बाजवा के सेनाप्रमुख बनने से भारत-पाक संबंधों पर होगा कैसा असर, पढ़ें
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जनरल राहिल शरीफ के बाद पाकिस्तान के नए सेना प्रमुख के तौर पर लेफ्टिनेंट जनरल कमर जावेद बाजवा का नाम आना न तो चौंकाने वाली खबर है और न ही ऐसी खबर है जिसकी उम्मीद ना की जा रही हो।
जनरल राहिल शरीफ ने वरीयता के आधार पर चार नाम दिए थे उन चार नामों में से एक नाम प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को चुनना था और उन्होंने जनरल कमर जावेद बाजवा का नाम चुना है।
यह बात तो सब को मालूम थी कि नया सेना प्रमुख वही बनेगा जिसने दहशतगर्दी के खिलाफ जनरल राहिल शरीफ के साथ लड़ाइयां लड़ी हों।
चरमपंथियों के साथ लड़ाई में कमर जावेद बाजवा का लंबा अनुभव
कश्मीर से लेकर उत्तर में चरमपंथियों के साथ लड़ाई में कमर जावेद बाजवा का लंबा अनुभव रहा है। जब पाकिस्तान में एक कमजोर हुकूमत शासन करती है तो फौज की भूमिका और बढ़ जाती है।
चाहे बाजवा हो या राहिल शरीफ, पाकिस्तान में फौज एक संस्था के तौर पर काम करती हैं। इनका दखल नीतियों को बनाने को लेकर भी है फिर चाहे भारत, अफगानिस्तान और अमरीका के साथ पाकिस्तान के संबंध की ही बात क्यों ना हो।
फौज एक संस्था है, वो भारत को अलग नजर से देखता है
बाजवा के आने से भारत के साथ जो स्थिति है, वो ऐसी ही बनी रहेगी। ये ना खुशी की बात है और ना ही गम की।
जब राहिल शरीफ भी आए थे तो कोई निजी नीति लेकर तो नहीं आए थे भारत-पाक संबंध में। फौज एक संस्था है, वो भारत को अपने नजर से देखता है।
अभी जो हालात नियंत्रण रेखा पर हैं वो बढ़नी नहीं चाहिए। ये किसी भी देश के लिए अच्छा नहीं होगा।
बाजवा को एक कदम आगे जाकर डीजीएमओ की बातचीत में तेजी लानी चाहिए। अगर सेना प्रमुख नहीं बात कर सकते हैं तो फौज के इन अधिकारियों को मिलना चाहिए।
शरीफ ने चरमपंथ के खिलाफ जंग में फौज का बेहतरीन इस्तेमाल किया
हालांकि सेना प्रमुखों के नहीं मिलने की ऐसी कोई खास वजह नहीं है। जहां तक रिटायर हो रहे जनरल राहिल शरीफ की बात है तो उन्होंने फौज को एक संस्था के तौर पर मजबूत किया है।
उन्होंने परंपरागत रूप से सिर्फ लड़ाई में फौज के इस्तेमाल की जगह चरमपंथ के खिलाफ जंग में फौज का बेहतरीन इस्तेमाल किया है। जनरल शरीफ जब आए थे तब जनरल कियानी ने दो बार एक्सटेंशन ले लिया था। उस वक्त फौज का हौसला बहुत कम हो चुका था।
क्योंकि जब जनरल समय पर नहीं जाते हैं और एक्सटेंशन ले लेते हैं तो एक किस्म की राजनीति शुरू हो जाती है। इसलिए जनरल शरीफ के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि कैसे फौज के हौसले को बढ़ाया जाए।