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डिस्को बार, शराब और साइकिल चलाती औरतों वाला लाहौर
बीबीसी हिंदी
Updated Mon, 30 Apr 2018 05:36 PM IST
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ईद मिलादुनबी के अवसर पर लाहौर में सजाया गया बाजार
- फोटो : AFP
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लाहौर शहर ने पिछले 70 सालों में समाज के लिहाज से बहुत कलाबाजियां खाई हैं। 50 के दशक में लाहौर की सड़कों पर औरतें साइकिल चलाती थीं और राहगीर उन्हें घूर-घूरकर नहीं देखते थे।
बार और डिस्को हुआ करते थे। शराब भी गैर-कानूनी नहीं बनी थी। घरों में ड्राइंग रूम भी थे, औरतों और मर्दों के कमरे अलग-अलग होते थे। ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते थे जिसमें महिला-पुरुष साथ आ सकते थे और विशुद्ध रूप से महिलाओं के लिए मीना बाजार भी होते थे।
शाम को क्लब जाना, टेनिस और तंबोला खेलना बहुत से घरों में सामान्य था। रेडियो बजाना, गाना सुनना, गीत गाना, ताश, लूडो, कैरम खेलना और बाजियां जमाना आम शौक थे। साड़ी बांधना केवल किसी शादी के लिए नहीं होता था, बल्कि बहुत-सी महिलाओं का यह रोजमर्रा का पहनावा था। पर्दे में रहने वाली महिलाएं साधारण मिस्री या टोपी बुर्का ओढ़ती थीं।
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सड़कों पर तांगे चलते थे और घोड़े सड़कों पर लीद करते जाते थे। हालांकि, बाद में सरकारी आदेश पर उन्हें एक बड़े से पायजामे पहना दिए गए लेकिन अगर कोई लीद से सड़क पर गिर जाता था तो उसे तुरंत टिटनेस का टीका लगवाने के लिए दौड़ लग जाती थी। घरों में कार चाहे हो या न हो, भैंस जरूर होती थी।
अधिकतर महिलाएं बाहर काम नहीं करती थीं, जो महिलाएं घरों में रहती थीं उनमें किसी भी तरह की हीनभावना नहीं थी और बाहर काम करने वाली महिलाओं को किसी भी तरह का घमंड नहीं होता था।
पंजाब की सारी नदियां बहती थीं और रावी में बाढ़ भी आया करती थी। सड़कों के किनारे आम और जामुन के पेड़ होते थे। लोगों में एक अजीब-सा देशभक्ति का जज्बा देखने को मिलता था और अक्सर बिना कोई कारण पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाते थे।
स्कूटर पर पूरा कुनबा
मोटरसाइकिल मुश्किल से ही नजर आती थी और स्कूटर होते थे जिन पर पूरा कुनबा सवार होकर घूमता था। बसों के साथ कार भी नजर आती थी। यथार्थवाद और लघु कला फल-फूल रही थी।
साहित्य और लेखक जीवित थे, टी हाऊस और बेकरी की रौनकें तब कम नहीं पड़ी थीं। सचमुच के लेखक और शायर शहर की सड़कों पर चलते फिरते नजर आ जाते थे, उनसे बात की जा सकती थी, मिला जा सकता था।
सूबे खान, बरकत अली, बॉम्बे क्लॉथ हाऊस की पहचान थी। घरों में सर्दी आने का पता ऊन की बुनाई से पता चलता था। घरों में दो दिन छोड़कर मांस बनता था और कुछ गिने-चुने पकवानों के अलावा कुछ दावत वाले पकवान हुआ करते थे।
फिर जैसे किसी जादुई हाथ ने हमारे सामाजिक ढांचे की पसलियां बड़ी खामोशी से घसीट लीं और सारी इमारत एक पिलपिले ढेर की तरह अपने ही कदमों में गिर गई।
साइकिल छोड़िए, गाड़ी चलाने वाली महिलाओं को इतनी हैरत से देर तक आंखें फाड़कर देखा जाता है कि बार-बार साफ करने के बावजूद गाड़ी का शीशा चिपचिपा जाता है।
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बार और डिस्को हुआ करते थे। शराब भी गैर-कानूनी नहीं बनी थी। घरों में ड्राइंग रूम भी थे, औरतों और मर्दों के कमरे अलग-अलग होते थे। ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते थे जिसमें महिला-पुरुष साथ आ सकते थे और विशुद्ध रूप से महिलाओं के लिए मीना बाजार भी होते थे।
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शाम को क्लब जाना, टेनिस और तंबोला खेलना बहुत से घरों में सामान्य था। रेडियो बजाना, गाना सुनना, गीत गाना, ताश, लूडो, कैरम खेलना और बाजियां जमाना आम शौक थे। साड़ी बांधना केवल किसी शादी के लिए नहीं होता था, बल्कि बहुत-सी महिलाओं का यह रोजमर्रा का पहनावा था। पर्दे में रहने वाली महिलाएं साधारण मिस्री या टोपी बुर्का ओढ़ती थीं।
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सड़कों पर तांगे चलते थे और घोड़े सड़कों पर लीद करते जाते थे। हालांकि, बाद में सरकारी आदेश पर उन्हें एक बड़े से पायजामे पहना दिए गए लेकिन अगर कोई लीद से सड़क पर गिर जाता था तो उसे तुरंत टिटनेस का टीका लगवाने के लिए दौड़ लग जाती थी। घरों में कार चाहे हो या न हो, भैंस जरूर होती थी।
अधिकतर महिलाएं बाहर काम नहीं करती थीं, जो महिलाएं घरों में रहती थीं उनमें किसी भी तरह की हीनभावना नहीं थी और बाहर काम करने वाली महिलाओं को किसी भी तरह का घमंड नहीं होता था।
पंजाब की सारी नदियां बहती थीं और रावी में बाढ़ भी आया करती थी। सड़कों के किनारे आम और जामुन के पेड़ होते थे। लोगों में एक अजीब-सा देशभक्ति का जज्बा देखने को मिलता था और अक्सर बिना कोई कारण पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाते थे।
स्कूटर पर पूरा कुनबा
मोटरसाइकिल मुश्किल से ही नजर आती थी और स्कूटर होते थे जिन पर पूरा कुनबा सवार होकर घूमता था। बसों के साथ कार भी नजर आती थी। यथार्थवाद और लघु कला फल-फूल रही थी।
साहित्य और लेखक जीवित थे, टी हाऊस और बेकरी की रौनकें तब कम नहीं पड़ी थीं। सचमुच के लेखक और शायर शहर की सड़कों पर चलते फिरते नजर आ जाते थे, उनसे बात की जा सकती थी, मिला जा सकता था।
सूबे खान, बरकत अली, बॉम्बे क्लॉथ हाऊस की पहचान थी। घरों में सर्दी आने का पता ऊन की बुनाई से पता चलता था। घरों में दो दिन छोड़कर मांस बनता था और कुछ गिने-चुने पकवानों के अलावा कुछ दावत वाले पकवान हुआ करते थे।
फिर जैसे किसी जादुई हाथ ने हमारे सामाजिक ढांचे की पसलियां बड़ी खामोशी से घसीट लीं और सारी इमारत एक पिलपिले ढेर की तरह अपने ही कदमों में गिर गई।
साइकिल छोड़िए, गाड़ी चलाने वाली महिलाओं को इतनी हैरत से देर तक आंखें फाड़कर देखा जाता है कि बार-बार साफ करने के बावजूद गाड़ी का शीशा चिपचिपा जाता है।
अब किसी को बुनाई का डिजाइन डालना नहीं आता
लाहौर में पीने का साफ पानी 10 साल में खत्म हो सकता है
- फोटो : BBC
बुर्के में तब्दीली आई है जिसने हिजाब और गाऊन की शक्ल ले ली है। इनसे झांकते गोल-मटोल चेहरों और काजल से सजी आंखों को देखकर देखते ही रहने का दिल चाहता है।
दर्जियों का काम अब भी चल रहा है लेकिन असली काम डिजाइनर का है जो जब चाहता है दामन को गिरेबान से मिला देता है।
इसी लाहौर में जहां अनारकली में किसी राह चलते आदमी के स्वेटर का नमूना देखकर हमारी एक दोस्त ने वहीं से ऊन-सिलाइयां खरीदीं और उन साहब का पीछा करते-करते नमूना उतार लिया।
अब इसी लाहौर में कोई हाथ के बुने हुए स्वेटर नहीं पहनता और किसी को बुनाई का डिजाइन डालना नहीं आता।
कई पकवान हैं, कितने ही चैनल दिन-रात औरतों को खाना पकाना सिखा रहे हैं। डिलीवरी बॉय घर-घर पका हुआ खाना पहुंचा रहे हैं लेकिन खाने में कहीं जायका नहीं है।
भैंस शहर से गायब हो गई हैं, रावी नदी सूख चुकी है। घोड़े अब रेस कोर्स और क्योलरी ग्राउंड में नजर आते हैं।
लाहौर की शाम में अब भी मोतिया और रात की रानी की खुशबू होती है लेकिन एक बात हम भूले बैठे हैं कि लाहौर का भू-जलस्तर तेजी से खत्म हो रहा है।
सोचिए पानी के बगैर लाहौर कैसा होगा?
दर्जियों का काम अब भी चल रहा है लेकिन असली काम डिजाइनर का है जो जब चाहता है दामन को गिरेबान से मिला देता है।
इसी लाहौर में जहां अनारकली में किसी राह चलते आदमी के स्वेटर का नमूना देखकर हमारी एक दोस्त ने वहीं से ऊन-सिलाइयां खरीदीं और उन साहब का पीछा करते-करते नमूना उतार लिया।
अब इसी लाहौर में कोई हाथ के बुने हुए स्वेटर नहीं पहनता और किसी को बुनाई का डिजाइन डालना नहीं आता।
कई पकवान हैं, कितने ही चैनल दिन-रात औरतों को खाना पकाना सिखा रहे हैं। डिलीवरी बॉय घर-घर पका हुआ खाना पहुंचा रहे हैं लेकिन खाने में कहीं जायका नहीं है।
भैंस शहर से गायब हो गई हैं, रावी नदी सूख चुकी है। घोड़े अब रेस कोर्स और क्योलरी ग्राउंड में नजर आते हैं।
लाहौर की शाम में अब भी मोतिया और रात की रानी की खुशबू होती है लेकिन एक बात हम भूले बैठे हैं कि लाहौर का भू-जलस्तर तेजी से खत्म हो रहा है।
सोचिए पानी के बगैर लाहौर कैसा होगा?