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1971 युद्ध: आंसू, चुटकुले और सरेंडर लंच
रेहान फजल
Updated Sat, 16 Dec 2017 07:14 PM IST
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बांग्लादेश युद्ध
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सात मार्च 1971 को जब बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर्रहमान ढाका के मैदान में पाकिस्तानी शासन को ललकार रहे थे, तो उन्होंने क्या किसी ने भी यह कल्पना नहीं की थी कि ठीक नौ महीने और नौ दिन बाद बांग्लादेश एक वास्तविकता होगा।
पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह याह्या खां ने जब 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान की जन भावनाओं को सैनिक ताकत से कुचलने का आदेश दे दिया और शेख मुजीब गिरफ्तार कर लिए गए, वहाँ से शरणार्थियों के भारत आने का सिलसिला शुरू हो गया।
जैसे-जैसे पाकिस्तानी सेना के दुर्व्यवहार की खबरें फैलने लगीं, भारत पर दबाव पड़ने लगा कि वह वहाँ पर सैनिक हस्तक्षेप करे। इंदिरा चाहती थीं कि अप्रैल में हमला हो, इंदिरा गांधी ने इस बारे में थलसेनाअध्यक्ष जनरल मानेकशॉ की राय मांगी। इंदिरा चाहती थीं कि अप्रैल में हमला हो, उस समय पूर्वी कमान के स्टाफ ऑफिसर लेफ्टिनेंट जनरल जेएफ आर जैकब याद करते हैं, "जनरल मानेकशॉ ने एक अप्रैल को मुझे फोन कर कहा कि पूर्वी कमान को बांग्लादेश की आजादी के लिए तुरंत कार्रवाई करनी है। मैंने उनसे कहा कि ऐसा तुरंत संभव नहीं है क्योंकि हमारे पास सिर्फ एक पर्वतीय डिवीजन है जिसके पास पुल बनाने की क्षमता नहीं है।
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पढ़ें: विजय दिवस: सेना प्रमुख के साथ अमर जवान ज्योति पहुंचीं रक्षा मंत्री, दी शहीदों को श्रद्धांजलि
कुछ नदियाँ पाँच पाँच मील चौड़ी हैं। हमारे पास युद्ध के लिए साजो-सामान भी नहीं है और तुर्रा यह कि मॉनसून शुरू होने वाला है। अगर हम इस समय पूर्वी पाकिस्तान में घुसते हैं तो वहीं फँस कर रह जाएंगे।" मानेकशॉ राजनीतिक दबाव में नहीं झुके और उन्होंने इंदिरा गांधी से साफ कहा कि वह पूरी तैयारी के साथ ही लड़ाई में उतरना चाहेंगे।
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पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह याह्या खां ने जब 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान की जन भावनाओं को सैनिक ताकत से कुचलने का आदेश दे दिया और शेख मुजीब गिरफ्तार कर लिए गए, वहाँ से शरणार्थियों के भारत आने का सिलसिला शुरू हो गया।
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जैसे-जैसे पाकिस्तानी सेना के दुर्व्यवहार की खबरें फैलने लगीं, भारत पर दबाव पड़ने लगा कि वह वहाँ पर सैनिक हस्तक्षेप करे। इंदिरा चाहती थीं कि अप्रैल में हमला हो, इंदिरा गांधी ने इस बारे में थलसेनाअध्यक्ष जनरल मानेकशॉ की राय मांगी। इंदिरा चाहती थीं कि अप्रैल में हमला हो, उस समय पूर्वी कमान के स्टाफ ऑफिसर लेफ्टिनेंट जनरल जेएफ आर जैकब याद करते हैं, "जनरल मानेकशॉ ने एक अप्रैल को मुझे फोन कर कहा कि पूर्वी कमान को बांग्लादेश की आजादी के लिए तुरंत कार्रवाई करनी है। मैंने उनसे कहा कि ऐसा तुरंत संभव नहीं है क्योंकि हमारे पास सिर्फ एक पर्वतीय डिवीजन है जिसके पास पुल बनाने की क्षमता नहीं है।
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कुछ नदियाँ पाँच पाँच मील चौड़ी हैं। हमारे पास युद्ध के लिए साजो-सामान भी नहीं है और तुर्रा यह कि मॉनसून शुरू होने वाला है। अगर हम इस समय पूर्वी पाकिस्तान में घुसते हैं तो वहीं फँस कर रह जाएंगे।" मानेकशॉ राजनीतिक दबाव में नहीं झुके और उन्होंने इंदिरा गांधी से साफ कहा कि वह पूरी तैयारी के साथ ही लड़ाई में उतरना चाहेंगे।
पूरे युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी को कभी विचलित नहीं देखा गया
तीन दिसंबर 1971...इंदिरा गांधी कलकत्ता में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं। शाम के धुंधलके में ठीक पांच बजकर चालीस मिनट पर पाकिस्तानी वायुसेना के सैबर जेट्स और स्टार फाइटर्स विमानों ने भारतीय वायु सीमा पार कर पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर और आगरा के सैनिक हवाई अड्डों पर बम गिराने शुरू कर दिए।
इंदिरा गांधी ने उसी समय दिल्ली लौटने का फैसला किया। दिल्ली में ब्लैक आउट होने के कारण पहले उनके विमान को लखनऊ मोड़ा गया। ग्यारह बजे के आसपास वह दिल्ली पहुंचीं। मंत्रिमंडल की आपात बैठक के बाद लगभग कांपती हुई आवाज में अटक-अटक कर उन्होंने देश को संबोधित किया। पूर्व में तेजी से आगे बढ़ते हुए भारतीय सेनाओं ने जेसोर और खुलना पर कब्जा कर लिया। भारतीय सेना की रणनीति थी महत्वपूर्ण ठिकानों को बाई पास करते हुए आगे बढ़ते रहना।
ढाका पर कब्ज़ा भारतीय सेना का लक्ष्य नहीं
पूरे युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी को कभी विचलित नहीं देखा गया। वह पौ फटने तक काम करतीं और जब दूसरे दिन दफ्तर पहुंचतीं, तो कह नहीं सकता था कि वह सिर्फ दो घंटे की नींद लेकर आ रही हैं।
जाने-माने पत्रकार इंदर मल्होत्रा याद करते हैं, "आधी रात के समय जब रेडियो पर उन्होंने देश को संबोधित किया था तो उस समय उनकी आवाज में तनाव था और ऐसा लगा कि वह थोड़ी सी परेशान सी हैं। लेकिन उसके अगले रोज जब मैं उनसे मिलने गया तो ऐसा लगा कि उन्हें दुनिया में कोई फ़िक्र है ही नहीं। जब मैंने जंग के बारे में पूछा तो बोलीं अच्छी चल रही है। लेकिन यह देखो मैं नार्थ ईस्ट से यह बेड कवर लाई हूं जिसे मैंने अपने सिटिंग रूम की सेटी पर बिछाया है। कैसा लग रहा है? मैंने कहा बहुत ही खूबसूरत है। ऐसा लगा कि उनके दिमाग में कोई चिंता है ही नहीं।"
गवर्नमेंट हाउस पर बमबारी
14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन के चोटी के अधिकारी भाग लेने वाले हैं।
भारतीय सेना ने तय किया कि इसी समय उस भवन पर बम गिराए जाएं। बैठक के दौरान ही मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी। गवर्नर मलिक ने एयर रेड शेल्टर में शरण ली और नमाज पढ़ने लगे। वहीं पर कांपते हाथों से उन्होंने अपना इस्तीफा लिखा।
दो दिन बाद ढाका के बाहर मीरपुर ब्रिज पर मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने अपनी जोंगा के बोनेट पर अपने स्टाफ ऑफिसर के नोट पैड पर पूर्वी पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल नियाजी के लिए एक नोट लिखा- प्रिय अब्दुल्लाह, मैं यहीँ पर हूं, खेल ख़त्म हो चुका है। मैं सलाह देता हूँ कि तुम मुझे अपने आप को सौंप दो और मैं तुम्हारा ख्याल रखूंगा।
मेजर जनरल गंधर्व नागरा अब इस दुनिया में नहीं हैं। कुछ वर्ष पहले उन्होंने बीबीसी को बताया था, "जब यह संदेश लेकर मेरे एडीसी कैप्टेन हरतोश मेहता नियाजी के पास गए तो उन्होंने उनके साथ जनरल जमशेद को भेजा, जो ढाका गैरिसन के जीओसी थे। मैंने जनरल जमशेद की गाड़ी में बैठ कर उनका झंडा उतारा और 2-माउंटेन डिव का झंडा लगा दिया। जब मैं नियाजी के पास पहुंचा तो उन्होंने बहुत तपाक से मुझे रिसीव किया।"
16 दिसंबर की सुबह सवा नौ बजे जनरल जैकब को मानेकशॉ का संदेश मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए तुरंत ढाका पहुंचें नियाजी ने जैकब को रिसीव करने के लिए एक कार ढाका हवाई अड्डे पर भेजी हुई थी।
जैकब कार से छोड़ी दूर ही आगे बढ़े थे कि मुक्ति बाहिनी के लोगों ने उन पर फायरिंग शुरू कर दी। जैकब दोनों हाथ ऊपर उठा कर कार से नीचे कूदे और उन्हें बताया कि वह भारतीय सेना से हैं। बाहिनी के लोगों ने उन्हें आगे जाने दिया।
इंदिरा गांधी ने उसी समय दिल्ली लौटने का फैसला किया। दिल्ली में ब्लैक आउट होने के कारण पहले उनके विमान को लखनऊ मोड़ा गया। ग्यारह बजे के आसपास वह दिल्ली पहुंचीं। मंत्रिमंडल की आपात बैठक के बाद लगभग कांपती हुई आवाज में अटक-अटक कर उन्होंने देश को संबोधित किया। पूर्व में तेजी से आगे बढ़ते हुए भारतीय सेनाओं ने जेसोर और खुलना पर कब्जा कर लिया। भारतीय सेना की रणनीति थी महत्वपूर्ण ठिकानों को बाई पास करते हुए आगे बढ़ते रहना।
ढाका पर कब्ज़ा भारतीय सेना का लक्ष्य नहीं
आश्चर्य की बात है कि पूरे युद्ध में मानेकशॉ खुलना और चटगाँव पर ही कब्ज़ा करने पर जोर देते रहे और ढ़ाका पर कब्जा करने का लक्ष्य भारतीय सेना के सामने रखा ही नहीं गया। इसकी पुष्टि करते हुए जनरल जैकब कहते हैं, "वास्तव में 13 दिसंबर को जब हमारे सैनिक ढाका के बाहर थे, हमारे पास कमान मुख्यालय पर संदेश आया कि अमुक-अमुक समय तक पहले वह उन सभी नगरों पर कब्जा करे जिन्हें वह बाईपास कर आए थे। अभी भी ढाका का कोई जिक्र नहीं था। यह आदेश हमें उस समय मिला जब हमें ढाका की इमारतें साफ नजर आ रही थीं।"
पूरे युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी को कभी विचलित नहीं देखा गया। वह पौ फटने तक काम करतीं और जब दूसरे दिन दफ्तर पहुंचतीं, तो कह नहीं सकता था कि वह सिर्फ दो घंटे की नींद लेकर आ रही हैं।
जाने-माने पत्रकार इंदर मल्होत्रा याद करते हैं, "आधी रात के समय जब रेडियो पर उन्होंने देश को संबोधित किया था तो उस समय उनकी आवाज में तनाव था और ऐसा लगा कि वह थोड़ी सी परेशान सी हैं। लेकिन उसके अगले रोज जब मैं उनसे मिलने गया तो ऐसा लगा कि उन्हें दुनिया में कोई फ़िक्र है ही नहीं। जब मैंने जंग के बारे में पूछा तो बोलीं अच्छी चल रही है। लेकिन यह देखो मैं नार्थ ईस्ट से यह बेड कवर लाई हूं जिसे मैंने अपने सिटिंग रूम की सेटी पर बिछाया है। कैसा लग रहा है? मैंने कहा बहुत ही खूबसूरत है। ऐसा लगा कि उनके दिमाग में कोई चिंता है ही नहीं।"
गवर्नमेंट हाउस पर बमबारी
14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन के चोटी के अधिकारी भाग लेने वाले हैं।
भारतीय सेना ने तय किया कि इसी समय उस भवन पर बम गिराए जाएं। बैठक के दौरान ही मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी। गवर्नर मलिक ने एयर रेड शेल्टर में शरण ली और नमाज पढ़ने लगे। वहीं पर कांपते हाथों से उन्होंने अपना इस्तीफा लिखा।
दो दिन बाद ढाका के बाहर मीरपुर ब्रिज पर मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने अपनी जोंगा के बोनेट पर अपने स्टाफ ऑफिसर के नोट पैड पर पूर्वी पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल नियाजी के लिए एक नोट लिखा- प्रिय अब्दुल्लाह, मैं यहीँ पर हूं, खेल ख़त्म हो चुका है। मैं सलाह देता हूँ कि तुम मुझे अपने आप को सौंप दो और मैं तुम्हारा ख्याल रखूंगा।
मेजर जनरल गंधर्व नागरा अब इस दुनिया में नहीं हैं। कुछ वर्ष पहले उन्होंने बीबीसी को बताया था, "जब यह संदेश लेकर मेरे एडीसी कैप्टेन हरतोश मेहता नियाजी के पास गए तो उन्होंने उनके साथ जनरल जमशेद को भेजा, जो ढाका गैरिसन के जीओसी थे। मैंने जनरल जमशेद की गाड़ी में बैठ कर उनका झंडा उतारा और 2-माउंटेन डिव का झंडा लगा दिया। जब मैं नियाजी के पास पहुंचा तो उन्होंने बहुत तपाक से मुझे रिसीव किया।"
16 दिसंबर की सुबह सवा नौ बजे जनरल जैकब को मानेकशॉ का संदेश मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए तुरंत ढाका पहुंचें नियाजी ने जैकब को रिसीव करने के लिए एक कार ढाका हवाई अड्डे पर भेजी हुई थी।
जैकब कार से छोड़ी दूर ही आगे बढ़े थे कि मुक्ति बाहिनी के लोगों ने उन पर फायरिंग शुरू कर दी। जैकब दोनों हाथ ऊपर उठा कर कार से नीचे कूदे और उन्हें बताया कि वह भारतीय सेना से हैं। बाहिनी के लोगों ने उन्हें आगे जाने दिया।
आँसू और चुटकुले
बांग्लादेश युद्ध
आँसू और चुटकुले
जब जैकब पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय पहुंचे तो उन्होंने देखा जनरल नागरा नियाजी के गले में बांहें डाले हुए एक सोफे पर बैठे हुए हैं और पंजाबी में उन्हें चुटकुले सुना रहे हैं। जैकब ने नियाजी को आत्मसमर्पण की शर्तें पढ़ कर सुनाई। नियाजी की आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने कहा, "कौन कह रहा है कि मैं हथियार डाल रहा हूँ।"
जनरल राव फरमान अली ने इस बात पर ऐतराज किया कि पाकिस्तानी सेनाएं भारत और बांग्लादेश की संयुक्त कमान के सामने आत्मसमर्पण करें। समय बीतता जा रहा था। जैकब नियाजी को कोने में ले गए। उन्होंने उनसे कहा कि अगर उन्होंने हथियार नहीं डाले तो वह उनके परिवारों की सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सकते। लेकिन अगर वह समर्पण कर देते हैं, तो उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनकी होगी।
जैकब ने कहा- मैं आपको फैसला लेने के लिए तीस मिनट का समय देता हूं। अगर आप समर्पण नहीं करते तो मैं ढाका पर बमबारी दोबारा शुरू करने का आदेश दे दूंगा। अंदर ही अंदर जैकब की हालत खराब हो रही थी। नियाजी के पास ढाका में 26400 सैनिक थे जबकि भारत के पास सिर्फ 3000 सैनिक और वह भी ढाका से तीस किलोमीटर दूर !
अरोड़ा अपने दलबदल समेत एक दो घंटे में ढाका लैंड करने वाले थे और युद्ध विराम भी जल्द खत्म होने वाला था। जैकब के हाथ में कुछ भी नहीं था। 30 मिनट बाद जैकब जब नियाजी के कमरे में घुसे तो वहां सन्नाटा छाया हुआ था। आत्म समर्पण का दस्तावेज मेज पर रखा हुआ था।
जैकब ने नियाजी से पूछा क्या वह समर्पण स्वीकार करते हैं? नियाजी ने कोई जवाब नहीं दिया, उन्होंने यह सवाल तीन बार दोहराया। नियाजी फिर भी चुप रहे। जैकब ने दस्तावेज को उठाया और हवा में हिला कर कहा, 'आई टेक इट एज एक्सेप्टेड। '
नियाज़ी फिर रोने लगे. जैकब नियाज़ी को फिर कोने में ले गए और उन्हें बताया कि समर्पण रेस कोर्स मैदान में होगा. नियाज़ी ने इसका सख़्त विरोध किया. इस बात पर भी असमंजस था कि नियाज़ी समर्पण किस चीज़ का करेंगे.
मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने बताया था, "जैकब मुझसे कहने लगे कि इसको मनाओ कि यह कुछ तो सरेंडर करें. तो फिर मैंने नियाज़ी को एक साइड में ले जा कर कहा कि अब्दुल्ला तुम एक तलवार सरेंडर करो, तो वह कहने लगे पाकिस्तानी सेना में तलवार रखने का रिवाज नहीं है. तो फिर मैंने कहा कि तुम सरेंडर क्या करोगे? तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है. लगता है तुम्हारी पेटी उतारनी पड़ेगी... या टोपी उतारनी पड़ेगी, जो ठीक नहीं लगेगा. फिर मैंने ही सलाह दी कि तुम एक पिस्टल लगाओ ओर पिस्टल उतार कर सरेंडर कर देना."
सरेंडर लंच
इसके बाद सब लोग खाने के लिए मेस की तरफ बढ़े। ऑब्जर्वर अखबार के गाविन यंग बाहर खड़े हुए थे। उन्होंने जैकब से अनुरोध किया क्या वह भी खाना खा सकते हैं। जैकब ने उन्हें अंदर बुला लिया। वहां पर करीने से टेबुल लगी हुई थी...कांटे और छुरी और पूरे ताम-झाम के साथ। जैकब का कुछ भी खाने का मन नहीं हुआ। वह मेज के एक कोने में अपने एडीसी के साथ खड़े हो गए। बाद में गाविन ने अपने अखबार ऑब्जर्वर के लिए दो पन्ने का लेख लिखा 'सरेंडर लंच।'
चार बजे नियाजी और जैकब जनरल अरोड़ा को लेने ढाका हवाई अड्डे पहुंचे। रास्ते में जैकब को दो भारतीय पैराट्रूपर दिखाई दिए। उन्होंने कार रोक कर उन्हें अपने पीछे आने के लिए कहा।
जैतूनी हरे रंग की मेजर जनरल की वर्दी पहने हुए एक व्यक्ति उनका तरफ बढ़ा। जैकब समझ गए कि वह मुक्ति बाहिनी के टाइगर सिद्दीकी हैं। उन्हें कुछ खतरे की बू आई। उन्होंने वहाँ मौजूद पेराट्रूपर्स से कहा कि वह नियाजी को कवर करें और सिद्दीकी की तरफ अपनी राइफलें तान दें।
जैकब ने विनम्रता पूर्वक सिद्दीकी से कहा कि वह हवाई अड्डे से चले जाएं। टाइगर टस से मस नहीं हुए। जैकब ने अपना अनुरोध दोहराया। टाइगर ने तब भी कोई जवाब नहीं दिया। जैकब ने तब चिल्ला कर कहा कि वह फ़ौरन अपने समर्थकों के साथ हवाई अड्डा छोड़ कर चले जाएं। इस बार जैकब की डांट का असर हुआ।
साढ़े चार बजे अरोड़ा अपने दल बल के साथ पांच एम क्यू हेलिकॉप्टर्स से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे। रेसकोर्स मैदान पर पहले अरोड़ा ने गार्ड ऑफ़ ऑनर का निरीक्षण किया।
अरोड़ा और नियाजी एक मेज के सामने बैठे और दोनों ने आत्म समर्पण के दस्तवेज पर हस्ताक्षर किए। नियाजी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया। नियाजी की आंखें एक बार फिर नम हो आईं।
अंधेरा हो रहा था। वहां पर मौजूद भीड़ चिल्लाने लगी। वह लोग नियाजी के खून के प्यासे हो रहे थे। भारतीय सेना के वरिष्ठ अफसरों ने नियाजी के चारों तरफ घेरा बना दिया और उनको एक जीप में बैठा कर एक सुरक्षित जगह ले गए।
ढाका स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है
ठीक उसी समय इंदिरा गांधी संसद भवन के अपने दफ़्तर में स्वीडिश टेलीविजन को एक इंटरव्यू दे रही थीं। तभी उनकी मेज पर रखा लाल टेलीफोन बजा। रिसीवर पर उन्होंने सिर्फ चार शब्द कहे....यस...यस और थैंक यू। दूसरे छोर पर जनरल मानेक शॉ थे जो उन्हें बांग्लादेश में जीत की खबर दे रहे थे।
श्रीमती गांधी ने टेलीविजन प्रोड्यूसर से माफी मांगी और तेज कदमों से लोक सभा की तरफ बढ़ीं। अभूतपूर्व शोर शराबे के बीच उन्होंने ऐलान किया- ढाका अब एक स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है. बाकी का उनका वक्तव्य तालियों की गड़गड़ाहट और नारेबाजी में डूब कर रह गया।
जब जैकब पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय पहुंचे तो उन्होंने देखा जनरल नागरा नियाजी के गले में बांहें डाले हुए एक सोफे पर बैठे हुए हैं और पंजाबी में उन्हें चुटकुले सुना रहे हैं। जैकब ने नियाजी को आत्मसमर्पण की शर्तें पढ़ कर सुनाई। नियाजी की आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने कहा, "कौन कह रहा है कि मैं हथियार डाल रहा हूँ।"
जनरल राव फरमान अली ने इस बात पर ऐतराज किया कि पाकिस्तानी सेनाएं भारत और बांग्लादेश की संयुक्त कमान के सामने आत्मसमर्पण करें। समय बीतता जा रहा था। जैकब नियाजी को कोने में ले गए। उन्होंने उनसे कहा कि अगर उन्होंने हथियार नहीं डाले तो वह उनके परिवारों की सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सकते। लेकिन अगर वह समर्पण कर देते हैं, तो उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनकी होगी।
जैकब ने कहा- मैं आपको फैसला लेने के लिए तीस मिनट का समय देता हूं। अगर आप समर्पण नहीं करते तो मैं ढाका पर बमबारी दोबारा शुरू करने का आदेश दे दूंगा। अंदर ही अंदर जैकब की हालत खराब हो रही थी। नियाजी के पास ढाका में 26400 सैनिक थे जबकि भारत के पास सिर्फ 3000 सैनिक और वह भी ढाका से तीस किलोमीटर दूर !
अरोड़ा अपने दलबदल समेत एक दो घंटे में ढाका लैंड करने वाले थे और युद्ध विराम भी जल्द खत्म होने वाला था। जैकब के हाथ में कुछ भी नहीं था। 30 मिनट बाद जैकब जब नियाजी के कमरे में घुसे तो वहां सन्नाटा छाया हुआ था। आत्म समर्पण का दस्तावेज मेज पर रखा हुआ था।
जैकब ने नियाजी से पूछा क्या वह समर्पण स्वीकार करते हैं? नियाजी ने कोई जवाब नहीं दिया, उन्होंने यह सवाल तीन बार दोहराया। नियाजी फिर भी चुप रहे। जैकब ने दस्तावेज को उठाया और हवा में हिला कर कहा, 'आई टेक इट एज एक्सेप्टेड। '
नियाज़ी फिर रोने लगे. जैकब नियाज़ी को फिर कोने में ले गए और उन्हें बताया कि समर्पण रेस कोर्स मैदान में होगा. नियाज़ी ने इसका सख़्त विरोध किया. इस बात पर भी असमंजस था कि नियाज़ी समर्पण किस चीज़ का करेंगे.
मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने बताया था, "जैकब मुझसे कहने लगे कि इसको मनाओ कि यह कुछ तो सरेंडर करें. तो फिर मैंने नियाज़ी को एक साइड में ले जा कर कहा कि अब्दुल्ला तुम एक तलवार सरेंडर करो, तो वह कहने लगे पाकिस्तानी सेना में तलवार रखने का रिवाज नहीं है. तो फिर मैंने कहा कि तुम सरेंडर क्या करोगे? तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है. लगता है तुम्हारी पेटी उतारनी पड़ेगी... या टोपी उतारनी पड़ेगी, जो ठीक नहीं लगेगा. फिर मैंने ही सलाह दी कि तुम एक पिस्टल लगाओ ओर पिस्टल उतार कर सरेंडर कर देना."
सरेंडर लंच
इसके बाद सब लोग खाने के लिए मेस की तरफ बढ़े। ऑब्जर्वर अखबार के गाविन यंग बाहर खड़े हुए थे। उन्होंने जैकब से अनुरोध किया क्या वह भी खाना खा सकते हैं। जैकब ने उन्हें अंदर बुला लिया। वहां पर करीने से टेबुल लगी हुई थी...कांटे और छुरी और पूरे ताम-झाम के साथ। जैकब का कुछ भी खाने का मन नहीं हुआ। वह मेज के एक कोने में अपने एडीसी के साथ खड़े हो गए। बाद में गाविन ने अपने अखबार ऑब्जर्वर के लिए दो पन्ने का लेख लिखा 'सरेंडर लंच।'
चार बजे नियाजी और जैकब जनरल अरोड़ा को लेने ढाका हवाई अड्डे पहुंचे। रास्ते में जैकब को दो भारतीय पैराट्रूपर दिखाई दिए। उन्होंने कार रोक कर उन्हें अपने पीछे आने के लिए कहा।
जैतूनी हरे रंग की मेजर जनरल की वर्दी पहने हुए एक व्यक्ति उनका तरफ बढ़ा। जैकब समझ गए कि वह मुक्ति बाहिनी के टाइगर सिद्दीकी हैं। उन्हें कुछ खतरे की बू आई। उन्होंने वहाँ मौजूद पेराट्रूपर्स से कहा कि वह नियाजी को कवर करें और सिद्दीकी की तरफ अपनी राइफलें तान दें।
जैकब ने विनम्रता पूर्वक सिद्दीकी से कहा कि वह हवाई अड्डे से चले जाएं। टाइगर टस से मस नहीं हुए। जैकब ने अपना अनुरोध दोहराया। टाइगर ने तब भी कोई जवाब नहीं दिया। जैकब ने तब चिल्ला कर कहा कि वह फ़ौरन अपने समर्थकों के साथ हवाई अड्डा छोड़ कर चले जाएं। इस बार जैकब की डांट का असर हुआ।
साढ़े चार बजे अरोड़ा अपने दल बल के साथ पांच एम क्यू हेलिकॉप्टर्स से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे। रेसकोर्स मैदान पर पहले अरोड़ा ने गार्ड ऑफ़ ऑनर का निरीक्षण किया।
अरोड़ा और नियाजी एक मेज के सामने बैठे और दोनों ने आत्म समर्पण के दस्तवेज पर हस्ताक्षर किए। नियाजी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया। नियाजी की आंखें एक बार फिर नम हो आईं।
अंधेरा हो रहा था। वहां पर मौजूद भीड़ चिल्लाने लगी। वह लोग नियाजी के खून के प्यासे हो रहे थे। भारतीय सेना के वरिष्ठ अफसरों ने नियाजी के चारों तरफ घेरा बना दिया और उनको एक जीप में बैठा कर एक सुरक्षित जगह ले गए।
ढाका स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है
ठीक उसी समय इंदिरा गांधी संसद भवन के अपने दफ़्तर में स्वीडिश टेलीविजन को एक इंटरव्यू दे रही थीं। तभी उनकी मेज पर रखा लाल टेलीफोन बजा। रिसीवर पर उन्होंने सिर्फ चार शब्द कहे....यस...यस और थैंक यू। दूसरे छोर पर जनरल मानेक शॉ थे जो उन्हें बांग्लादेश में जीत की खबर दे रहे थे।
श्रीमती गांधी ने टेलीविजन प्रोड्यूसर से माफी मांगी और तेज कदमों से लोक सभा की तरफ बढ़ीं। अभूतपूर्व शोर शराबे के बीच उन्होंने ऐलान किया- ढाका अब एक स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है. बाकी का उनका वक्तव्य तालियों की गड़गड़ाहट और नारेबाजी में डूब कर रह गया।