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कैसे होंगे पाकिस्तान में चुनाव?
अहमद राशिद (लेखक एवं पत्रकार, पाकिस्तान)
Updated Sun, 17 Mar 2013 03:39 PM IST
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पाकिस्तान में ऐसे समय में चुनाव होनेवाले हैं जब आम नागरिक, अल्पसंख्यक और सैन्य बल, सभी चरमपंथियों का निशाना बन रहे हैं।
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पाकिस्तान के बड़े शहरों (कराची, क्वेटा, लाहौर और पेशावर) में रोज़ाना औसतन 10-20 लोग मारे जा रहे हैं। कई दिन तो आत्मघाती हमलों में 100 लोग भी मारे गए हैं।
मई के दूसरे हफ्ते में होनेवाले चुनाव तक खास तौर पर राजनेताओं की हत्याओं का सिलसिला बढ़ने की आशंका है पर सरकार और सेना की तरफ से इससे बचने की कोई तैयारी होती भी नहीं दिख रही।
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अर्थव्यवस्था के बिगड़ते हालात इस अस्थिरता के माहौल को और बदतर ही बनाएंगे।
एशियन डेवलेपमेंट बैंक ने पाकिस्तान को चेतावनी दी है कि साल खत्म होने तक उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से करीब नौ अरब डॉलर का उधार लेना पड़ेगा।
लेकिन संविधान के मुताबिक मौजूदा सरकार की मियाद अब खत्म हो गई है, आने वाले चुनाव तक देश में एक कार्यवाहक प्रधानमंत्री होगा।
लेकिन इस कार्यवाहक सरकार के पास खास ताकत नहीं होगी और ये चरमपंथियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर सकेगी।
अल्पसंख्यक निशाने पर
पिछले महीनों में सबसे ज़्यादा हमले सुन्नी चरमपंथियों द्वारा शिया समुदाय पर हुए हैं।
शिया के साथ-साथ हिन्दू, सिख, ईसाई और अहमदिया समुदाय के निशाना बनाए जाने और सरकार के इन हमलों को रोकने में नाकाम होने के बाद, कई लोग पाकिस्तान छोड़ने को मजबूर हुए हैं।
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पिछले साल पाकिस्तान में 400 से ज़्यादा शिया मारे गए थे, इस साल पहले दो महीनों में ही ये आंकड़ा 200 को पार कर गया।
ये सभी हमले सुन्नी चरमपंथी गुट, लश्कर-ए-झांगवी ने किए, जिसे पहले ही एक ‘आतंकवादी’ संगठन घोषित किया जा चुका है।
लेकिन कार्रवाई के नाम पर सरकार ने अब तक सिर्फ इस संगठन के पूर्व नेता मलिक इशाक़ को उनके घर में नज़रबंद किया है। इशाक़ पहले भी कई बार गिरफ्तार कर रिहा किए जा चुके हैं।
लोकतंत्र में ताकत किसके पास?
कई पाकिस्तानी नागरिकों को ऐसा जान पड़ता है कि उनके देश में चरमपंथी, सेना और सरकार से ज़्यादा ताकतवर हैं।
इसके बावजूद ये चुनाव महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार एक चुनी हुई सरकार दूसरी चुनी हुई सरकार को कार्यभार सौंपेगी।
ये पाकिस्तान के लिए बड़ा इम्तिहान है लेकिन कोई भी बड़ी पार्टी इसके लिए तैयार नहीं दिखती।
कराची में कोलाहल का माहौल है। वहां ना सिर्फ शिया समुदाय में हत्याएं हुई हैं बल्कि कई स्तर पर नस्ली, सेक्टेरियन मतभेदों को माफिया और ज़मीन हड़पने की ताक में लगे लोग भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।
हर दूसरे दिन शहर का कोई हिस्सा गोलीबारी, हत्या या प्रदर्शनों के चलते बंद हो जाता है।
हमलों का सिलसिला
13 मार्च को पाकिस्तान की वरिष्ठ मानवाधिकार कार्यकर्ता परवीन रहमान की गोली मारकर कराची में हत्या कर दी गई थी।
पाकिस्तान के स्वायत्त मानवाधिकार आयोग के मुताबिक वर्ष 2012 में कराची में 2,284 लोगों की मौत हुई।
इस सबके बीच पत्रकारों को निशाना बनाए जाने का सिलसिला जारी है। मार्च में 72 घंटों के बीच दो पत्रकारों की हत्या कर दी गई।
ख़ैबर पख्तूनख्वा प्रांत में तालिबान पेशावर और पहाड़ों में बनी सेना की पोस्ट पर लगातार हमले करता रहा है।
चरमपंथियों ने ज़्यादा आबादी वाले इलाकों में पुलिस स्टेशनों पर आत्मघाती हमले किए हैं।
28 फरवरी को उत्तर-पश्चिमी कबायिली इलाके के मोहमंद एजेंसी में लड़कों के चार स्कूलों को निशाना बनाया गया था।
बलोचिस्तान में एक अलग विद्रोह चल रहा है जिसमें भी आम नागरिक मारे जा रहे हैं।
ज़ाहिर है बिना कानून व्यवस्था के चुनाव कैसे होंगे, इसपर संदेह बरकरार है।
सेना ने साफ कर दिया है कि वो हर पोलिंग बूथ पर तैनात नहीं हो सकती वहीं पुलिस भी कई इलाकों में काम करने के बारे में आश्वस्त नहीं दिखती।
साफ है कि आत्मघाती हमलों के डर से चुनाव प्रचार फीका होगा और बड़ी सभाएं करनी मुश्किल।
कई इलाकों में उम्मीदवार चरमपंथियों की सहमति चाहेंगे ताकि उनकी जान बची रहे।
सेना किसके साथ?
कई लोग पूछ रहे हैं कि ऐसे में सेना ज़्यादा भूमिका क्यों नहीं निभा रही।
सेना प्रमुख जनरल परवेज़ कयानी का कहना है कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) सरकार के तहत कानून एजेंसियों को अपना काम और बेहतर तरीके से करने की ज़रूरत है।
जनरल कयानी कहते हैं कि वो कोई कदम तभी उठाएंगे जब सरकार उन्हें कहेगी। और सरकार ऐसा कर, चुनाव से ठीक पहले अपनी कमज़ोरी नहीं दिखाना चाहती।
पिछले सालों में पीपीपी के नेतृत्व वाली सरकार ने चरमपंथियों पर नकेल ना कसकर, उन्हें और ताकतवर होने दिया है। बाकि राजनीतिक पार्टियों ने भी ज़ाहिर किए बगैर इसका समर्थन किया है।
करीबन सभी चरमपंथी गुटों के विपक्षी पाकिस्तान मुस्लिम लीग पार्टी (पीएमएल) की सत्ता वाले पंजाब प्रांत में ठिकाने हैं।
इस पार्टी को भी चरमपंथी विचारधारा रखने वाले धार्मिक गुटों के साथ गठजोड़ करने में कोई परेशानी नहीं हुई।
अगर इनके बल पर पीएमएल सत्ता में आई तो चरमपंथी गुटों पर नकेल कसना और भी मुश्किल हो जाएगा।
आखिरकार चुनाव तो होंगे। ये स्वतंत्र और निष्पक्ष हों इसके लिए हिंसा का कम होना ज़रूरी है, जिसकी ज़िम्मेदारी सेना, राजनीतिक पार्टियों, पुलिस और मीडिया सभी पर है।
पर जो हालात अभी हैं, उससे ये भी बहुत मुश्किल ही लगता है।