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जैसे भारत में आई थी मोदी लहर, वैसे ही पाक में इमरान की आंधी में ढह गए कई दिग्गज
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
Updated Sat, 28 Jul 2018 09:25 PM IST
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पूर्व क्रिकेटर और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ अध्यक्ष इमरान खान ने 270 सीटों पर हुए चुनाव 115 सीटों के साथ बड़ी जीत हासिल की है। यह ठीक वैसा है जैसा भारत में 2014 लोकसभा चुनाव में 'मोदी लहर' में कई दिग्गजों के किले ढह गए थे। हालांकि इरमान की पार्टी बहुमत का जादुई आंकड़ा नहीं छू पाई। वहीं दूसरे स्थान पर 65 सीटों के साथ नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) रही।
सरकार बनाने के लिए 137 सीटों की जरूरत होती है, लेकिन इमरान इससे दूर हैं जबकि दूसरे दलों के विरोध के चलते उनसे समर्थन लेना भी इमरान खान के लिए आसान नहीं होगा।
सरकार बनने का रास्ता आने वाले कुछ दिनों में साफ हो जाएगा लेकिन पाकिस्तान का आम चुनाव इस बार कई मायनों में खास रहा। सबसे खास था मतदान से पहले पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की एयरपोर्ट से गिरफ्तारी और फिर उनका जेल जाना। लेकिन इन चुनावों ने कई ऐसे संदेश दिए हैं जिन्हें हम आपको बता रहे हैं। 7 बिंदूओं में जानिए पाकिस्तान चुनाव में क्या रहा खास।
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1. पूरे देश में पीटीआई के समर्थन की लहर
खान की पीटीआई निश्चित रूप से अगली सरकार बनाएगी, भले ही उनके पास 137 सीटें हैं, लेकिन बहुमत के लिए छोटी पार्टियों और कम से कम 45 सीटों पर जीतने वाले निर्दलीय लोगों के साथ गठबंधन करके ही ऐसा संभव है।
इमरान की पार्टी ने नेशनल असेंबली की कुल 272 सीटों में से 141 सीटें देश के सबसे सघन आबादी वाले राज्य पंजाब में भी बेहतरीन प्रदर्शन किया है। यह पहले से तय था कि जो भी इस राज्य में सबसे ज्यादा सीटें जीतेगा उसको सत्ता की चाभी मिलेगी।
2. क्या चुनाव में धांधली हुई या नहीं
इमरान की किसी भी दल के साथ गठबंधन की कवायदें भी धुंधली नजर आने लगीं हैं। क्योंकि पाक में सियासी दलों के एक समूह ने एक बैठक करके चुनाव नतीजों को खारिज कर दिया। इन विपक्षी पार्टियों ने इमरान के खिलाफ खेमेबाजी तेज करते हुए पारदर्शी तरीके से दोबारा चुनाव कराने की मांग की है।
पीएमएल (एन) समेत कई राजनीतिक पार्टियों ने एक बैठक के बाद चुनाव नतीजों को खारिज करते हुए कहा कि वे देश भर में विरोध प्रदर्शन करेंगे। इन दलों ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाया है।
ऑल पार्टीज कांफ्रेंस (एपीसी) की इस संयुक्त बैठक में कहा गया कि जब तक देश में दोबारा पारदर्शी व निष्पक्ष चुनाव नहीं कराए जाते हैं तब तक इमरान की पार्टी पीटीआई के सांसदों को संसद में नहीं घुसने दिया जाएगा। एपीसी में पाक संसद की कार्यवाही नहीं चलने देने की बात भी कही गई।
3. कराची में मतदातओं ने बदला इतिहास
इस चुनाव से पहले पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी कराची में मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) का दबदबा माना जा रहा था।
पाकिस्तान में माना जाता है कि सरकार चाहे किसी भी दल की हो, लेकिन एमक्यूएम हमेशा ही सरकार में शामिल हो जाती है। लेकिन इस बार इसका उल्टा नजर आ रहा है। एक समय ऐसा था जब इस पार्टी का एकछत्र राज हुआ करता था। लेकिन इसबार कराची की कुल 21 सीटों में से एमक्यूएम को महज 6 सीटें ही हासिल हुई है।
4. छोटे दल नहीं कर पाए खास
चुनाव में छोटे दल कुछ खास नहीं कर पाए। जिसमें तहरीक-ए-लब्बाइक पाकिस्तान (टीएलपी) दृढ़ता से खुद को प्रमुख कट्टरपंथी बललेवी सुन्नी मुस्लिम पार्टी के रूप में स्थापित कर रहा था, लेकिन वह वोटरों के बीच प्रभाव डालने में असफल रहा और महज 2 सीटों पर ही जीत हासिल कर सके। बता दें कि टीएलपी एक इस्लामिक राजनीतिक दल है जिसका नेतृत्व खादिम हुसैन रिजवी कर रहे हैं। इसका मकसद पाकिस्तान को एक इस्लामिक देश बनाना है जहां शरियत-ए-मोहम्मदी के अनुसार ही सबकुछ तय किया जाए।
5. सेना के नियंत्रण में हुआ चुनाव
2018 के चुनावों के लिए पाकिस्तान की सेना ने 371,000 से अधिक सैनिकों को तैनात किया, इससे पहले कभी भी ऐसा नहीं हुआ है। नतीजे सबके सामने आए हैं। पाकिस्तान के बारे में कहा जाता है कि यहां कभी शांतिपूर्ण चुनाव प्रक्रिया को फॉलो नहीं किया जाता लेकिन इसबार ज्यादा जवानों की तैनाती ने पूरे देश में चुनाव के सभी खतरों से निपटते हुए शांतिपूर्ण चुनाव करवाने में मदद की।
6. चुनाव से किसको हुआ सबसे ज्यादा नुकसान?
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) जिसने 1970 के दशक में पार्टी की स्थापना के बाद पाकिस्तान पर चार मौकों पर शासन किया वह उसे चुनाव में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के बेटे और जुल्फिकार अली भुट्टो के पोते बिलावल भुट्टो भी चुनाव हार गए। हालांकि, उनकी पार्टी पीपीपी (पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी) चुनावी समर में तीसरी सबसे बड़े पार्टी के रूप में उभर कर आई है।
7. क्या यह चुनाव पाकिस्तान की राजनीतिक में स्थिरता प्रदान करेंगे?
पाकिस्तान में कभी भी स्थिर सरकार नहीं रही। और यह बात जगजाहिर है कि वहां सत्ता में सेना की दखलअंदाजी रहती है। लेकिन क्या इसबार पाकिस्तान में इमरान खान स्थिर सरकार दे पाएंगे यह एक बड़ा सवाल है।
बहुमत न रहते हुए भी इमरान अन्य दलों को एकसाथ लेकर चल सकेंगे या नहीं यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन जिस तरह सरकार बनने से पहले ही इमरान के खिलाफ चुनाव में धांधली और विपक्ष एकजूट हो गया है उससे लगता है कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान की राजनीति एक दिलचस्प मोड़ पर होगी।
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सरकार बनाने के लिए 137 सीटों की जरूरत होती है, लेकिन इमरान इससे दूर हैं जबकि दूसरे दलों के विरोध के चलते उनसे समर्थन लेना भी इमरान खान के लिए आसान नहीं होगा।
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सरकार बनने का रास्ता आने वाले कुछ दिनों में साफ हो जाएगा लेकिन पाकिस्तान का आम चुनाव इस बार कई मायनों में खास रहा। सबसे खास था मतदान से पहले पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की एयरपोर्ट से गिरफ्तारी और फिर उनका जेल जाना। लेकिन इन चुनावों ने कई ऐसे संदेश दिए हैं जिन्हें हम आपको बता रहे हैं। 7 बिंदूओं में जानिए पाकिस्तान चुनाव में क्या रहा खास।
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1. पूरे देश में पीटीआई के समर्थन की लहर
खान की पीटीआई निश्चित रूप से अगली सरकार बनाएगी, भले ही उनके पास 137 सीटें हैं, लेकिन बहुमत के लिए छोटी पार्टियों और कम से कम 45 सीटों पर जीतने वाले निर्दलीय लोगों के साथ गठबंधन करके ही ऐसा संभव है।
इमरान की पार्टी ने नेशनल असेंबली की कुल 272 सीटों में से 141 सीटें देश के सबसे सघन आबादी वाले राज्य पंजाब में भी बेहतरीन प्रदर्शन किया है। यह पहले से तय था कि जो भी इस राज्य में सबसे ज्यादा सीटें जीतेगा उसको सत्ता की चाभी मिलेगी।
2. क्या चुनाव में धांधली हुई या नहीं
इमरान की किसी भी दल के साथ गठबंधन की कवायदें भी धुंधली नजर आने लगीं हैं। क्योंकि पाक में सियासी दलों के एक समूह ने एक बैठक करके चुनाव नतीजों को खारिज कर दिया। इन विपक्षी पार्टियों ने इमरान के खिलाफ खेमेबाजी तेज करते हुए पारदर्शी तरीके से दोबारा चुनाव कराने की मांग की है।
पीएमएल (एन) समेत कई राजनीतिक पार्टियों ने एक बैठक के बाद चुनाव नतीजों को खारिज करते हुए कहा कि वे देश भर में विरोध प्रदर्शन करेंगे। इन दलों ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाया है।
ऑल पार्टीज कांफ्रेंस (एपीसी) की इस संयुक्त बैठक में कहा गया कि जब तक देश में दोबारा पारदर्शी व निष्पक्ष चुनाव नहीं कराए जाते हैं तब तक इमरान की पार्टी पीटीआई के सांसदों को संसद में नहीं घुसने दिया जाएगा। एपीसी में पाक संसद की कार्यवाही नहीं चलने देने की बात भी कही गई।
3. कराची में मतदातओं ने बदला इतिहास
इस चुनाव से पहले पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी कराची में मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) का दबदबा माना जा रहा था।
पाकिस्तान में माना जाता है कि सरकार चाहे किसी भी दल की हो, लेकिन एमक्यूएम हमेशा ही सरकार में शामिल हो जाती है। लेकिन इस बार इसका उल्टा नजर आ रहा है। एक समय ऐसा था जब इस पार्टी का एकछत्र राज हुआ करता था। लेकिन इसबार कराची की कुल 21 सीटों में से एमक्यूएम को महज 6 सीटें ही हासिल हुई है।
4. छोटे दल नहीं कर पाए खास
चुनाव में छोटे दल कुछ खास नहीं कर पाए। जिसमें तहरीक-ए-लब्बाइक पाकिस्तान (टीएलपी) दृढ़ता से खुद को प्रमुख कट्टरपंथी बललेवी सुन्नी मुस्लिम पार्टी के रूप में स्थापित कर रहा था, लेकिन वह वोटरों के बीच प्रभाव डालने में असफल रहा और महज 2 सीटों पर ही जीत हासिल कर सके। बता दें कि टीएलपी एक इस्लामिक राजनीतिक दल है जिसका नेतृत्व खादिम हुसैन रिजवी कर रहे हैं। इसका मकसद पाकिस्तान को एक इस्लामिक देश बनाना है जहां शरियत-ए-मोहम्मदी के अनुसार ही सबकुछ तय किया जाए।
5. सेना के नियंत्रण में हुआ चुनाव
2018 के चुनावों के लिए पाकिस्तान की सेना ने 371,000 से अधिक सैनिकों को तैनात किया, इससे पहले कभी भी ऐसा नहीं हुआ है। नतीजे सबके सामने आए हैं। पाकिस्तान के बारे में कहा जाता है कि यहां कभी शांतिपूर्ण चुनाव प्रक्रिया को फॉलो नहीं किया जाता लेकिन इसबार ज्यादा जवानों की तैनाती ने पूरे देश में चुनाव के सभी खतरों से निपटते हुए शांतिपूर्ण चुनाव करवाने में मदद की।
6. चुनाव से किसको हुआ सबसे ज्यादा नुकसान?
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) जिसने 1970 के दशक में पार्टी की स्थापना के बाद पाकिस्तान पर चार मौकों पर शासन किया वह उसे चुनाव में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के बेटे और जुल्फिकार अली भुट्टो के पोते बिलावल भुट्टो भी चुनाव हार गए। हालांकि, उनकी पार्टी पीपीपी (पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी) चुनावी समर में तीसरी सबसे बड़े पार्टी के रूप में उभर कर आई है।
7. क्या यह चुनाव पाकिस्तान की राजनीतिक में स्थिरता प्रदान करेंगे?
पाकिस्तान में कभी भी स्थिर सरकार नहीं रही। और यह बात जगजाहिर है कि वहां सत्ता में सेना की दखलअंदाजी रहती है। लेकिन क्या इसबार पाकिस्तान में इमरान खान स्थिर सरकार दे पाएंगे यह एक बड़ा सवाल है।
बहुमत न रहते हुए भी इमरान अन्य दलों को एकसाथ लेकर चल सकेंगे या नहीं यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन जिस तरह सरकार बनने से पहले ही इमरान के खिलाफ चुनाव में धांधली और विपक्ष एकजूट हो गया है उससे लगता है कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान की राजनीति एक दिलचस्प मोड़ पर होगी।