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बॉक्सिंग से बदलती पाकिस्तानी लड़कियों की जिंदगी

Fri, 08 Jun 2018 05:05 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Fri, 08 Jun 2018 05:05 PM IST
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Boxing Changed the life of Pakistani girls
Boxing Pakistan - फोटो : BBC
ये पहला मौका है जब मैं पाकिस्तान के प्रमुख शहर कराची के ल्यारी इलाके की यात्रा कर रही हूं। ल्यारी कराची की वो जगह है, जहां अलग-अलग नस्लों के कई समुदाय रहते हैं और इनके बीच में बस एक चीज कॉमन है- वो है गरीबी। 
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यहां आते हुए मुझे थोड़ा अजीब महसूस हो रहा था क्योंकि कुछ साल पहले तक यहां बाहरी लोगों का आना सुरक्षित नहीं माना जाता था। क्योंकि यहां की गलियां खूनखराबे का संघर्ष का शिकार रही हैं। स्थानीय पुलिस के लिए भी इस इलाके में पहुंचना संभव नहीं होता था। 
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लेकिन पाकिस्तान की पैरा-मिलिट्री फोर्स ने एक लंबा अभियान चलाने के बाद इस इलाके से अराजक तत्वों को उखाड़ फेंका था। इसके बाद यह इलाका आम लोगों के जाने लायक बन गया है।
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महिलाओं का पहला बॉक्सिंग क्लब

मैं इस इलाके के पहले महिला बॉक्सिंग क्लब में कुछ युवा लड़कियों से मिलने आई हूं, जो अपनी बॉक्सिंग के दम पर खुद को सशक्त बनाने का सपना देख रही हैं। हर दिन स्कूल खत्म होने के बाद करीब दो दर्जन लड़कियां पाक शाहीन बॉक्सिंग क्लब में पहुंचती हैं। पंचिंग बैग में घूंसे चलाती हुई ये लड़कियां बॉक्सिंग की मदद से आत्मनिर्भर बनने का सपना देख रही हैं।

एक पुरानी सी इमारत में बने इस क्लब में बॉक्सिंग रिंग समेत वे सभी चीज़ें मौजूद हैं जो इस शहर के कई बॉक्सिंग क्लबों में दिखाई नहीं पड़ती हैं। क्लब की एक दीवार पर अमरीकी बॉक्सर मोहम्मद अली की तस्वीर टंगी है और दूसरी दीवार पर बॉक्सिंग ग्लव्स टंगे हुए दिखाई पड़ते हैं।

'मुझे ओलंपिक खिलाड़ी बनना है'

13 साल की आलिया सूमरो इस क्लब की सबसे जोशीली बॉक्सर हैं जिन्हें अब तक कोई भी हरा नहीं पाया है।

मोहम्मद अली को अपनी प्रेरणा बताने वाली आलिया कहती हैं, "एक दिन मैंने मोहम्मद अली की फाइट देखी। ये देखना शानदार था जिस तरह वह अपना सीधा हाथ इस्तेमाल करते हैं। मैं भी उनकी तरह बनना चाहती हूं। उन्होंने तीन चैंपियनशिप जीती थीं। मैं पांच चैंपियनशिप जीतना चाहती हूं।"

किसी भी 13 साल की लड़की की तरह आलिया भी बेफिक्र नज़र आती हैं। 

आलिया कहती हैं, "अभी भी लड़कियों के लिए कई सीमाएं हैं। उन्हें उनके परिवार की ओर से इजाजत नहीं मिलती है। लेकिन मैं उन लड़कियों में शामिल नहीं हूं। मेरे पिता एक फुटबॉल खिलाड़ी हैं और वह मेरा पूरा समर्थन करते हैं।"

लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि उनके लिए बॉक्सिंग करना कोई आसान काम रहा होगा।

वह बताती हैं, "जब मैं अपना पहला मैच खेल रही थी तो लोगों ने मेरी बेइज्जती की और रिंग में बॉक्सिंग करने की जगह मुझे घर पर रहने, नमाज और कुरान पढ़ने के लिए कहा। मेरे पिता का मजाक उड़ाया गया कि उन्होंने मुझे बॉक्सिंग में क्यों डाला।"

सभी चुनौतियों के बावजूद आलिया भविष्य के लिए आशान्वित रहते हुए कहती हैं, "मैं एक दिन ओलंपिक खिलाड़ी बनूंगी।" 

बॉक्सिंग से आशा की किरण

Boxing Changed the life of Pakistani girls
साल 2013 में जब पाक शाहीन क्लब के कोच ने महिला बॉक्सरों को बॉक्सिंग सिखाना शुरू किया तब ल्यारी की गलियों में गैंगवार की घटनाएं आम थीं। ऐसी हिंसक स्थिति में महिलाएं सबसे ज्यादा खतरे में थीं।

यूनुस कमबरनी कहते हैं, "वो बहुत ही खराब दिन थे। कभी-कभी मैं क्लब के परिसर से गोलियों के छर्रे उठाता था। लेकिन मुझे हमेशा से लगता था कि खेल गरीबी और हिंसा से जूझ रहे इस क्षेत्र के लोगों के लिए आशा की किरण जगा सकता है। जब मैंने इन लड़कियों को बॉक्सिंग सिखाना शुरू किया तो लोग मेरे खिलाफ हो गए। उन्हें ये पसंद नहीं आया लेकिन मैंने अपना काम जारी रखा।"

तब से लेकर अब तक कमबरानी दर्जनों लड़कियों को ट्रेनिंग दे चुके हैं लेकिन वे आख़िर तक नहीं रुकती हैं और कुछ टूर्नामेंट्स के बाद चली जाती हैं।

दोपहर के समय तक लड़कियां क्लब में जुटना शुरू हो जाती हैं। इनमें अलग-अलग उम्र की कई लड़कियां शामिल हैं। कई लड़कियों के पास किट और जूते भी नहीं होते। इसके बाद वे प्रार्थना करने के बाद वॉर्म अप करना शुरू कर देती हैं। 

बॉक्सिंग ने बदली जिंदगी

Boxing Changed the life of Pakistani girls
Boxing Pakistan - फोटो : BBC
पंचिंग बैग में घूंसे मारती लड़कियों में से एक अनम कमबरानी कहती हैं कि बॉक्सिंग एक बेहद ही उपयोगी चीज है लेकिन इसे हमेशा सही समय पर ही प्रयोग करना चाहिए। वह बताती हैं कि पहले वह अकेली बाहर नहीं जा पाती थीं लेकिन बॉक्सिंग ने उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया है।

अनम कहती हैं, "यहां के लोग बेहद रूढ़िवादी हैं, वे लड़कियों को पढ़ने भी नहीं देना चाहते, ऐसे में बॉक्सिंग तो बहुत दूर की बात है।" लेकिन वह मानती हैं कि इस क्लब ने बॉक्सिंग और महिलाओं के प्रति लोगों का नजरिया बदल दिया है और अब वह किसी भी अप्रिय घटना को संभालने के लिए ज्यादा तैयार हैं।

हालांकि, इस क्लब के भविष्य को लेकर अभी भी अनिश्चितता का माहौल है। क्योंकि बॉक्सर उन घरों से आ रही हैं जिनके पास अपनी बच्चियों के बॉक्सिंग प्रेम के लिए आर्थिक रूप से पर्याप्त सक्षम नहीं है। ऐसे में क्लब को आर्थिक मदद की जरूरत है।

यूनुस कमबरानी कहते हैं, "हमें एक छोटा सा टूर्नामेंट आयोजित करने के लिए भी 20 से 25 हजार रुपए की जरूरत होती है। ये काफी तनावपूर्ण है। हमारे पास लड़कियों के लिए कपड़े बदलने का एक चेंजिंग रूम भी नहीं है। अगर कोई हमारी ये मदद कर सके तो हम कई और लड़कियों को ट्रेन कर सकते हैं और कई टूर्नामेंट आयोजित कर सकते हैं।"

ये एक खूबसूरत दृश्य था, लड़कियां पूरी ताकत से अपने पंच चला रही थीं, उनकी आंखों में एक गुस्सा और बॉडी लेंग्वेज काफी भावुक कर देने वाली थी। और इस दृश्य ने दीवार पर टंगे पोस्टर में लिखी बात औरत-हिम्मत-ताकत को सिद्ध कर दिया।
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