पाकिस्तान चुनाव : सिंध में पहली बार मुश्किल हो रहा भविष्यवाणी करना
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नवाज की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (पीएमएल-एन) का पंजाब गढ़ है। नेशनल असेंबली की 52 प्रतिशत सीटें यहीं हैं। इस बार पीएमएल-एल को पीटीआई से कड़ी चुनौती मिल रही, इमरान खुद लाहौर से मैदान में हैं। पाकिस्तान के 4 राज्यों में पहली बार यहां की 72 प्रतिशत सीटें त्रिकोणीय मुकाबले में फंसी हैं। नवाज, भुट्टो और इमरान की पार्टी आमने-सामने हैं। बलूचिस्तान व सिंध में क्षेत्रीय दल भी चुनौती दे रहे।
सिंध में पहला ऐसा चुनाव जब भविष्यवाणी करना मुश्किल हो रहा है। कराची से इमरान, बिलावल और शाहबाज चुनावी मैदान में हैं। नेशनल असेंबली में 272 सीटें हैं। पाकिस्तान में 25 जुलाई को मतदान है। 6.6 करोड़ मतदाता सबसे बड़े सियासी राज्य पंजाब से हैं। 141 सीटें पंजाब और दूसरे नंबर पर 61 सीटें सिंध प्रांत से आती हैं। 35 साल तक पाक की हुकूमत पर सेना की तानाशाही रही है। पाक में 6 प्रधानमंत्री पंजाब प्रांत से पिछले 46 साल में बने हैं।
सिंध पाकिस्तान का दूसरा सबसे अहम राज्य है। यहां नेशनल असेंबली की 61 सीटें हैं। पाकिस्तान की इकोनॉमिक कैपिटल कराची, सिंध की राजधानी है। इस कारोबारी राज्य में चुनावी प्रचार अपने शवाब पर है। पर यह पहला ऐसा चुनाव है, जब कुछ भी पता नहीं है कि कौन सी पार्टी इस बार यहां लीड करेगी। कराची शहर की राजनीति में अस्सी के दशक से मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) का दबदबा रहा है। एमक्यूएम को मुहाजिरों की पार्टी कहा जाता है। शहर की 40 प्रतिशत आबादी मुहाजिरों की है। ये 3 गुटों में विभाजित हैं।
दरअसल, 2016 में एमक्यूएम दो धड़ों में बंट गई। एक धड़े का नाम अब एमक्यूएम लंदन और एक का एमक्यूएम पाकिस्तान है। इसी धड़े के कराची से पूर्व मेयर मुस्तफा कमाल ने पाक सरजमीन पार्टी (पीएसपी) बनाई है। इस बार एमक्यूएम लंदन ने चुनाव का बहिष्कार किया है। एमक्यूएमपी और पीएसपी आमने-सामने लड़ रही हैं। ऐसे में शहर में मुहाजिरों का वोट बटेगा। इसका फायदा पीटीआई और पीपीपी को होने की संभावना है। इससे पीपीपी और पीटीआई के जीतने की संभावना बढ़ गई है।
पीटीआई को उन सीटों से उम्मीद है, जहां पख्तून, पंजाबी, बलूच मतदाता ज्यादा हैं। शाहबाज शरीफ कराची वेस्ट की एन-248 सीट से मैदान में हैं। इस सीट पर 30% मुहाजिर वोटर हैं, 70% आबादी पश्तून और पंजाबियों की है। पीपीपी चेयरमैन बिलावल भुट्टो दक्षिण कराची की एनए-246 सीट से लड़ रहे हैं। यहां उनका पहला चुनाव है। यह सीट 70 के दशक से अधिकांश समय पीपीपी के पास ही रही है। 1988 में बेनजीर भुट्टो अपना पहला चुनाव इसी सीट से लड़ी थीं। यहां बलूच और सिंधी मतदाता निर्णायक हैं।
पीटीआई चीफ इमरान खान कराची से चुनाव लड़ रहे हैं। वह मुहाजिर बहुल एनए-243 सीट से मैदान में हैं। उनका सामाना एमक्यूएम-पी के सोशल मीडिया कैंपेनर अली रजा अबीदी से है। चुनावी विश्लेषकों की मानें तो कराची में इससे पहले हर चुनाव में भविष्यवाणी करना काफी आसान होता था। क्योंकि अधिकांश लोग एमक्यूएम का सपोर्ट करते थे। इसकी वजह एमक्यूएम का आर्गेनाइज नेटवर्क, इलेक्शन मशीनरी और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कला थी। पर इस बार चुनावी माहौल काफी बदला नजर आ रहा है। वजह, कानून व्यवस्था में सुधार, प्रमुख पार्टियों की बढ़ती भूमिका है।
क्षेत्रीय दलों के गढ़ में चुनाव से पहले 160 लोग मारे गए हैं
पेशावर और क्वेटा दो प्रमुख पख्तून शहर हैं। पेशावर खैबर पख्तूनख्वा की और क्वेटा बलूचिस्तान की राजधानी है। इनमें भौगोलिक और पिछले राजनीतिक इतिहास की वजह से कई समानताएं हैं। दोनों ही शहर अफगान युद्ध से बुरी तरह प्रभावित रहे हैं। कई सालों से आतंक से पीड़ित भी हैं। यहां जिहादियों के मकड़जाल और सांप्रदायिक हिंसा की जड़ें फैली हुई हैं। हाल ही में खैबर पख्तूनख्वा के पेशावर और बन्नू में और बलूचिस्तान के सीमाई इलाके मस्तूंग में आतंकी हमले हुए हैं। इन हमलों में करीब 160 लोग मारे गए। ये हमले 2013 के अशांत दिनों की याद दिलाते हैं। तब भी नेशनल असेंबली चुनाव आतंकी हमलों के साए में हुए थे।
इस सबके बावजूद दोनों राज्यों में नई सरकार के लिए धुआंधार चुनाव प्रचार चल रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि आतंक की इस नई लहर से पीटीआई को फायदा हो रहा है, जिसने अपनी रैलियों में एक भी आतंकी हमला फेस नहीं किया है और वे अपने अभियान का आनंद उठा रहे हैं। खैबर पख्तूनख्वा में पीटीआई सरकार ने हाल ही में अपना कार्यकाल पूरा किया है। पार्टी प्रमुख इमरान खान नेशनल असेंबली और राज्य में अपनी पार्टी की जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं। वहीं बलूचिस्तान में राष्ट्रीय पार्टियों को बलूचिस्तान नेशनल पार्टी (बीएनपी), नेशनल पार्टी पाकिस्तान (एनपीपी) और बलूचिस्तान अवामी पार्टी (बीएपी) से कड़ी टक्कर मिल रही है। बीएपी को बलूच और पख्तून के डॉमिनेटेड ट्राइबल प्रमुख और सरदारों ने बनाया है।