फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   Pakistan ›   In dictatorship of Muhammad Zia-ul-Haq Pakistani citizens used to see wallpapers of Sridevi

तानाशाही के दौर में श्रीदेवी का पोस्टर देख राहत महसूस करते थे पाकिस्तानी

Mon, 26 Feb 2018 11:12 AM IST
बीबीसी, हिन्दी
बीबीसी, हिन्दी Updated Mon, 26 Feb 2018 11:12 AM IST
विज्ञापन
In dictatorship of Muhammad Zia-ul-Haq Pakistani citizens used to see wallpapers of Sridevi

ये बात तब की है जब मैं कराची यूनिवर्सिटी में दाखिल हुआ, एक साल बाद मुझे यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में कमरा मिला। पहला काम ये किया कि अपना कमरा सेट किया, दूसरा काम ये किया कि श्रीदेवी के दो पोस्टर सदर जाकर खरीदे और उन्हें कमरे की दीवार पर आमने-सामने चिपका दिया।

विज्ञापन


ये तब की बात है जब भारतीय फिल्में वीसीआर पर देखना गैरकानूनी था और पकड़े जाने पर तीन से छह महीने की सजा थी। मगर लौंडे कहां मानने वाले थे, पैसे जोड़ जाड़कर वीसीआर किराये पर लाते साथ में छह फिल्में भी होतीं। ये मुमकिन न था कि इनमें से कम से कम एक या दो फिल्में श्रीदेवी की न हों।

विज्ञापन

जनरल जिया का दौर

In dictatorship of Muhammad Zia-ul-Haq Pakistani citizens used to see wallpapers of Sridevi

'जस्टिस चौधरी', 'जानी दोस्त', 'नया कदम', 'आग और शोला', 'बलिदान', 'सल्तनत', 'मास्टरजी', 'जाग उठा इंसान', 'इंकलाब', 'अक्लमंद', 'नजराना', 'आखिरी रास्ता', 'कर्मा', 'मकसद', 'सुहागन', 'निगाहें', 'जाबांज', 'तोहफा', 'घर संसार', 'औलाद', 'सदमा', 'हिम्मतवाला', 'नगीना', 'मिस्टर इंडिया', 'चांदनी'।

हम श्रीदेवी की गैरकानूनी भारतीय फिल्में और वो भी हॉस्टल के हॉल में सब दरवाजे खिड़कियां खोलकर फुल वॉल्यूम के साथ देखा करते थे ताकि हॉस्टल के बाहर बनी पुलिस चौकी तक भी आवाज पहुंच जाए।

ये था हमारा प्रतिरोध जनरल जिया-उल-हक की तानाशाही के खिलाफ। कभी-कभी पुलिसवाले दबी-दबी जबान में हंसते हुए कहते, 'हम तुम्हारी भावनाएं समझते हैं, लेकिन आवाज थोड़ी कम कर लिया करो, कभी कोई टेढ़ा अफसर आ गया तो हमारी पेटियां उतरते देखकर तुम्हें अच्छा लगेगा क्या?'

श्रीदेवी की कोई फिल्म दिखा दो...

In dictatorship of Muhammad Zia-ul-Haq Pakistani citizens used to see wallpapers of Sridevi

इन सिपाहियों की जगह हर तीन महीने बाद नए सिपाही आ जाते। पर एक सिपाही मुझे याद है, शायद जमील नाम था। स्पेशल ब्रांच का था इसलिए वर्दी नहीं पहनता था। हॉस्टल की चौकी पर एक साल से ज्यादा नियुक्त रहा।

जब उसने अपने ट्रांसफर का बताया तो हम चार-छह लड़कों ने कहा कि जमील आज तुम्हारी हॉस्टल की कैंटीन में दावत करते हैं। वह कहने लगा, दावत छोड़ो श्रीदेवी की कोई फिल्म दिखा दो। उस रात सिपाही जमील को सम्मान देने के लिए 'जस्टिस चौधरी' मंगवाई गई और पूरे सम्मान के साथ देखी गई।

विज्ञापन

नब्बे के दशक में...

In dictatorship of Muhammad Zia-ul-Haq Pakistani citizens used to see wallpapers of Sridevi

आज मैं 30-35 साल बाद सोच रहा हूं कि अगर श्रीदेवी न होती तो जनरल जिया-उल-हक की 10 साल पर फैली घुप्प तानाशाही हम लड़के कैसे काटते। मैंने श्रीदेवी की आखिरी फिल्म 'चांदनी' देखी, जिंदगी फिर जाने कहां से कहां ले गई।

श्रीदेवी को भी शायद पता चल गया था, इसलिए 90 के दशक में वो भी शाम के सूरज की तरह आहिस्ता-आहिस्ता नजरों से ओझल होती चली गईं। मैंने सुना की 'इंग्लिश-विंग्लिश' बहुत अच्छी फिल्म थी, फिर सुना कि 'मॉम' में श्रीदेवी ने कमाल का काम दिखाया। मगर कल तो श्रीदेवी ने कमाल ही कर दिया, मगर न मुझे कोई दुख है न हैरत।

वैन गॉग के बारे में सुना है कि जब उन्हें अपनी कोई पेंटिंग बहुत ज्यादा अच्छी लगने लगती तो वो उसे फाड़ दिया करते थे। कल भी शायद यही हुआ श्रीदेवी की पेंटिंग शायद बनाने वाले को ज्यादा ही भा गई।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news, Crime all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed