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हाफिज सईद की पार्टी को क्यों नहीं मिली एक भी सीट

Mon, 30 Jul 2018 06:01 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Mon, 30 Jul 2018 06:01 PM IST
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Hafiz Saeeds party could not get a single seat in pakistan election
हाफिज सईद
पाकिस्तान के आम चुनावों में कट्टरपंथ की तरफ रुझान रखने वाली पार्टियों को वोटरों का ज्यादा समर्थन नहीं मिला। पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान रहे इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए- इंसाफ को सबसे ज्यादा सीटें मिली हैं। माना जा रहा है कि इमरान खान अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं।
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पाकिस्तान की जनता ने इमरान खान की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का स्वागत किया है, हालांकि इमरान पर इस्लाम की राजनीति करने के आरोप लगते रहे हैं लेकिन पाकिस्तान की जनता ने हाफिज सईद जैसी कट्टरपंथी इस्लामी ताक़तों को साफ नकार दिया है। जानकार मानते हैं कि देश की जनता अब शांति चाहती है और इस बार क़रीब चालीस फीसदी युवा और नए वोटरों ने एक नई सोच का साथ देते हुए भ्रष्टाचार के ख़िलाफ और देश के विकास के नाम पर वोट किया है।
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हाफिज सईद की पार्टी हारी

लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद की नई पार्टी अल्लाह हू अक़बर तहरीक पार्टी ने नेशनल असेंबली की 272 सीटों में से 79 पर अपने उम्मीदवार (चार प्रांतीय असेंबली के लिए पार्टी ने 181 उम्मीदवार) खड़े किए थे लेकिन किसी को भी जीत हासिल नहीं हुई।
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हाफिज सईद ने मिली मुस्लिम लीग बनाई थी जो जमात-उद-दावा की राजनीतिक शाखा थी। चुनाव कमीशन ने इसका रजिस्ट्रेशन करने से इनकार कर दिया था जिसके बाद उनके उम्मीदवारों ने अल्लाह हू अक़बर तहरीक पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ा।

उनके बेटे हाफिज तल्हा सईद और दामाद खालिद वलीद भी जीत हासिल करने में नाकाम रहे। ईशनिंदा कानून की पैरवी करने वाले तहरीक लबैक पाकिस्तान ने कुल 180 उम्मीदवार खड़े किए थे लेकिन किसी उम्मीदवार को जीत नहीं मिली।

Hafiz Saeeds party could not get a single seat in pakistan election
हाफिज सईद
'सड़कों की बात और है संसद की और'

इस्लामाबाद में मौजूद बीबीसी संवाददाता हारुन रशीद कहते हैं कि "पाकिस्तान में संसद के इतिहास को देखें तो ये जरूर है कि धार्मिक पार्टियां लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करती लगती हैं, लेकिन चुनाव का वक्त आता है तो हमेशा से जनता ने ऐसे दलों को समर्थन नहीं दिया है।"

साल 2002 में जब अमरीका ने अफग़ानिस्तान पर हमला किया था उस वक्त धार्मिक रुझानों वाले राजनीतिक दलों के गठबंधन मुत्ताहिदा मजलिसे अमल की जीत हुई थी। हारुन रशीद कहते हैं कि "उन्होंने ख़ैबर पख्तूनख्वा में प्रांतीय सरकार बनाई भी थी लेकिन इसके बाद आज तक इस तरह कोई ऐसा मामला नहीं आया जब ऐसे किसी दल ने जीत हासिल की हो।"

"25 जुलाई को हुए चुनावों से पहले भी पकिस्तान की नेशनल असेंबली में इनकी कोई ख़ास मौजूदगी नहीं थी। अहले सुन्नत वल जमात के नेता मोहम्मद अहमद लुधियानी झांग के जिले से चुनाव जीते थे लेकिन इस बार वो भी हार गए हैं।"

इस्लामाबाद में धरना देकर तत्कालीन कानून मंत्री जाहिद हामिद को इस्तीफा देने पर मजबूर करने वाली ख़ादिम रिज्वी की पार्टी तहरीक लबैक को सिंध से दो सीटों पर जीत मिली है। उन्होंने 180 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे।

जाहिद हामिद ने इस्तीफे के बारे में कहा था कि उनका चुनाव सुधार संशोधन बिल से सीधे कोई संबंध नहीं है और यह सभी राजनीतिक पार्टियों की सहमति से लाया गया बिल था। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक जाहिद हुसैन कहते हैं कि "पाकिस्तान में धार्मिक रुझानों वाली पार्टियों को मिल रहा समर्थन कम होता जा रहा है। इस बार के चुनाव नतीजे बताते हैं कि पाकिस्तान की सियासत में धार्मिक पार्टियों की इतनी जगह नहीं है जितना पड़ोसी मुल्क समझते हैं।"

जो लोग पाकिस्तान को नहीं समझते हैं उन्हें ऐसा लगता है कि इन पार्टियों को काफी समर्थन मिलता है लेकिन ये मिथक है। ये देश अमन पंसद है। ये पार्टियां हिंसा से जुड़े मुद्दों को उठाती हैं और डर और दहशत की बात करती हैं। इस कारण लगता है कि ये पार्टियां अधिक ताकतवर हैं लेकिन ऐसा है नहीं।"

जाहिद हुसैन बताते हैं, "इस्तीफा देने को मजबूर हुए पूर्व कानून मंत्री जाहिद हामिद के बेटे ने चुनाव जीत लिया है। इससे जाहिर होता है कि धार्मिक दलों के साथ जनसमर्थन नहीं है।" बीते साल नवंबर में पाकिस्तान के कई धार्मिक संगठनों के लगभग 3,000 लोग इस्लामाबाद धरने पर बैठे हुए थे।

धरना देने वालों का आरोप था कि चुनाव सुधार के लिए संसद में जो बिल पेश किया गया था उसमें कुछ ऐसी बातें कही गईं थीं जो उनके अनुसार इस्लाम की बुनियादी मान्यताओं के विरुद्ध हैं और इस कारण कानून मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए।

 

Hafiz Saeeds party could not get a single seat in pakistan election
हाफिज सईद
पूर्व कानून मंत्री जाहिद हामिद
जाहिद हुसैन बताते हैं, "हाफिज सईद नई पार्टियां खड़ी करें या ना करें, उनका पाकिस्तान की राजनीति में दख़ल ना के बराबर है लेकिन बाहरी मुल्कों को ऐसा नहीं लगता। जो पुरानी मेनस्ट्रीम पार्टियां (जमायते उलेमा इस्लाम जैसी पार्टी) थी, जो काफी साल से यहां की राजनीति में मौजूद थीं, उनका सफाया हो गया तो आप नई पार्टियों की क्या बात कर रहे हैं।"

'भ्रष्टाचार के ख़िलाफ मुहिम रंग लाई'
जाहिद हुसैन बताते हैं, "ख़ैबर पख्तूनख्वा में इमरान खान की हुकूमत रही है। वहां एक बार जीती पार्टी को दोबारा नहीं चुना जाता, ऐसी रवायत रही है। लेकिन इमरान खान वहां से दोबारा जीत कर आए क्योंकि उन्होंने वहां पर सुधारों के लिए काम किया। ये मानना ही पड़ेगा कि वो वोटरों को अपनी तरफ खींचने में कामयाब हुए।" हारुन रशीद कहते हैं "भ्रष्टाचार के ख़िलाफ इमरान खान ने एक लंबी मुहिम छेड़ रखी थी जिससे उन्हें काफी मदद मिली। इसके साथ ही पनामा लीक्स का मामला सामने आया और कोर्ट का फैसला भी आया।"

तहरीक-ए-इंसाफ के नेता इमरान खान के समर्थक

चुनाव से ठीक पहले पाकिस्तान की भ्रष्टाचार निरोधी अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम नवाज को भ्रष्टाचार का दोषी माना। कोर्ट ने नवाज को दस साल और मरियम को सात साल की सजा सुनाई।

नवाज शरीफ पहले ही चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहरा दिए गए थे। मरियम नवाज भी चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो गईं। अदालत के इस फैसले का असर नवाज शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग (नवाज) पर साफ दिखा। हालांकि हारुन रशीद कहते हैं, "इमरान खान को इसका फायदा मिला लेकिन अभी नवाज शरीफ को पूरी तरह से ख़त्म नहीं माना जा सकता।"

"केस खत्म नहीं हुआ है और वो अपील कर सकते हैं। नवाज शरीफ को 17 साल पहले भी आतंकवाद और विमान अपहरण के एक मामले में उम्रकैद की सजा हुई थी लेकिन वो बाद में निर्दोष साबित हो गए थे।"
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