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भारत में जन्मा है पाकिस्तान का 'जादूगर डॉक्टर'

Tue, 21 Oct 2014 11:25 AM IST
शाहजेब जिलानी/बीबीसी न्यूज, कराची
शाहजेब जिलानी/बीबीसी न्यूज, कराची Updated Tue, 21 Oct 2014 11:25 AM IST
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success story of the pakistani doctor adib rizvi

पाकिस्तान का पब्लिक हेल्थ सिस्टम काफी अव्यवस्थित है। पाकिस्तानी स्वास्थ्य तंत्र भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है।

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लेकिन कराची में एक ऐसा अस्पताल है जो लाखों लोगों को मुफ्त में अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराता है।

यह अस्पताल डॉक्टर अदीब रिजवी के सपने और मेहनत का नतीजा है जो आराम से अपने दूसरे साथियों की तरह निजी अस्पताल खोलकर जीवन जी सकते थे लेकिन उन्होंने समाजसेवा की राह चुनी।
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डॉ. रिजवी ने सिंध इंस्टिट्यूट ऑफ यूरोलॉजी एंड ट्रांसप्लांट(एसआईयूटी) की शुरुआत ब्रिटेन के नेशनल हेल्थ सर्विस से प्रेरित होकर की थी।

एसआईयूटी कराची सिविल अस्पताल का एक हिस्सा। पिछले 40 सालों में यहां हजारों मरीजों का अंग प्रतिरोपण हो चुका है। वहीं सैकडों लोगों को यहां प्रतिदिन मुफ्त डायलिसिस सुविधा प्रदान की जाती है।

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भारत छोड़ पाकिस्तान जा बसे थे रिजवी

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अदीब रिजवी को महज 17 साल की उम्र में हिन्दू-मुस्लिम दंगों की वजह से भारत छोड़कर पाकिस्तान आना पड़ा था।

1950 के दशक में उन्होंने अपना ज्यादातर समय पाकिस्तान के कराची में मेडिकल की पढ़ाई करते हुए बिताया।

वो याद करते हैं, "उन दिनों मैं काफी समय तक अस्पतालों में घूम-घूम कर देखा करता था कि वहां क्या चल रहा है।" उस दौर में उनके अनुभवों ने उनपर गहरा प्रभाव डाला जिसका असर ताउम्र रहा।

वो कहते हैं, "मैंने देखा कि जो लोग पैसे नहीं दे पाते उनके संग बेहद अपमानजनक बरताव किया जाता था। मैंने देखा कि बूढी महिलाएं अपने आभूषण गिरवी रखकर दवा खरीद रहीं थीं।"

कराची के मेडिकल डिग्री कॉलेज में अपनी पढाई पूरी करने के बाद डॉ. रिजवी एक फेलोशिप के तहत सर्जरी की पढ़ाई करने ब्रिटेन चले गए। उसके बाद, अगले एक दशक तक उन्होंने ब्रिटेन के अस्पतालों में काम किया।

डॉ. रिजवी कहते हैं, "मैं ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस(एनएचएस) से प्रेरित था। इससे मुझे अहसास हुआ कि मुफ्त चिकित्सा सेवा प्रदान करना संभव है।" रिजवी बताते हैं कि उनके दोस्त कहते थे, "ये नहीं हो सकता।"

नौकरी के दौरान ही करने लगे कोशिश

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जब रिजवी 1971 में पाकिस्तान वापस आए और कराची सिविल अस्पताल में यूरोलॉजी (मूत्र विज्ञान) विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में जुडे़ तो उनके साथियों को उनकी बातें दिवास्वप्न जैसी लगती थीं।

पाकिस्तान आने पर रिजवी के पास दो विकल्प थे, या तो वो अपना प्राइवेट अस्पताल खोलें या फिर खस्ताहाल सरकारी अस्पताल में नौकरी करें।

वो चाहते तो अपने कई दूसरे समकालीन उच्च शिक्षा प्राप्त डॉक्टरों की तरह सरकारी नौकरी के समांतर अपना वैभवशाली साम्राज्य भी बना सकते थे।

वो कहते हैं, "मुझे इन सब चीजों ने कभी आकर्षित नहीं किया। मुझे हमेशा से लगता था कि अगर कोई बदलाव लाना है तो मुझे सार्वजनिक क्षेत्र के लिए पूरी तरह समर्पित होना पडेगा। क्योंकि जब आम सार्वजनिक क्षेत्र में काम करते हैं तो आप आम लोगों की मदद कर रहे होते हैं।"

मदद और उपाय

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डॉ. रिजवी ने शुरुआत अपने कुछ निजी दोस्तों और शुभचिंतकों से आर्थिक मदद ले कर की। जनसेवा के लिए उत्सुक कुछ डॉक्टरों और उनके सहयोगियों ने अपनी टीम बनाई।

अपनी सेवा के विस्तार के लिए उन्होंने हर संभव उपाय अपनाए। अपना छोटा सा यूरोलॉजी विभाग खोलने के लिए उन्होंने ब्रिटेन से सैकेंड-हैंड डायलसिस मशीन खरीदी।

उनके समर्पण और कडे परिश्रम का ही परिणाम था कि उन्हें शीघ्र ही उन्हें जनता की मदद और स्वैच्छिक योगदान मिलने लगा।

धीरे-धीरे डॉ. रिजवी के वार्ड में एक-एक कर अत्याधुनिक सुविधाएं जुड़ने लगीं, वो भी मुफ्त।

वो कहते हैं, "मैंने कभी सरकारी या किसी संस्थान से आर्थिक मदद का इंतजार नहीं किया। ये सब कुछ मैंने योजना बना कर नहीं किया। हमारा विस्तार बहुत स्वाभाविक ढंग से हुआ। हम मरीजों की जरूरतों के हिसाब से बढ़ते गए।"

1970 के दशक के अंतर तक उनके संस्थान में किडनी (गुर्दा) के सैकडों मरीजों का डायलसिस होने लगा था। तभी डॉ। रिजवी और उनकी टीम को अहसास हुआ कि ऐसा ज्यादा समय तक नहीं चल सकता और अब अंग प्रतिरोपण की तरफ कदम बढाने का समय है।

पहला प्रतिरोपण

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उस समय पाकिस्तान के किसी भी अस्पताल में गुर्दे के ट्रांसप्लांट (प्रतिरोपण) की सुविधा नहीं थी। एक बार फिर डॉ। रिजवी और उनकी टीम से लोगों ने कहा कि यह नामुमकिन है।

वो कहते हैं, "मुझे कहा गया कि मुझे चुपचाप यूरोलॉजिस्ट के रूप में काम करते रहना चाहिए। लोग मुझसे कहते थे कि मैं अच्छी खासी प्राइवेट प्रैक्टिस कर सकता था लेकिन मैं अपना समय बर्बाद कर रहा हूं।"

डॉ। रिजवी फिर भी अपने फैसले पर अडिग रहे। ट्रांसप्लांट सर्जरी से जुडी नवीनतम तकनीकी सीखने के लिए वो पहले ब्रिटेन फिर अमेरिका गए।

1980 के दशक की शुरुआत में वापस आने के बाद उन्होंने ट्रांसप्लांट सर्जरी के लिए डॉक्टरों, नर्सों, टेक्निशियनों और अन्य कर्मचारियों की टीम बनानी शुरू की।

एक अस्पताल की छत पर उन्होंने प्रयोगशाला बनाई और वहाँ अपने साथियों को प्रशिक्षित करने के लिए कुत्तों, बंदरों समेत कई जानवरों की सर्जरी की।

डॉ। रिजवी और उनकी टीम की यह परियोजना आधिकारिक नहीं थी। बहुत से लोगों को पता भी नहीं था कि वहाँ क्या होता है।

वो कहते हैं, "अस्पताल वाले हमें बर्दाश्त कर लेते थे क्योंकि मैंने वहां थोडी बहुत स्वायत्तता हासिल कर ली थी। और जब तक मैं उनसे कोई आर्थिक मदद न मांगू तब तक वो मुझे मेरा काम करने देते थे।"

लंबा प्रशिक्षिण

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डॉ. रिजवी ने अपनी टीम को समझाया कि मनुष्यों की सर्जरी करते समय उन्हें बहुत ज्यादा सावधानी बरतनी होगी। इसीलिए वो इस बात पर जोर देते थे कि सर्जरी के प्रशिक्षिण के दौरान किसी भी जानवर की मौत न हो।

परीक्षणों का यह दौर कुछ सालों तक चला। दिसंबर, 1985 में डॉ। रिजवी और उनकी टीम ने पाकिस्तान का पहला सफल किडनी ट्रांसप्लांट किया।

करीब हफ्ते भर बाद जब पाकिस्तान की सरकार और मीडिया को इसकी भनक लगी तो इसे राष्ट्रीय उपलब्धि की तरह लिया गया।

उनकी पहली सर्जरी बेहत कामयाब रही। वो मरीज अगले 18 साल तक सामान्य जीवन जी सका।

उसके बाद डॉ। रिजवी की टीम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

एसआईयूटी में अब तक पांच हजार अंग प्रतिरोपण हो चुके हैं। साथ ही, यहां प्रतिदिन तकरीबन 750 डायलिसिस सेशन होते हैं।

उनके काम का भविष्य

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धीरे-धीरे एसआईयूटी को मिलने वाली आम मदद भी तेजी से बढने लगी।

डॉ. रिजवी कहते हैं, "हमने 40 साल पहले आठ बिस्तर वाले अस्पताल से शुरुआत की थी। आज हमारे पास 800 बिस्तर हैं। तब हमारे पास एक छोटा सा कमरा था। आज हमारे पास दो बहुमंजिला इमारतें हैं और तीन अन्य अभी बन रही हैं।"

बढती उम्र में भी डॉ. रिजवी पूरी तरह सक्रिय हैं। उन्हें अपनी टीम के कार्य पर नाज है लेकिन वो यह भी कहते हैं कि अभी हमें बहुत आगे जाना है।

पाकिस्तान की खराब जनस्वास्थ्य सेवाओं और बढती जनसंख्या के कारण एसआईयूटी जैसे संस्थानों पर दबाव काफी बढ़ता जा रहा है।

डॉ। रिजवी कहते हैं, "मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरे न रहने पर भी, समाजसेवा को समर्पित डॉक्टरों की नई पीढी इस संस्थान को आगे ले जाएगी।"

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