‘पैक-मैन’ गेम जैसा होता है ब्लैक होल के विलय का तंत्र: शोध
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अंतरिक्ष के बड़े-बड़े ग्रहों तक को अपने अंदर समा लेने वाले ब्लैक होल जब आपस में टकराते हैं तो एक-दूसरे में समा जाते हैं। विलय की यह प्रक्रिया किस तरह होती है, इसका जवाब तलाशने की कोशिश में बहुत सारे शोधकर्ता लंबे समय से जुटे हुए हैं।
लेकिन पहली बार शोधकर्ताओं के एक दल ने एक ऐसा सतत तंत्र (सिमुलेशन) तैयार करने में सफलता हासिल की है, जो यह स्पष्ट कर सकता है कि ब्लैक होल का सबसे बड़ा आपसी विलय कैसे संभव हो सकता है? इस तंत्र में दिखाया गया है कि किस तरह बच्चों के ‘पैक-मैन’ वीडियो गेम की तरह एक ब्लैक होल दूसरे को निगल जाता है।
अमेरिका के रोचेस्टर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी समेत कई अन्य जगह से आए इन शोधकर्ताओं का कहना है कि पृथ्वी पर मौजूद वेधशालाओं ने गुरुत्वाकर्षण तरंगों के जरिए अंतरिक्ष में करीब 10 ब्लैक होल के आपसी विलय के कारण पैदा हुई अव्यवस्था का पता लगाया है, लेकिन इन ब्लैक होल के विलय की उत्पत्ति को समझाया जाना अभी तक बाकी है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अभी तक हुए सबसे बड़े ब्लैक होल विलय ने इस बारे में बनाए गए पिछले सभी मॉडलों को गलत साबित कर दिया था, क्योंकि इसका द्रव्यमान और घुमाव सोची गई संभावनाओं से कहीं ज्यादा था।
साइंस जर्नल फिजिकल रिव्यू लैटर्स में प्रकाशित ताजा अध्ययन में इस बात पर गौर किया गया है कि इतने विशाल विलय सक्रिय आकाशगंगाओं के केंद्र में मौजूद सुपरमैसिव (महाकाय आकार वाले) ब्लैक होल के बाहर ही संभव हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि सुपरमैसिव ब्लैक होल के आसपास एक खास क्षेत्र होता है, जिसे एक्रीशन डिस्क (संचयन मंडल) कहते हैं। इस एक्रीशन डिस्क में गैस, तारे, धूल और छोटे ब्लैक होल फंसकर पकड़े जाते हैं।
कैसे काम करती है प्रक्रिया
इस शोध के सह लेखक रिचर्ड ओ’शोघनेसी के मुताबिक, कोई ब्लैक होल जैसे ही एक्रीशन डिस्क में समाता है, तो वह गोलाकार घूमना शुरू कर देता है। यह ब्लैक होल घूमते हुए बड़े ब्लैक होल से टकराकर उसमें समा जाता है। यह प्रक्रिया ‘पैक-मैन’ वीडियो गेम सरीखे तरीके से लगातार चलती रहती है और बड़ा ब्लैक होल छोटे को निगलकर अपना आकार बढ़ाता चला जाता है।
रिचर्ड का मानना है कि उनकी यह अवधारणा इस बात को स्पष्ट करती है कि किसी आकाशगंगा का केंद्र किस तरह बढ़ता है, जिससे यह समझने में भी मदद मिलती है कि किस तरह आकाशगंगा का आकार बढ़ता है। उनका कहना है कि इससे अंतरिक्ष में अधिकांश संरचनाओं की व्याख्या करने में मदद मिलेगी।