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एक परिवार जिसमें नहीं बची कोई महिला
Updated Wed, 16 Oct 2013 06:00 PM IST
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पाकिस्तान के पेशावर के क़िस्सा ख़्वानी बाज़ार में 29 सितंबर को हुए बम धमाके में, दिहाड़ी पर काम करने वाले सरताज ख़ान का पूरा परिवार खत्म हो गया।
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क़िस्सा-ख़्वानी को नाम मिला है उनके क़िस्से सुनाने वालों की वजह से जो क़हवे की चुस्कियों के बीच पेशावर के रास्ते गुज़रने वाले घुड़सवार या ऊंट पर सवार राहगीरों का मनोरंजन किया करते थे।
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पाकिस्तान के पेशावर के क़िस्सा ख़्वानी बाज़ार में 29 सितंबर को हुए बम धमाके में, दिहाड़ी पर काम करने वाले सरताज खान का पूरा परिवार खत्म हो गया।
किस्सा-ख्वानी को नाम मिला है उनके किस्से सुनाने वालों की वजह से जो क़हवे की चुस्कियों के बीच पेशावर के रास्ते गुज़रने वाले घुड़सवार या ऊंट पर सवार राहगीरों का मनोरंजन किया करते थे।
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सरताज खान ने इस त्रासदी को अपनी क़िस्मत समझकर स्वीकार कर लिया है।
10 अक्तूबर को जब प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ इस हमले और 22 सितंबर को चर्च पर हुए हमले में मारे गए लोगों के प्रति अपनी संवेदनाएं व्यक्त करने आए तो सरताज ख़ान ने कहा, "यह अल्लाह की मर्ज़ी है।"
प्रधानमंत्री ने उन्हें गले लगाकर सांत्वना दी। सरताज खान ने पश्तो में धीरे से कहा कि यह नवाज शरीफ की विनम्रता है कि वह मारे गए लोगों के परिजनों से मिलने आए हैं।
प्रधानमंत्री ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में बम धमाकों में मारे गए लोगों के परिवारों के लिए 5 करोड़ रूपए की सहायता का ऐलान किया।
स्थानीय नेताओं और विश्लेषकों का कहना है कि जान-माल के नुकसान की तुलना में यह राशि बहुत कम है।
इमरान ख़ान की अगुआई वाली पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ पार्टी की स्थानीय गठबंधन सरकार ने क़िस्सा ख़्वानी बम धमाके में मारे गए लोगों के परिवार के लिए 3 लाख रूपए और घायलों के लिए डेढ़ लाख रूपए की सहायता की घोषणा की थी।
असहनीय दुख
सहायता चेक तो सरताज ख़ान को भी मिले थे लेकिन 18 पारिवारिक सदस्यों के गंवाने के बाद उन्हें ये समझ नहीं आ रहा है कि वो इस हादसे से कैसे उबरें।
उम्र के पांच दशक गुज़ार चुके सरताज अपनी उम्र से ज़्यादा बूढ़े नज़र आते हैं। 29 सितंबर को बम धमाके की ख़बर सुनने के बाद वो क़िस्सा-ख़्वानी बाज़ार की तरफ़ दौड़े औऱ आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
उस लम्हे को याद करते हुए वो कहते हैं, ‘‘वहां आग जल रही थी। जली हुई दुकानों और बर्बाद वाहनों के टुकड़े पड़े थे। घायलों को अस्पताल ले जाया गया था लेकिन मरने वालों को पहचानना मुश्किल था क्योंकि उनके शरीर जले हुए और क्षत-विक्षत थे।’’
बेटे की शादी
उनका परिवार चारसद्दा ज़िले के शबक़दर इलाक़े में अपने गांव मट्टा मुग़लख़ेल से अपने बेटे दिलराज़ ख़ान की शादी का न्यौता देने रिश्तेदारों के घर आया था।
बदक़िस्मती से उनकी गाड़ी क़िस्सा-ख़्वानी बाज़ार से गुज़रते हुए बम धमाके की चपेट में आ गई।
जब तक आग बुझाई गई तब तक गाड़ी के कुछ मुड़े तुड़े हिस्से ही बचे थे। शादी के लिए तैयारियां धरी रह गईं और मृतकों को शव ढूंढने, गांव तक पहुंचाने और दफ़नाने की जद्दोजहद शुरू हो गई।
उस दिन के बाद से सरताज ख़ान और उनका परिवार अपने प्रियजनों की मौत का मातम मना रहा है।
सरताज खान के तीन बेटे और 13 साल की बेटी नाज़िया उस दिन घर पर थे और बच गए। उनके एक बेटे मलिक ताज की पत्नी और बेटे की मौत हो गई।
इस हादसे के बाद सरताज ख़ान के परिवार में एक भी औरत नहीं बची है।
सरताज के बेटे की शादी जो 20 अक्तूबर को होने वाली थी उसे आनन-फ़ानन में निपटा दिया गया ताकि नई बहू परिवार की जिंदगी चलाने में मदद कर सके।
ये एक असाधारण शादी थी क्योंकि इसमें ना तो मेहमानों के लिए चावल बने और ना ही लड़कियों ने गीत गाए जैसा कि एक परंपरागत पख्तून (पठान) शादी में होता है।