमिशन ने खोज कर ली हो कि सरकार की आलोचना और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बातें सिर्फ उर्दू की किताबों और पत्रिकाओं में ही होती है।

'सिर्फ उर्दू में ही होती है तो वेरी बैड'

What is wrong in asking explanation from Urdu writers?
लव ज‌िहाद - फोटो : बीबीसी

अगर सिर्फ उर्दू में ही होती है तो वेरी बैड। हो सकता है कि भारतीय भाषाओं और बोलियों के विकास के लिए ये कोई नया सरकारी पायलट प्रोजेक्ट हो जो अगर उर्दू लिखाड़ियों को नकेल डालने में सफल हो गया तो फिर हिंदी, कन्नड़, मैथिली और बांग्ला समेत हर भाषा के लिखाड़ी से कहा जा सकेगा कि आप भी उर्दू लिखाड़ियों की तरह आराम से अच्छे बच्चों की तरह गला घुटवा लें।

मतलब ये कि रौनक मेला लगा रहना चाहिए भले वो लव जिहाद की शक्ल में हो, कि गौ हत्या रोकने की योजना हो, कि जेएनयू के 'देशद्रोहियों' को मजा चखाने के रूप में, कि उर्दू लिखाड़ियों को सरकार विरोधी लेख ना छपवाने की सूरत में। यूं भी दुनिया भर में सरकारें ऐसे छुटपुट मामलें तभी सुलटाती हैं जब बड़े-बड़े मामलें सुलझाए जा चुके हों।

अब क्या बाकी चार साल हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहें। परेशान ना हों सीमा पार नवाज शरीफ सरकार भी ऐसे ही मसले आजकल हल करने में जुटी पड़ी है, क्योंकि कोई बड़ा मसला उसकी पकड़ में आ नहीं
रहा।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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