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औरंगजेब के लिए अब इस्लामाबाद हुआ मुफीद!
बीबीसी हिंदी
Updated Wed, 29 Nov 2017 07:14 PM IST
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धरना
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जैसे 18वीं सदी में औरंगजेब के बाद जिसका मुंह उठता था वो दिल्ली की ओर चल देता था भले वो सिख हों या मराठा, नादिर शाह हों या अहमद शाह अब्दाली। इसी तरह पिछले चंद सालों से राजधानी इस्लामाबाद का हाल हो गया है। जिसका मूड होता है, हजार दो हजार बंदे लेकर इस्लामाबाद में धरना दे देता है और फिर सरकार को कभी ठोड़ी में हाथ देकर, कभी हंसकर, कभी आंखों में आंसू भरकर, कभी खुदा का वास्ता देकर, तो कभी कुछ मांगें स्वीकार करके और सारे पुलिस पर्चे वापस लेकर धरना खत्म करवाना पड़ता है। मौलाना ताहिरुल कादरी के 2013 और इमरान खान के 2014 के धरने के बाद अब पेशे खिदमत है, मौलाना खादिम हुसैन रिजवी का धरना। मौलाना को दो साल पहले तक कोई नहीं जानता था।
पढ़ें- ऐसा मंदिर, जिसका चमत्कार देख उल्टे पांव भागा था औरंगजेब
रिजवी में जैसे 'जिन' आ गया
वो बस लाहौर की एक सरकारी मस्जिद में बस नमाज पढ़ाते थे और तनख्वाह वसूल करते थे, लेकिन जब गवर्नर पंजाब सलमान तासीर को कत्ल करने वाले मुमताज कादरी को फांसी दी गई तो मौलाना खादिम हुसैन रिजवी ने मुमताज कादरी के मिशन का बीड़ा उठा लिया। कादरी के घरवालों को आज कोई नहीं जानता मगर खादिम हुसैन रिजवी को राष्ट्रपति से लेकर मेरे मोहल्ले के अब्दुल्ला पनवाड़ी तक सब जानते हैं।
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रिजवी में जैसे 'जिन' आ गया
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पनामा केस के कारण जब नवाज शरीफ को छोड़ना पड़ा प्रधानमंत्री पद
Kulsoom Nawaz
पनामा केस के कारण जब नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा और उनकी खाली सीट पर उनकी पत्नी कुलसुम नवाज ने चुनाव जीता तो इस जीत को यह खबर खा गई कि एक नई पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक या रसूल अल्लाह के उम्मीदवार ने भी सात हजार वोट लिए हैं। यह पार्टी मौलाना खादिम हुसैन रिजवी की थी। इसके बाद से रिजवी साहब में एक जिन जैसी ताकत आ गई और उन्होंने इस्लामाबाद और रावलपिंडी के संगम पर अपने दो हजार समर्थक बिठाकर दोनों शहरों के लाखों लोगों को 21 दिन से बंदी बना रखा है।
इस्लामाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की डांट-फटकार के बाद सरकार ने परसों गैरत में आकर डंडे, रबड़ की गोलियों और आंसू गैस के जोर पर यह धरना उठाने की कोशिश की। मगर खादिम रिज़वी साहब के पत्थरों और गुलेलों से लैस समर्थकों ने यह कोशिश बुरी तरह नाकाम बना दी। अब तो आर्मी चीफ जनरल बाजवा भी कह रहे हैं कि 'मार से नहीं, प्यार से बात की जाए।'
क्या हुक्म है मेरे आका
इस्लामाबाद औरंगजेब के बाद की दिल्ली मुफ्त में नहीं बनी। इसके लिए जनरल जिया उल हक के दौर से अब तक बहुत मेहनत की गई। आपके यहां तो एक जरनैल सिंह भिंडरावाला ने सरकार को संकट में डाल दिया था, हमारे हाथ जब अलादीन का चिराग आया तो उसे रगड़-रगड़कर हमने तो पूरी फैक्ट्री डाल ली। हर साइज, हर मॉडल, हर नजरिए का भिंडरावाला ऑर्डर पर बनाया गया जिसे बस एक ही जुमला सिखाया गया, 'क्या हुक्म है मेरे आका?' पर अब मुश्किल यह है कि अलादीन का यह चिराग रगड़-रगड़कर के हर छोटा बड़ा काम निकलवा लिया गया है, अब कोई खास काम ही नहीं बचा तो जिन क्या करे इसलिए चिराग जिन के हाथ में है और यह कहने की बारी अलादीन की है, 'क्या हुक्म है मेरे आका?'
इस्लामाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की डांट-फटकार के बाद सरकार ने परसों गैरत में आकर डंडे, रबड़ की गोलियों और आंसू गैस के जोर पर यह धरना उठाने की कोशिश की। मगर खादिम रिज़वी साहब के पत्थरों और गुलेलों से लैस समर्थकों ने यह कोशिश बुरी तरह नाकाम बना दी। अब तो आर्मी चीफ जनरल बाजवा भी कह रहे हैं कि 'मार से नहीं, प्यार से बात की जाए।'
क्या हुक्म है मेरे आका
इस्लामाबाद औरंगजेब के बाद की दिल्ली मुफ्त में नहीं बनी। इसके लिए जनरल जिया उल हक के दौर से अब तक बहुत मेहनत की गई। आपके यहां तो एक जरनैल सिंह भिंडरावाला ने सरकार को संकट में डाल दिया था, हमारे हाथ जब अलादीन का चिराग आया तो उसे रगड़-रगड़कर हमने तो पूरी फैक्ट्री डाल ली। हर साइज, हर मॉडल, हर नजरिए का भिंडरावाला ऑर्डर पर बनाया गया जिसे बस एक ही जुमला सिखाया गया, 'क्या हुक्म है मेरे आका?' पर अब मुश्किल यह है कि अलादीन का यह चिराग रगड़-रगड़कर के हर छोटा बड़ा काम निकलवा लिया गया है, अब कोई खास काम ही नहीं बचा तो जिन क्या करे इसलिए चिराग जिन के हाथ में है और यह कहने की बारी अलादीन की है, 'क्या हुक्म है मेरे आका?'