Pakistan: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला- फांसी से पहले पूर्व PM जुल्फिकार अली भुट्टो का ट्रायल निष्पक्ष नहीं
पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने देश की न्याय प्रणाली को आइना दिखाया है। देश की शीर्ष अदालत ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी की सजा से पहले मुकदमे में निष्पक्ष ट्रायल नसीब नहीं हुआ। अदालत ने कई और गंभीर टिप्पणियां भी कीं।
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विस्तार
2011 में तत्कालीन राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट पहुंचे
कोर्ट ने लगभग 13 साल के बाद पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) के संस्थापक जुल्फिकार अली भुट्टो के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा वाले तत्कालीन राष्ट्रपति के आदेश की वैधता पर सुनवाई की। गौरतलब है कि साल 2011 में तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अपने ससुर जुल्फिकार अली भुट्टो की फांसी को हत्या बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। न्यायमूर्ति ईसा ने चीफ जस्टिस बनने के बाद 2023 में इस मुकदमे पर सुनवाई शुरू की।
निष्पक्ष सुनवाई संविधान से मिला अधिकार है
फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस ईसा ने कहा, लाहौर उच्च न्यायालय में 45 साल पहले हुई मुकदमे की कार्यवाही को देखने से स्पष्ट है कि निष्पक्ष सुनवाई की गारंटी और उचित प्रक्रिया के मौलिक अधिकार की जरूरतें पूरी नहीं हुईं। अदालत ने कहा कि मुकदमे में निष्पक्ष सुनवाई संविधान के अनुच्छेद 10ए के तहत एक अलग और मौलिक अधिकार है। पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 4 और 9 की व्याख्या करते हुए इनकी गारंटी दी है। हालांकि, भुट्टो के मामले में ऐसा नहीं हुआ।
भुट्टो की मौत की सजा के फैसले को बदला नहीं जा सकता
भली ही शीर्ष अदालत ने निष्पक्ष सुनवाई के मुद्दे पर सख्त टिप्पणी की हो लेकिन चीफ जस्टिस ने यह भी स्पष्ट किया कि भुट्टो की मौत की सजा के फैसले को बदला नहीं जा सकता क्योंकि संविधान और कानून इसकी अनुमति नहीं देते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फांसी की सजा वाला फैसला बरकरार रहेगा। बाद में सुप्रीम कोर्ट इस मुकदमे पर विस्तृत राय जारी करेगा।
45 ,साल पहले सैन्य तख्तापलट के बाद 51 साल के भुट्टो को फांसी
बता दें कि साल 1977 में सैन्य तानाशाह जनरल जिया-उल-हक ने जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार गिरा दी थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय पीठ ने 51 साल के भुट्टो को दोषी करार देते हुए उन्हें फांसी की सजा सुनाई। भुट्टो के समर्थकों के मुताबिक यह 'न्यायिक हत्या' जैसा मामला है। अप्रैल 2011 में तत्कालीन राष्ट्रपति जरदारी ने संविधान के अनुच्छेद 186 का इस्तेमाल किया था। उन्होंने अपील की थी कि भुट्टो के मुकदमे में सैन्य तानाशाह और सुप्रीम कोर्ट की मिलीभगत के कारण नाइंसाफी हुई है।
2018 में हाईकोर्ट ने शहीद का दर्जा दिया
गौरतलब है कि पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की मौत के 39 साल बाद साल 2018 में शहीद का दर्जा दिया गया था। सिंध हाईकोर्ट ने अप्रैल, 2018 में पारित फैसले में भुट्टो के नाम के आगे शहीद जोड़ा था। कोर्ट ने कहा कि भुट्टो तानाशाही शासन का शिकार हुए। भुट्टो पाकिस्तान के सबसे ताकतवर नेताओं में गिने जाते थे। 1977 में सैन्य तख्तापलट के दो साल बाद उन्हें फांसी दी गई। उन पर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी के हत्या में शामिल होने होने का आरोप लगता रहा। हालांकि, भुट्टो हमेशा इनकार करते रहे।
पिता की फांसी के 28 साल बाद बेटी की हत्या
भुट्टो ने अपनी जिंदगी के आखिरी साल रावलपिंडी जेल में गुजारे। यहीं से उन्होंने अपनी सजा के खिलाफ अपील भी की थी। उनकी बेटी बेनजीर भुट्टो भी पाकिस्तान की सियासत का बड़ा चेहरा बनकर उभरीं। पाकिस्तान की प्रधानमंत्री रहीं बेनजीर को 2007 में मौत के घाट उतार दिया गया था। रावलपिंडी में राजनीतिक रैली के दौरान आत्मघाती हमलावर ने बेनजीर की हत्या कर दी थी।